कविताएँ ::
दीपक जायसवाल

Deepak Jaiswal hindi poet
दीपक जायसवाल

लूनी नदी

अमूमन नदियाँ समंदर में जाकर मिल जाती हैं—
पूर्णता को धारण करते हुए
एक सुंदर जीवन जीते हुए।

लेकिन कुछ नदियों को धरती सोख लेती है
या कोई रेगिस्तान उन्हें निगल जाता है।

एक उम्र तलक अपनी हड्डियाँ गलाने के बावजूद
ढेरों-ढेर लोग
एक सुंदर जीवन से कहीं बहुत दूर
गुमनाम मर जाते हैं
कोई समंदर उनका
इंतज़ार नहीं कर रहा होता।

जब माँएँ नहीं होतीं

जिन बच्चों की माँएँ नहीं होतीं
उनकी रेलगाड़ियाँ कहाँ जाती हैं
धड़धड़ाती हुईं
सीटी बजाती हुईं
धुआँ उड़ाती हुईं
उनके इंतज़ार में शिद्दत से बिछी आँखों को
फिर वे कहाँ खोजने जाते हैं
आँचल का वह सिरा
उन हाथों का स्पर्श
उस अनंत नि:स्वार्थ प्रेम के बिना
वे कैसे जीते हैं
यह जानते हुए भी कि इस दुनिया में
उनसे सबसे ज़्यादा प्यार करने वाली आँखें नहीं रहीं
और दुनिया का सबसे कोमल हृदय
उनके लिए अब और नहीं धड़केगा।

जीवन भर
पहाड़-खाई-धूप-बारिश-ठंड झेलते हुए
जब बैलों का एक जोड़ा
अचानक किसी रोज़
आख़िरी बार आँख भर कर देखता है
और ऐसी जगह की यात्रा पर अकेला चल देता है
जहाँ हाँक भी नहीं पहुँचेगी
न फिर कभी लाख चाहतों के बाद भी
हो पाएगा एक दूसरे की हथेलियों का स्पर्श
उन आख़िरी पलों की पीड़ा
इनकी आत्माएँ कैसे सहती होंगी?

जिन बेटियों की माएँ नहीं होतीं
वे किन कंधों पर सिर रखकर रोती हैं
उनका घर उनका आँगन उनका मायका
कहाँ होता है फिर?

मृग-मरीचिका

जन्म और मृत्यु के बीच
बहुत गहरी ऊबड़-खाबड़
सुंदर और ख़तरनाक
हरहराती हुई नदी बहती है

सबने अपने-अपने तिनके
सँभाल रखे हैं जो किसी के कहे अनुसार
उन्हें किसी अँधेरे में
किसी नदी में डूबने से बचा लेंगे

पत्थर पर लिखे सारे नाम
हवाएँ एक रोज़ उड़ा ले जाएँगी
बारिशें उन्हें धुल देंगी एक दिन
सारे ग्रंथ और उनके नियम
बढ़ियाई नदी को बाँध नहीं सकेंगे
जीवन सीमाओं में बँधी-खुदी मापित नहर नहीं है

सारे तिनके मृग-मरीचिका हैं
जो हमें कहीं नहीं ले जाते

पुल का दूसरा छोर
हमारी आँखें कभी नहीं देख सकेंगी

नाव में जितने पत्थर होंगे
पतवार खींचना उतना ही पीड़ादायक होगा
अंतत: यह भी कि नदी के दूसरे छोर पर
किसी को कुछ भी ले जाने की अनुमति नहीं होगी
अपनी आँखें-हाथ-पैर कुछ भी नहीं
सारे पत्थर डुबो दिए जाएँगे
और जिन हृदयों में बने रहने के लिए
आपने सारे जतन किए
उनकी नावें आगे बढ़ निकलेंगी

शिकारी हमारे पैदा होते ही निकल चुका है शिकार पर

जीवन इतना ख़ूबसूरत है
जितना फूलों का खिलना
तितली के पंख
इंद्रधनुष के रंग
हल्की बारिश
किसी चिड़िया का कंठ
किसी बूढ़े दादा का ठहाका।

यह इतना अनिश्चित है
कि हर इक क़दम पर
मौत जैसे आपको माफ़ी दे रही हो
और हम इतने निश्चिंत कि जैसे मान बैठे हों—
यह जीवन हमेशा से हमारा था और रहेगा।

शिकारी हर पल शिकार पर है
हिरण की गर्दन दबोच शेर जैसे चलता है
मौत हमें ले चलेगी एक दिन।

