दिलीप चित्रे की कविताएँ ::
मराठी और अँग्रेज़ी से अनुवाद : तुषार धवल

poet Dilip Chitre
दिलीप चित्रे

सुस्त दिनों का ख़ानाबदोश कारवाँ

सुस्त दिनों का ख़ानाबदोश कारवाँ
सरकता है अनंत के मरुस्थल में
जैसे हमारे दुखों का बोझ उठाए स्वप्न के ऊँट चले जाते हैं
अनिर्मित पिरामिडों की डरावनी छायाओं के पार
मृत्यु की मरीचिका की ओर…

—आकाशगंगा के धूसर प्रवाह की सतह पर तैरते
मेरे घनघोर पागलपन के असंबद्ध प्रतिबिंबों को
जिन आँखों ने चुराया था देशकाल के परे
वे आँखें अब बर्फ़-सी जम गई हैं

वे आँखें अब बर्फ़-सी जम गई हैं और तुम भी, मेरी प्रेरणा—
जो विश्व के अनंत लेंस से उनके उस पार तक देखती थीं—
तुम भी जा रही हो
मुझे छोड़कर
बिखरते शब्दों के घने होते अँधेरों में।

‘संथ दिवसांचा लमाण-तांडा’, एकूण कविता 3, पृष्ठ 581

धीमे-धीमे

धीमे-धीमे आओ, जैसे आता है शोक, या फ़ुर्सत से आओ, जैसे आती है दर्द की स्मृति जो
सुन्न हुई पीड़ा तो है पर जो उससे अधिक एक बहुत गहरी यातना भी है
ज़िंदगी ने मुझे पहले भी सुन्न किया है
और मौत ने उसके बाद हमेशा।
आओ मेरे पास जैसे धीमी ताल में आती है कविता
एक अनकहा अर्थ पाने।
धीमे सधे क़दमों से पास आओ मेरे
जैसे आती है मौत
करो मेरे साथ टैंगो का अंतिम मत्त नर्तन
ओ बिजली की गति, चौंका दो मुझे
अपनी गणितीय निरंतरता से
अंकित करो मुझे अपनी ईश्वरीय धुंध पर
और कृपा दो कि धीमा हो सकूँ
गहरे अतल में समाते हुए।

‘Adagio’, As is Where Is, पृष्ठ 298

दर्द के निशान : एक विलंबित सॉनेट

संगीत, गणित, स्मृति, कविता
सभी छोड़ जाते हैं दर्द के निशान
शून्य की भी अपनी ज्यामिति है
सभी निराकारवादी आकारों के घोर समर्थक हैं

उसकी कृपा उसका कोई निशान नहीं छोड़ती
उस्ताद अपने काम के भीतर ही मौजूद होता है
बाख़ और तुकाराम अभी भी मेरे मानक हैं
मेरी पीड़ा के उल्लसित बीज

इंसान हैं हम, चिराग़ जलाते इंसानियत के लिए
यंत्रणाएँ सहते जीवन और मृत्यु के अनुमान विश्व में
प्रेम का सत्यार्थ है ठीक हमारी साँसों के परे
एक अद्भुत चुंबकीय तूफ़ान में

संगीत, गणित, स्मृति और कविता
सभी दर्द के निशान हैं जो सिर्फ़ सूचित करते हैं।

‘Traumatic Traces : A Late Sonnet’, As Is Where Is, पृष्ठ 308

एक गंभीर आवाज़ का आदमी

एक गंभीर आवाज़ का आदमी टहलता है किसी अपार्टमेंट में
लहसुन-सा महकता। वह नग्न है और उसका शिश्न तना हुआ।
वह बेचैन है। बहुत दिनों से वह रह रहा है
संभोग से परे। एक नए रूप का विकराल जीवन
उसके भीतर आकार ले रहा है। उसे नहीं पता है अभी तक कि
कैसे उसका सामना किया जाए। वह रहस्यमय ढंग से बड़ा हो रहा है
स्फटिक की तरह। वह आदमी दर्द करता है।
क्या कोई और हावी हो रहा है?
क्या मुझे मानसिक संतुलन की रक्षा के लिए लड़ना चाहिए?
विवेक में हुए छेद से उसने देख लिया है कुछ
जो उस पार झिलमिला रहा है। अँधेरे में फॉस्फोरस-सी चमकती एक उपस्थिति।
उसे भूख लगती है। वह एक अंडा फोड़कर
पैन में डालता है। ब्रह्मांड फूट निकलता है। बुल्स आई—
एकदम सटीक। कल-पुर्जे मंद पड़ जाते हैं।
जीवन एकायामी है।
इन ज्यामितियों से बाहर आँख के लिए कोई जगह नहीं है।
धड़कनों के पिंजरे में
तुम्हारा अपना ही रहस्य एक बाघ है।

