कविताएँ ::
अदनान कफ़ील दरवेश

अदनान कफ़ील दरवेश | क्लिक : सुघोष मिश्र

एक स्त्री की हत्या में शामिल हूँ

कुर्सियाँ उल्टी पड़ी हैं
तंदूर बुझ चुका है
आस-पास पानी गिरने से
ज़मीन काफ़ी हँचाड़ हो गई है

पत्तलों के ऊढे़ लगे हुए हैं
जगह-जगह डिसपोज़ेबल गिलास और दोने बिखरे हुए हैं
कुत्ते पत्तल चाटते-चाटते थक गए हैं
और अब खेल कर रहे हैं

तंबू और शामियाने अब उजाड़े जा रहे हैं
चमकदार परदे और रॉड उतारे जा रहे हैं

शाम को यहाँ शादी के भोज का एहतमाम था
शाम को यहाँ बत्तियों की जगर-मगर थी
आदमी-बूढ़े-जवान और बच्चियों की चहल-पहल थी
शाम को यहाँ एक नशा-सा था फ़ज़ा में
एक उत्साह, एक उत्सव का माहौल

अब कनिया की बिदाई हो रही है
माहौल में एक अजीब उजाड़-सा है
स्त्रियों का सामूहिक दिखावटी विलाप चल रहा है
कनिया रोकर चुप हो गई है
वधू पक्ष के लोग जहेज़ का सामान
और झपोलियाँ लदवा रहे हैं
सबसे पास कोई न कोई काम है
कन्या का पिता बाहर रसोइए की चौकी पर बैठा है
उसकी आँखों में तसल्ली और दुःख दोनों की रेखाएँ मौजूद हैं

कन्या को दूल्हे की सजी-धजी गाड़ी में अब बिठाया जा रहा है
वह फिर से बिलख रही है
सब उसे सांत्वना दिला रहे हैं

इस वक़्त कन्या के मन में क्या चल रहा है
ये तो शायद वह भी नहीं जानती
आज जिस पुरुष की वह स्त्री मान ली गई है
उसे बिल्कुल नहीं जानती
आज उस स्त्री के प्रथम सहवास का दिन है
आज ही एक पुरुष ने उसे बड़ी धूमधाम से ख़रीद लिया है
आज ही उसकी हत्या होगी
आज ही उसका एक नए घर में पुनर्जन्म होगा
नया सजा-धजा घर
नया शरीर
नए हाव-भाव
नई हँसी
नए विचार
नई संवेदना
इतनी नई कि कुछ दिनों में ही भूल जाएगी
अपना पिछला जन्म
उस प्रेमी का चेहरा भी
जिसे उसने अपने सीने के तहख़ाने में छुपा दिया था
पिता के घर की देहरी लाँघने के बाद ही

कुछ महीनों बाद वह शायद माँ बनेगी
वंश-वृद्धि करेगी
अपनी औलाद को चूमेगी और ढूँढ़ेगी उसमें अपने प्रेमी का खोया चेहरा
लेकिन ऐसा कभी-कभी ही होगा…

मैं ये वाक़या इसलिए कह रहा हूँ
क्योंकि इन सारी चीज़ों का मैं भी गवाह हूँ
लेकिन अब कुछ कहा नहीं जा रहा मुझसे
बस सिर झुकाए खड़ा हूँ
क्योंकि मैं भी उस स्त्री की हत्या में शामिल हूँ।

ठिठुरते लैंप पोस्ट

वे चाहते तो सीधे भी खड़े रह सकते थे
लेकिन आदमियों की बस्ती में रहते हुए
उन्होंने सीख ली थी अतिशय विनम्रता
और झुक गए थे सड़कों पर

आदमियों के पास, उन्हें देखने के अलग-अलग नज़रिए थे :
मसलन, किसी को वे लगते थे बिल्कुल संत सरीखे
दृढ़ और एक टाँग पर योग-मुद्रा में खड़े
किसी को वे शहंशाह के इस्तक़बाल में
क़तारबंद खड़े सिपाहियों-से लगते थे
किसी को विशाल पक्षियों से
जो लंबी उड़ान के बाद थक कर सुस्ता रहे थे
लेकिन एक बच्चे को वे लगते थे उस बुढ़िया से
जिसकी अठन्नी गिर कर खो गई थी; जिसे वह ढूँढ़ रही थी
जबकि किसी को वे सड़क के दिल में धँसी
सलीब की तरह लगते थे

आदमियों की दुनिया में वे रहस्य की तरह थे
वे काली ख़ूनी रातों के गवाह थे
शराबियों की मोटी पेशाब की धार और उल्टियों के भी

