यान कप्लिंस्की की कविताएं ::
अनुवाद : रीनू तलवाड़

jaan kaplinski poet
यान कप्लिंस्की

एक

रेडियो पर बात हो रही है टियानेनमेन नरसंहार की.
तीन बरस हो चुके. उससे कुछ ही अरसे पहले
मैं भी वहां था : चौक उस समय खाली पड़ा था, धूप छिटकी थी.
और रात को पड़ रही थी कड़ाके की ठंड, मगर शहर की आबो-हवा
धूल-भरी थी – पता नहीं कि वह गोबी रेगिस्तान
से आ रही थी या शहर में जहां-तहां बिखरे भवन-निर्माण स्थलों से.
चौक के दूसरी तरफ बड़ी-बड़ी हांडियों में कुछ पक रहा था :
एक डॉलर से कम में कटोरा भर चावल, रसे की सब्जी
और सलाद. वह स्वाद मुझे अब तक याद है जैसे
याद है सभी शहरों के सभी होटलों के दरवाजों पर
कान में आकर फुसफुसाते वे युवक :
एक्सचेंज मनी एक्सचेंज मनी एक्सचेंज चेंज.

दो

गीत और क्रांति में डूबे हुए ग्रीष्म और वसंत.
पॉप्युलर फ्रंट, प्रदर्शन, झड़पें,
समय जो ले जाता है तुम्हें दूर, स्वयं से, कविता से
ताकि तुम देख पाओ उन्हें मानो दूर अंतरिक्ष से
ऐसे देखने पर सब कुछ सितारों में बदल जाता है,
हमारी धरती, तुम और मैं, एस्टोनिया और इरीट्रिया
नीले रत्नज्योत फूल और प्रशांत महासागर भी.
यह विश्वास तक कि कभी और कविताएं लिखोगे तुम
वह जो सांस लिया करता था तुम्हारे भीतर जैसे आते हैं झोंके पुरवाई के
सूने घर में, ताजी कटी घास की खुशबू और भौंकते कुत्तों की आवाजें लिए
– वह कहीं खो गया है, गायब हो गया है जैसे होते हैं तारे दिन में.
बहुत समय हुआ नहीं दी मैंने स्वयं को अनुमति
यह उम्मीद करने की कि वह लौटेगा कभी.
मैं जानता हूं कि मैं स्वतंत्र नहीं हूं, मैं कुछ नहीं हूं उस सांस,
प्रेरणा, खिड़की से आती पुरवाई के बिना.
चाहे उनका अस्तित्व हो या न हो,
ईश्वर को मुक्त ही रहने दो.
और एक बार फिर लौटता है वह
देहात की एक सांझ के धुंधलके में,
जब मैं बढ़ता हूं आउटहाउस की ओर एक नन्हा सफेद पतंगा उड़कर
निकलता है दरवाजे से बाहर. बस, यही है वह पल.
और मुझे घेरती हुई सांझ धीमे-धीमे लेने लगती है सांस
शब्दों और अक्षरों में.

तीन

ईश्वर हमें छोड़ कर जा चुका है – स्पष्ट अनुभव हुआ मुझे
जब मैं रेवाचीनी के पौधे के आस-पास की मिट्टी खोद रहा था.
वह काली और नम थी. मैं नहीं जानता वह कहां है,
पीछे छोड़ गया है केवल कुछ धर्मग्रंथ,
एक-आध मोमबत्ती, एक प्रार्थना-चक्र और एक छोटी-सी घंटी.
घर में पुनः प्रवेश करते समय सोचता हूं मैं कि शायद
कुछ अब भी हो बाकी : जैसे कि लाइलक और मधुचूष की गंध.
फिर अचानक मैं एक बच्चे के चेहरे की कल्पना करता हूं
वहां, उस दूसरे छोर पर, जो अनंतता से
झांक रहा है यहां समय में, आंखें फाड़े देख रहा है
इस समय-रूपी पिजड़े में हमारी आवाजाही, हमारा तमाशा
डूबते सूरज की रोशनी में,
सूरज जो दूर कहीं पश्चिम में
सो रहेगा एक कमलिनी के पात तले.

चार

दुनिया का मध्य-बिंदु यहां है, मेनचेस्टर में.
मैं उसे अपने भीतर लिए चलता हूं
जैसे कि हम सब लिए चलते हैं.
दुनिया का मध्य-बिंदु भेदता है मुझे
जैसे कि भेदता है एक पिन
किसी कीड़े की काया को.
दुनिया का मध्य-बिंदु वह पीड़ा है.

पांच

समूचे एस्टोनिया की तरह टाइलिन में भी बहुत ठंड है.
मैं पहनता हूं ऊनी बनियान, ऊनी मोजे
और एक भारी-भरकम आइरिश स्वेटर.
ठंड में सुन्न हाथ से लिखने का प्रयास करते हुए
मैं स्वयं को दिलासा देता हूं : दिल में अब भी गर्मी है
और दूसरे देश कर रहे हैं गुनगुनी बातें
एस्टोनिया की अर्थव्यवस्था और भविष्य के बारे में.
कब पहुंचेंगे ये गुनगुने शब्द उन लोगों के कानों तक
जिनके पास नहीं हैं पैसे गोश्त खरीदने के लिए,
खरीदने के लिए बिजली का हीटर, चुकाने के लिए गर्म पानी का बिल?
सर्द सुबह में निकली छिपकली की तरह
या उत्तर की ओर खुलने वाली खिड़की पर रेंगती मक्खी की तरह
इस विचार की चाल धीमी है.
हम ठिठुरते हुए चल रहे हैं एक सुनहरे भविष्य की ओर,
साथ लिए इन देर से जन्मीं छिपकलियों और मक्खियों को,
साथ लिए नए कुर्द रिफ्यूजियों को
उनके अजन्मे बच्चों और उनकी कविताओं को
जो कैद हैं किसी भूत या भविष्य के बंदीगृह में.

***

Evening brings everything back से Jaan Kaplinski और Fiona Sampson कृत अंग्रेजी अनुवाद पर आधृत. रीनू तलवाड़ सुपरिचित हिंदी लेखिका, अनुवादक और अध्येता हैं. चंडीगढ़ में रहती हैं. उनसे reenutalwar@gmail.com पर बात की जा सकती है. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 18वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.

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