‘A Gravelly-voiced Man’, As Is Where Is, पृष्ठ 133

मुंबई की याद

विषण्ण पीले पड़े, प्रकाश से जाती है शाम की पहली
लोकल, मनुष्यों के लटके हुए गुच्छे सूर्यास्त में चमका कर
चूते पसीने हवा में सुखाते दौड़ते हैं रस्सी पर टँगे घिसे कपड़े
और हर एक स्टेशन की कर्कश शांति में उफनती भीड़
आती है, जैसे हठात् नहीं आए, उगले जा रहे हैं शब्द,
प्लेटफ़ॉर्म दर प्लेटफ़ॉर्म पैरों के पड़ने से भीगी हुई सीढ़ियाँ
इस भव्य शहर में पेशाब की महक, कप-प्लेटों की आवाज़,
यहाँ फुटपाथ पर जलते टुकड़े, यहाँ के ह्रस्व प्रवास,
यहाँ की औरतों की स्राव-भीगी पट्टियाँ, शवों के हार
यहाँ की बस्ती-बस्ती में उड़ते दुखों के गुलाल,
मुझे क्षमा करे मेरे अपूर्ण दिनों की कविता,
ये पेट के कपड़े, ये नालायक़ तुच्छ चीज़ें, यह अध्यात्म
शब्द शब्दों में अचानक उग आने वाली नदियों का, विवरों का।

‘मुम्बईची आठवण’, एकूण कविता 1, पृष्ठ 122

मेरे बचपन का घर

मेरे बचपन का घर ख़ाली पड़ा था
एक धूसर पहाड़ी पर
उसके सभी फ़र्नीचर जा चुके थे
सिवा दादी की चक्की के पाट
और उसके देवी-देवताओं की पीतल की मूर्तियों के

चिड़ियों की मृत्यु के बाद भी
उनकी चहचहाहट मन में गूँजती रहती है
शहर के मिटने के बाद भी
एक धुंधलका हवा को आबाद करता रहता है
पौ फटने के ठीक पहले की रंगहीन दरार में
उस जगह में जहाँ कोई गा नहीं सकता
ध्वनि शिल्पों की महीन नक़्क़ाशियों में
शब्द सन्नाटे बाँटते हैं

मेरी दादी की आवाज़ नंगी शाख़ पर थरथराती है
उस ख़ाली घर में ठुमकता फिरता हूँ
ग्रीष्म और वसंत दोनों जा चुके हैं
पीछे छोड़ एक वृद्ध शिशु
उम्र के कमरों में खोज के लिए।

‘The House Of My Childhood’, As Is Where Is, पृष्ठ 91

घर लौटते पिता

मेरे पिता देर शाम की ट्रेन से यात्रा करते हैं
चुप सहयात्रियों के बीच खड़े उस पीली रोशनी में
उनकी नहीं देखती हुई आँखों से उपनगर फिसलते चले जाते हैं
उनकी पैंट और शर्ट गीली है और उनका काला रेनकोट
कीचड़ से सना और उनका झोला जिसमें किताबें ठुँसी हुई हैं
अब फट कर अलग होने पर है। उम्र से धुंधलाई उनकी आँखें
बुझती हुई बढ़ती हैं घर की तरफ़ मॉनसून की उमस भरी रात में।
अब मैं उन्हें ट्रेन से उतरते हुए देख सकता हूँ
जैसे किसी लंबे वाक्य से एक शब्द गिरा हो।
वे उस धूसर प्लेटफ़ॉर्म की लंबाई को जल्दी-जल्दी पार करते हैं,
रेलवे लाइन पार करते हैं, गली में आ जाते हैं,
उनकी चप्पलें कीचड़ से चिपचिपा गई हैं,
लेकिन वे जल्दी-जल्दी आगे बढ़ रहे हैं।

घर पर वैसे ही, मैं उन्हें फीकी चाय पीते देखता हूँ,
बासी रोटी खाते हुए, एक किताब पढ़ते हुए।
वह शौच को जाते हैं—चिंतन के लिए
मनुष्य का मानव निर्मित दुनिया से दुराव।
बाहर आकर बेसिन के पास वह काँप रहे होते हैं
उनके भूरे हाथों पर ठंडा पानी दौड़ रहा है
कुछ बूँदें उनकी कलाई पर पकते हुए बालों में अटक जाती हैं।
रुष्ट बेटों ने अक्सर उनसे चुटकुले या अपने राज़
साझा करने से मना किया है। अब वह सोने जाएँगे
रेडियो पर आती कड़कड़ाती आवाज़ सुनते हुए, स्वप्न देखते हुए
अपने पूर्वजों और अपने पोते-पोतियों के, सोचते हुए
किसी पहाड़ी दर्रे से किसी महादेश में प्रवेश करते हुए बंजारों के बारे में।