जिस दिन हमारे भीतर
लगातार चलती रही रेत की आँधी
जिसमें बनते और मिटते रहे
कई धूसर शहर
उस रोज़ मैंने देखा
ख़ौफ़नाक चीख़ती सड़कों पर
झुके हुए थे
बुझे हुए
ठिठुरते लैंप पोस्ट…

हाथ

इतने छोटे और कोमल हैं उसके हाथ
कि खो जाते हैं मेरी हथेलियों में
और इतने धारदार कि
फेर देती है गले पर
अक्सर…

सोचा न था

सोचा न था कि प्यार में उधड़ जाती है चमड़ी
काँपते हैं जवानी में ही हाथ और पाँव
बदसूरत हो जाती है ज़ुबान
अँधेरे में लानत बरसती है चेहरे पर

सोचा न था कि आत्मा की पीठ पर नीले निशान
अँधेरे में यूँ चमकते हैं
जैसे कि नीली मणियाँ हों
अपनी ही हथेली में सिमट जाता है आदमक़द शरीर
हँसी, बारिश की फुहार-सी लगती है
और रोना एक पुरख़ुलूस इबादत की पाकीज़ा महक की तरह
और तुम्हें देखना, दुनिया का सबसे सुंदर काम हो जैसे
जिसके लिए रात भर इंतिज़ार में काटे जा सकते हैं
और कई रातें एक साथ भी
और कई महीने और कई साल
और कभी तो कमबख़्त ये पूरी उम्र भी!

सोचा न था कि आँखों में वसंत की हवा भी चुभती है प्यार में
और रंग जो मुझे हमेशा से पसंद रहे
एक दिन और कई दिन
मेरे कलेजे में फड़फड़ाएँगे क़ैदी परिदों की तरह

सोचा न था कि एक उदास रात
अपनी खाट की पटिया ऐसे पकड़ कर रोऊँगा
जैसे पिंजड़े की तीली को पकड़े हुए
मृत हो जाते हैं पक्षी

सोचा न था कि प्रतीक्षा में खा जाऊँगा सारे नाख़ून
सुखा लूँगा अपना सारा उबलता ख़ून
लेकिन अगर सोचता तो क्या कर पाता ऐसे प्यार
जैसे कि किया!

सोचा तो ये भी न था
कि प्यार में ही होगा ये सब भी
कि तुम्हें अपना बनाने की मर्दाना ज़िद्द में
कर दूँगा एक दिन तुम्हारी ही हत्या…

कविता-पाठ

एक

मैं चाहता हूँ जब काव्य-पाठ के लिए मंच पर बुलाया जाऊँ
तो अपनी उन कविताओं को सुनाऊँ जिन्हें बरसों से लिख रहा हूँ
और जो शायद अब तक शर्मिंदगी की हद तक अधूरी हैं

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता पढ़ूँ कोई बीच में उठे और मुझे टोक दे कि क्या बकवास पढ़ रहा हूँ जिसका न कोई ओर है और न कोई छोर

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता के सबसे कारुणिक प्रसंग वाली पंक्तियाँ पढ़ूँ तो किसी की पेट में गुदगुदी पड़ जाए और वह हँसता हुआ दोहरा हो जाए
और जब हास्यास्पद प्रसंग बयान करती पंक्तियाँ पढ़ूँ तो कोई सभा में दहाड़े मार रोना शुरू कर दे

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता पढ़ूँ तो कोई श्रोता पंक्ति से उठकर मेरी खिल्ली उड़ाए

मैं चाहता हूँ उन अधूरी कविताओं पर, जो शर्मिंदगी की हद तक अधूरी हैं, किसी के होंठ कुछ कहने को हिलें लेकिन कोई शब्द न निकले
बल्कि विचलन में वह अपनी कुर्सी से उठे और काव्य-पाठ के दौरान ही सभा छोड़ कर बाहर चला जाए।

दो

मैं चाहता हूँ जब कविता पाठ के लिए मंच पर जाऊँ
तो कोई हास्यास्पद मुद्रा न अख़्तियार करते हुए
बिना किसी ग़ैरज़रूरी भूमिका के सीधे कविता शुरू कर दूँ

मैं चाहता हूँ कविता में आई चीटियाँ मेरे माथे पर रेंगती हुई मेरे बालों के झंखाड़ में घुस जाएँ
और हरे टिड्डे मेरे कंधों पर मुन्किर-नकीर की जगह तैनात हो जाएँ

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता पढ़ूँ तो कविता में आया चाँद मेरे चेहरे की तरह पीला पड़ जाए
और रात मेरी आँखों की तरह सूनी और काली पड़ जाए

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता पढ़ूँ तो कविता में बजती राइफ़ल की आवाज़
सभा में आतंक पैदा कर दे
और कविता में आई घास
सभा की ज़मीन पर
दरी-सी बिछ कर श्रोताओं के तलुवों में चुभ जाए

