जीवनानंद दास की कविताएँ ::
बांग्ला से अनुवाद : चित्रप्रिया गांगुली

poems of bangla poet jibanananda das
जीवनानंद दास

हृदय में प्रेम का दिन

हृदय में प्रेम के दिन कब शेष होते हैं
केवल उसकी चिता रह जाती है
हम यह नहीं जानते—लगता है जीवन
जो है बासमती चावल जैसे
रूपवती धान है वह—रूप, प्रेम यही सोचूँ
छिलके जैसा नष्ट और मलिन
एक दिन उन सबकी सारहीनता पकड़ी जाएगी
जब हरा अंधकार, नर्म रात्रि का देश
नदी के पानी की गंध
किसी नवागंतुका का चेहरा लेकर आती प्रतीत होती है
किसी दिन पृथ्वी पर प्रेम का आह्वान
इतनी गहराई से पाया है क्या?
प्रेम है नक्षत्र और नक्षत्र का गान
प्राण व्याकुल है रात की निर्जनता से
गाढ़ी नील अमावस्या से
वह चला जाता है आकाश के दूर नक्षत्र की लाल नील शिखा की खोज में
मेरा यह प्राण अँधेरी रात है
और तुम स्वाति की तरह
तुम वहीं रूप की विचित्र बाती ले आई
प्रेम की धूल में काँटे हैं
जहाँ गहरी सिहरन पृथ्वी के शून्य में
मृत होकर पड़ी थी
तुम सखि डूब जाओगी
लोमहर्षित क्षण भर में
जाते हुए सूर्य की मलिनता में
जानता हूँ मैं, प्रेम फिर भी प्रेम है
स्वप्न लेकर जिएगा वह
वह जा नता है जीना

लौट आओ

लौट आओ समुद्र के किनारे
लौट आओ सीमांतर पथ पर
जहाँ ट्रेन आकर रुकती है
आम, नीम और झाओ के संसार में
लौट आओ
एक दिन नीले अंडे बोए थे तुमने
आज भी वे शिशिर की नीरवता में हैं
पंछियों का झरना होकर
वे मुझे कब महसूस करेंगे

अनंत जीवन अगर पाऊँ मैं

अनंत जीवन अगर पाऊँ मैं—
तब अनंत काल अकेला पृथ्वी पथ पर मैं फिर लौटूँ
और देखूँ यदि हरी घास उग रही है—
देखूँ पीले घास झड़ रही हैं—
देखूँ आकाश को सफ़ेद होते हुए—भोर में—
विच्छिन्न मुनिया की तरह लाल रक्त-रेखा
जिसके हृदय पर लगा होता है सांध्य नक्षत्र पाऊँगा मैं;
देखूँगा अनचीन्ही नारी,
विलग जूड़े की फाँस खोल कर चली जाए—
मुख पे उसके नहीं,
अहा! गोधूलि का नरम आभास
अनंत जीवन यदि पाऊँ मैं—
तब असीमकाल पृथ्वी पर मैं लौटूँ—
ट्राम, बस, धूल देखूँगा बहुत मैं—
देखूँगा ढेर सारी बस्ती, हाट, तंग गली, टूटी हाँडी, मारामारी, गाली, वक्र आँखें, सड़े हुए झींगे
और भी बहुत कुछ—
जो नहीं लिखा
फिर भी तुम्हारे साथ अनंतकाल भी,
अब न हो पाएगा मिलना

स्वप्न

पांडुलिपि पास रख कर
धूसर दीप के पास
नि:स्तब्ध बैठा था मैं;
शिशिर धीरे-धीरे गिर रहा था
नीम की शाखा से एकांत का पंछी
उतर कर उड़ गया कोहरे में कोहरे से दूर और भी कोहरे में
उसी के पंख की हवा से दीया बुझ गया क्या?
अँधेरे में धीरे-धीरे टटोलते हुए ढूँढ़ कर माचिस
जब करूँगा रोशनी, किसका चेहरा दिखेगा, बता सकते हो क्या?

किसका चेहरा? आँवले की डाल के पीछे,
सींग की तरह टेढ़े नीले चाँद ने दिखाया था एक दिन, अहा!
इस धूसर पांडुलिपि ने देखा था एक दिन अहा!
वही धूसरतम चेहरा इस धरती के मन में

तब भी इस पृथ्वी का समस्त उजाला बुझ जाएगा जब,
सारी कहानियाँ ख़त्म हो जाएँगी जब,
मनुष्य नहीं रहेंगे जब, रहेंगे मनुष्य के स्वप्न तब :
वह चेहरा और मैं रहूँगा उस स्वप्न में

***

जीवनानंद दास (17 फ़रवरी 1899-22 अक्टूबर 1954) प्रख्यात बांग्ला कवि-लेखक हैं। उन्हें मरणोपरांत साहित्य अकादेमी (1955) द्वारा पुरस्कृत किया गया। यह सम्मान पाने वाले वाले वह पहले बांग्ला कवि हैं। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ हिंदी अनुवाद के लिए bangla-kobita.com से ली गई हैं। चित्रप्रिया गांगुली मूलतः एक सजग पाठिका हैं और यह प्रस्तुति बांग्ला से हिंदी अनुवाद का उनका प्राथमिक प्रयत्न है। वह पटना में रहती हैं। उनसे chitrapriya_sangeet@rediffmail.com पर बात की जा सकती है।

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