‘Father Returning Home’, As Is Where Is, पृष्ठ 92

मैं चलता हूँ

ये मेरी आँखों की उधेड़ी हुई अंतड़ियाँ हैं, ये मेरे दिमाग़ के गुर्दे
ये रास्ते, ये फुटपाथ, ये मौसम ज़िंदगी के,
यह सीढ़ियों और रस्सियों की दुनिया, ये टंकियाँ,
ये लोहे के पिंजरे।
यह मेरे गलफड़े में तंबाकू
टाइपराइटर, स्तन, पियानो, स्विचबोर्ड,
खनिजों के जंगल, चीख़ें, लहू के ताल
अँधेरे में चमकते रसायन
और रास्ते, फिर, फिर रास्ते, चलते-चलते फिर रास्ते
पूरे खुले हुए राजमार्ग जर्जर,
मैं चलता हूँ, चलता हूँ, चलता हूँ,
गर्भवती स्त्रियाँ, नपुंसक पति, डरे बच्चे,
क्रुद्ध काला जमघट काला कोलाहल
काली मक्खी, काला तकिया, काला गद्दा,
काली महिला, काली मूँछें,
मैं चलता हूँ, चलता हूँ, डगमगाता हूँ,
तेज़ी से, तेज़ी से, तेज़ी से रिक्त होते रास्ते…
पसलियों में क़ैद बस एक मूक पक्षी
करोड़ों रातें, एक ही ख़रब गुना रात,
कंठ किनारे उलट कर जाता हुआ अँधेरा…
शब्द, शब्द, शब्द
मेरे हृदय का उछाल फेंका हुआ तल
गिरकर चूर हो रही आँखें
दोस्त, मेरे डूबते हाथों में आ गई तुम्हारी
गर्दन, तुम्हारी कॉलर…

‘मी चालतो’, एकूण कविता 2, पृष्ठ 306

मृत्यु वह जननेंद्रिय जो हम सभी खोजते हैं

मृत्यु वह जननेंद्रिय है जो हम सभी खोजते हैं
प्रेम का वह खोया हुआ अंग
वह अँधेरा मांसाहारी कंबल
जिसके तले शरीर ओझल हो जाते हैं
एक कामुक और भीगा हुआ मुँह
चुंबन जड़ता है जो उगकर पेड़ हो जाते हैं
तुम्हारी चमड़ी एक प्रचुर ग्रह है
जहाँ कुछ और नहीं बचता है घास के सिवा
राशियों के पिंजड़े में जकड़ा हुआ है आकाश का पशु
जिसकी पाशविक गंध
सीखने के गर्भ की महक है
उसी गर्भ में हमारा मांस उगा था
और हमारी अश्लील खोज की शुरुआत हुई थी।

‘Death Is The Genital We All Seek’, As Is Where Is, पृष्ठ 117

एक कवि का काम

एक कवि का काम हर घंटे
और भी मुश्किल होता जाता है
तुम्हें लगता है मैंने ख़ुद चुना है
इस पहाड़ को?

इस तरह के स्वर के साथ
मेरे पास सत्य को भींचे रहने के अलावा
और कोई विकल्प भी नहीं है जब
वास्तविकता ढह रही हो।

चुपचाप मीनारें चरमरा जाती हैं,
सभी ढाँचे गिर कर ध्वस्त हो जाते हैं;
एक नई कौंध देखने को
मैं फिर से उजड़ जाता हूँ।

यह कोई पहाड़ नहीं है।
यह ख़ुद रोशनी है।
और मैं वह मूर्ख हूँ
जो इस पर चढ़ने की हिम्मत करता है।

‘A Poet’s Task’ As Is Where Is, पृष्ठ 156

***

दिलीप चित्रे (17 सितंबर 1938–10 दिसंबर 2009) सुविख्यात भारतीय कवि हैं। वह मराठी और अँग्रेज़ी दोनों में ही लिखने के साथ-साथ सिनेमा और चित्रकला में भी स्वयं को अभिव्यक्त करते रहे। तुषार धवल हिंदी के सुपरिचित कवि और अनुवादक हैं। वह इन दिनों कोलकाता में रह रहे हैं। उनसे tushardhawalsingh@gmail.com पर बात की जा सकती हैं।

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