मैं चाहता हूँ कविता में आई रेत
श्रोताओं की आँखों में भर कर किरकिराए
और दृश्य को कई बार पोंछ कर साफ़ कर दे

मैं चाहता हूँ कविता में आया लहू मेरी आँखों से टपक कर
मुझे अंधा कर दे
और फिर कोई श्रोता अफना कर उठे
और मेरी जगह
अपनी आवाज़, अपने शब्दों में कविता पूरी करे।

तंदूर

सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब
मेरे कमरे की कँटीली दीवार का नाम है
और दरवेश
एक मानूस असीर का
चर्ख़
एक बूढ़ा अइयार है
जिसकी मक्कारी मेरे इदराक को मुसलसल फ़रेब देती है

मेरी नींद के फाटक पर
सौ मन भारी
ताला लटका हुआ है
जिसकी चाबी नहर-ए-दूद में खो गई
मुझे याद नहीं मेरे हवास की सूरत कुछ भी

मैं
एक ख़्वाब से निकल कर
बदहवास
दूसरे ख़्वाब में दाख़िल होता हूँ
बदन में शोलःज़न होता है भूरा साँप
हर दूसरी छटपटाहट पहली को बोसे देती है
कमरे का ठंडा सीला सन्नाटा
भीतर की हर आवाज़ को
ओक से सुड़ककर पी जाता है

मेरी ख़्वाबगाह एक खौलता तंदूर है
जिसमें रोटियाँ नहीं
मेरा गोश्त पकता है।

वे जानते थे

आँखें रहीं घड़ियाँ
जिनमें पतझड़ सबसे अधिक बार बजा
देह रहा : जर्जर पेड़
जिसमें पीड़ाओं ने सबसे ज़्यादा घोंसले बनाए
हृदय रहा वह रस्ता
जिस पर जमा हुए
सबसे अधिक लाशों के ऊढ़े

प्रेम का निर्झर
राख बना
झड़ा
झड़ता रहा
ढँकता रहा
आत्मा को
जिनसे खिलते रहे घावों के फूल

रोना जिनके लिए प्रेम में था
सबसे बड़ा अनैतिक कर्म
उन्होंने ही कहा : थाम लो आँसू!
क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे
रोने से कम हो जाती है पीड़ा।

तुम

जब जुगनुओं से भर जाती थी
दुआरे रखी खाट
और अम्मा की सबसे लंबी कहानी भी
ख़त्म हो जाती थी
उस वक़्त मैं आकाश की तरफ़ देखता
और मुझे वह
ठीक जुगनुओं से भरी खाट लगता

कितना सुंदर था बचपन
जो झाड़ियों में चू कर
खो गया

मैं धीरे-धीरे बड़ा हुआ
और जवान भी
और तुम मुझे ऐसे मिले
जैसे बचपन की खोई गेंद

मैंने तुम्हें ध्यान से देखा
मुझे अम्मा की याद आई
और लंबी कहानियों की
और जुगनुओं से भरी खाट की
और मेरे पिछले सात जन्मों की
मैंने तुम्हें ध्यान से देखा
और संसार आईने-सा झिलमिलाया किया

उस दिन मुझे महसूस हुआ
तुमसे सुंदर
दरअसल इस धरती पर
कुछ भी नहीं था।

अंतिम प्रार्थना

चाँद—
दफ़ा हो जाओ
हवा—
मुझ तक सुगंध न लाओ
खिड़कियो—
बंद हो जाओ
दीवालो—
और निकट आओ
छत—
मुझ पर झुक जाओ
बत्तियो—
गुल हो जाओ
धड़कनो—
थम जाओ
साँसो—
और न दबाओ
स्मृतियो—
दूर जाओ
अँधेरो—
और गहराओ
कफ़न बनो
मुझ पर छा जाओ।

अदनान कफ़ील दरवेश (जन्म : 30 जुलाई 1994) बहुत कम वय में ही बहुत उर्वर और सतत सक्रिय कवि के रूप में हिंदी समाज में प्रतिष्ठित हो चुके हैं। हिंदी विभागों, संस्थानों, अकादमियों और निर्णायकों की नज़र उन पर गड़ी हुई है। इस नज़र में दाँत बहुत साफ़ और चमकते हुए दीखते हैं, लेकिन अदनान की अब तक प्रकाशित कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि इस कमसिन उम्र में इस सबसे गुज़रते हुए उनके कवि की ‘गली आगे मुड़ती है’। वह बलिया से हैं; फ़िलहाल आजीविका, अध्ययन और अभ्यास के सिलसिले में इन दिनों दिल्ली में रह रहे हैं। उनसे thisadnan@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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