मगर ओह मेरी महत्वाकांक्षाएँ
ख़ून पीती हैं हर इक दिन हर इक पल
यह जानते हुए भी कि एक दिन
मेरी प्यारी चदरिया कफ़न की तरह दिखेगी।

काश कोई रास्ता होता
जिसमें दर्द-रक्त-आँसू-अवसाद की जगहें कम होतीं
और तमाम ज़रूरतों के लिए उठाए गए हाथों को हरदम
यह भी याद होता कि
आग, मिट्टी, क़ब्रें इंतज़ार में बैठी हैं हमारे।

शिकारी हमारे पैदा होते ही
शिकार पर निकल चुका है

जितना नेह होगा
दर्द का खाता उतना लंबा होगा।

हम अपने घोंसलों में चाँद रखते हैं

चाँद हर बार सफ़ेद नहीं दिखता
उनींदी आँखों से बहुत बार वह लाल दिखता है
मेरे दादा जब बहुत देर रात धान काटकर आते
उनका हँसिया चाँद की तरह दिखता।

बहुत बार दादा का पेट इतना पिचका होता कि
उनकी दोनों तरफ़ की पसलियाँ
चाँद की तरह दिखतीं।

मेरी माँ की लोरियों में चाँद
अक्सर रोटी के पीछे-पीछे आता
और बहुत बार आधी पड़ी रोटी
चाँद की तरह दिखती।

ठीक-ठीक याद नहीं शायद
मेरे दादा जैसे-जैसे बूढ़े होते गए
उनकी कमर चाँद की तरफ़ नहीं
जमीन की तरफ़ झुक आई
लेकिन अर्थी पर सोए दादा
हुबहू चाँद की तरह दिखे।

लोग कहते हैं उस रोज़
सारे खेतों में धान की बालियाँ
उनके दुःख और सम्मान में
थोड़ी-थोड़ी-सी आसमान की तरफ़ नहीं
ज़मीन की ओर झुक आईं।

तमाम दुःख मेरे सपनों तक मेरा पीछा करते हैं

मेरी गैया कल बियाते समय क्यूँ मर गई
त्रिवेनी चाचा पूरी उम्र बेलदारी का काम करते-करते
बोझा ढोते-ढोते एक दिन मर गए
मेरे बाऊजी बहुत तेज़ी से बुढ़ाने लगे
और उनका बुढ़ाना मैं रोक नहीं पा रहा

तमाम दुखों में से
मेरा एक दुःख यह भी है कि
मेरे बचपन में दिखने वाले
ढेर सारे लोग जाने कहाँ गुम हो गए?
मेरी स्मृति कभी-कभी मेरा साथ नहीं देती
मेरे गाँव की ओर जाने वाला रास्ता
हर साल थोड़ा और लंबा हो जाता है
कि ध्रुव तारे के बग़ल वाला तारा
अब और धुँधला हो गया है!

दीपक जायसवाल (जन्म : 7 मई 1991) हिंदी कवि-लेखक हैं। ‘कविता में उतरते हुए’ और ‘हिंदी गद्य की परंपरा और परिदृश्य’ शीर्षक से उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं। उनसे deepakkumarj07@gmail.com पर बात की जा सकती है।

5 Comments

  1. अभिषेक यादव September 12, 2019 at 6:46 am

    बहुत ही सारगर्भित कविताएं जो जीवन के मार्मिक एवम जीवन्तता को बयां कर रही है।

    Reply
  2. Sachin September 12, 2019 at 9:44 am

    Wooow ….ek juban me Sab kuch……

    Reply
  3. Avinish Singh September 12, 2019 at 11:22 am

    “तमाम दुख मेरे सपनों तक पीछा करते हैं” और यूँ, सपने आक्रांत होकर लथपथ मेरी नींद पर गिर जाते हैं।

    Reply
  4. Deepak KUSHWAHA September 13, 2019 at 5:08 am

    Bahut achchaa lga kavita padh kr…dipk…..sabhi panktiya bahut he saargarbhit or meaningful hn….
    .badhai deepak..aise he likhte padhte aage badho jivan me.

    Reply
  5. Deepak KUSHWAHA September 13, 2019 at 5:08 am

    Bahut achchaa lga kavita padh kr…dipk…..sabhi panktiya bahut he saargarbhit or meaningful hn….
    .badhai deepak..aise he likhte padhte aage badho jivan me.

    Reply

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *