वाक़िफ़ सामेदओलू की कविताएँ ::
अज़रबैजानी से अनुवाद : निशांत कौशिक

Vagif Samadoglu POEMS IN HINDI
वाक़िफ़ सामेदओलू

एक

हम नहीं
यह ख़ुदा है जो हम पर यक़ीन नहीं करता
नहीं करता वह हम पर यक़ीन
जब हमने ख़ून बहाया
जब हमने एक दूसरे को संगसार किया
लेकिन जब आसमान
किसी बच्चे की मुस्कुराती शक्ल-सा लगता है
और जब कोई समंदर को देखते हुए कहता है—
‘बहुत ख़ूबसूरत है यह दुनिया’
तब हम उस पर नहीं
ख़ुदा हम पर यक़ीन करता है

दो

राहें छोटी हों
या लंबी
क्या फ़र्क़ पड़ता है
कि किस मुल्क़ की
किस सड़क पर
तुम अपनी राह खोते हो

हज़ारों मुल्क
हज़ारों ज़ुबानें
क्या फ़र्क़ पड़ता है
कि किस मुल्क में
किस भाषा में
साधते हो तुम चुप्पी?

तीन

कहाँ हूँ मैं?
हूँ कहाँ? बताओ मुझे
पल भर के लिए
रौशनी दो इधर
इतनी ख़बर ही काफ़ी होगी
कि हूँ कहाँ
भले ही नजात न मिले इस जगह से

चार

लीजिए!
फिर शुरू हुई मेरी ख़ब्तुलहवासी
फिर वही दिमाग़ी ऊहापोह
कौन चाहता है मुझे, किसे ज़रूरत है मेरी?
या ख़ुदा?
और कितने दरवाज़े बचे हैं इस उम्र के बरामदे में
क्या मैं किसी अंधे के हाथ में तस्वीर हूँ?

पाँच

ठंड है
काश, मेरे पास एक क़ंदील होती
तो बदन को गर्माहट मिल सकती

गर्मी है
काश, राहत के लिए
किसी पेड़ का साया होता सिर पर

यह दुनिया…
काश, एक और दुनिया होती
जो हमें ढाँप लेती अपने भीतर

छह

कई पेड़ अपंग हो गए
इस सर्दी में
कुछेक जंगल मिल गए वसंत से
बग़ैर अपने हाथ और पैर के ही
पत्ते बच्चों की तरह मासूम हैं, शोर-बाज़ हैं
नहीं जानते कि अभी-अभी गुज़र गई है ठंड

***

वाक़िफ़ सामेदओलू (5 जून 1939-28 जनवरी 2015) अज़रबैजान के प्रतिष्ठित कवि और नाटककार हैं। उन्हें अज़रबैजान के राष्ट्रीय कवि के अलावा जनकवि का ख़िताब भी हासिल है और वह वहाँ की लोकसभा के सदस्य भी रहे। कभी अज़रबैजान सोवियत रूस का हिस्सा था। अज़रबैजानी भाषा, मुल्क और सोवियत इतिहास के प्रति दृष्टिकोण उनकी कविताओं का प्रमुख स्वर है। अज़रबैजानी सिरिलिक लिपि में लिखी जाती है। कुछ अज़रबैजानी ईरान में तबरेज़ के आस-पास भी रहते हैं और वहाँ अज़रबैजानी फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ सिरिलिक अज़रबैजानी से हिंदी में सीधे अनूदित की गई है। बदक़िस्मती से वाक़िफ़ सामेदओलू और उनकी कविता के बारे में अँग्रेज़ी में ज़्यादा कुछ उपलब्ध नहीं है। यहाँ प्रस्तुत कवि-परिचय और कविताएँ इन लिंक्स से प्राप्त सामग्री पर आधृत हैं :

https://az.wikipedia.org/wiki/Vaqif
http://semedvurgun.dream-test.com/az/vaqif-semedoglu/seirlera
https://www.azadliq.org/a/24248388.htm
http://artkaspi.az/az/deyesen-yasamaq-isteyirem-vaqif-semedolu-seirleri

निशांत कौशिक हिंदी कवि-अनुवादक हैं। वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया से तुर्की भाषा में स्नातक हैं। तुर्की से उनके अनुवाद में अदीब जानसेवेर, जमाल सुरैया, तुर्गुत उयार और बेजान मातुर की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर समय-समय पर शाया होती रही हैं। वह इन दिनों बेंगलुरु में रह रहे हैं। उनसे kaushiknishant2@gmail.com पर बात की जा सकती है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 21वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

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