श्रीधर नांदेडकर की कविताएं ::
मराठी से अनुवाद : सुनीता डागा

श्रीधर नांदेडकर

इस भ्रम के पेड़ को लांघते हुए

इस उजाले की सीमा को लांघते हुए
अभी नहीं कह सकता हूं मैं विश्वास से
कि कौन है
कौन मेरी पीठ पर लदा हुआ है?
सांप का डंसा हुआ भाई
या कि कोई जख्मी कविता?

इस भ्रम के पेड़ को लांघते हुए
नहीं समझ पा रहा हूं
क्या अपनी ही पगडंडी है यह लालटेन के आगे-पीछे
थरथराते, तेजी से नापते कदमों की
पत्थर-ढेलों से फिसलती आगे बढ़ती
यह धूमिल परछाईं अपनी ही है या नहीं
नहीं समझ पा रहा हूं

इस खून के रिश्ते-सी सूखी-शुष्क
नदी को लांघते हुए
नहीं होता है इस समय अंदाज
इस पत्थर पर कलकल करता पानी था
तब बिल्कुल कहां पर
वह जानलेवा चांद का हंसिया उतरा हुआ था
पानी को तेजी से पीछे ठेलते हुए
उसे पकड़ने के लिए
जिधर ले जाए बहाव उधर ले जाती
क्या वह यही जगह है या नहीं

कुछ भी तो नहीं होता है ज्ञात
उस पानी में हंसिया चांद गुम हुआ या मित्र
उस पानी में हंसिया चांद डूबा या मित्र
कुछ थाह नहीं लगती है

यह आग, यह अरण्य लांघकर
मैं फिर से आ पहुंचा हूं इंसानों की बस्ती तक
यह और एक जाना-पहचाना पेड़
और इस अंतिम परछाईं में
नहीं तय कर पा रहा हूं मैं
कि मेरी पीठ पर से
कुछ क्षणों के लिए यहां पर क्या उतारकर रखना है मुझे
नीले विष की गठरी
या एक जख्मी कविता?

वायलिन के गले की दहाड़

तब तक
मूक जानवर होती है
वायलिन

जतन कर रखना पड़ता है
आत्महत्या कर चुकी
मां के बच्चे का रोना

देखना होता है
एक बार पेड़ से गिरकर
फूटे अंडों की तरफ
और एक बार एक-दूजे को ताकते
कपोतों की आंखों को तलुवे पर धरकर

याद रखना पड़ता है
भूख से बिलबिलाने पर
अपनी थाली में गरम रोटी परोसकर
धुकधुकी से पसीने से तरबतर चेहरे को पोंछते
फटेहाल आंचल को

रंगीन चिथड़ों की झूलती चिड़िया के नीचे
हंसता हुआ नन्हा जीव
बच्चे को पीठ पर लादे
दौड़ते हुए नंगे पैर
पीहर को पीछे छोड़ती रेलगाड़ी

हजारों दृश्य खून में दिपदिपाते रहेंगे
और
समंदर लांघकर
मौत के द्वार पर कदम रखते
बच्चे की दहाड़
वायलिन के गले से बाहर निकलेगी

तब तक
मूक जानवर होती है
वायलिन!

निरीह

एक ऐसा निरीह इंसान
जो बीच चौराहे पर किसी से झगड़ा करने
किसी का गला घोंटने और गाली-गलौज करने के
ख्याल से ही घबरा जाए
मुझमें छुपा हुआ है

एक बेहद साधारण इंसान
जो दो कमरों के घर के भीतर
हिंसक बन जाता है
झुंझलाता रहता है क्रोध से भरा
मुझमें छुपा हुआ है

ऐसा इंसान
जो सब कुछ खुद में छुपाना चाहता है
और कुछ भी छुपा नहीं पाता है
मुझमें छुपा हुआ है

***

श्रीधर नांदेडकर (जन्म : 21 जुलाई 1966) चर्चित मराठी कवि हैं. इनके दो कविता-संग्रह प्रकाशित हैं. सुनीता डागा मराठी-राजस्थानी-हिंदी से परस्पर और नियमित अनुवाद करती रहती हैं. श्रीधर नांदेडकर से shri.nandedkar@gmail.com पर और सुनीता डागा से sunitadaga1@gmail.com पर बात की जा सकती है. कवि की तस्वीरें मैत्रेय पाठक के सौजन्य से.

1 Comment

  1. shailendra shant March 1, 2018 at 3:11 am

    bahut achchi kavitayen! kavi-anuvadak, dono ko badhai!

    Reply

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *