शक्ति महांति की कविताएँ ::
ओड़िया से अनुवाद : राधु मिश्र

Saqti Mohanty poet
शक्ति महांति

धूप का स्टिकर

फ़ुटपाथ की छाँव में ही मिल जाएगा
वह तोता, जो हरे शब्द तो बोल नहीं पाता
पर बता सकता है क़िस्मत का लेखा
उसके पिंजड़े के चार-पाँच कल में से
एक को चुनना होगा इस धूप में

धूप में देखो रफ़्तार में है एंबुलेंस
उसका कोहराम क्या सुनाई नहीं दे रहा होगा
उस आदमी को, जो कष्ट में या कोमा में
घिसटा चला जा रहा है राजपथ पर
नर्स का सफ़ेद पहनावा भी कफ़न-सा लगेगा उसे
बदन भी इस धूप में लग रहा होगा बर्फ़-सा

लू में पलाश-सा दहक रहा ये शहर
गाड़ी भर आइसक्रीम लिए भी वह आदमी
पसीना पोंछते, चप्पल घसीटते पहुँच रहा
प्याऊ में, छाँव उसकी चूर-चूर
बिखर रही, उबलते कोलतार पर

चेहरे पर नक़ाब ओढ़े, गुलाबी टॉप की काँख भिगोए
जो लड़की भागी जा रही चीरकर धूप का शामियाना
तेज़ धूप की छाती पर उसके चक्के की निशानी
शायद कल सुबह की पहली ख़बर बने

सिंदूर से सजे देव-सा लग रहा
यह पोस्ट बॉक्स, जिसे डस्टबिन समझ
कभी-कभार कोई प्रेम-पत्र फेंक जाता
धूप की आँच में नहीं, हथेली के पसीने से भी
उसका पता भीग जाता, यह बात
सिर्फ़ डाकिया ही जानता है

एफ़.एम. रेडियो से कड़ी धूप की ख़बर आ रही
सारी राहें गुलमोहर की क़तार तक पहुँच रहीं
देखो उधर, पारे-सी चमकीली मरीचिका
राह रोक कर बैठ गई और सुंदरी ट्रैफ़िक पुलिस
इक नए रास्ते की ओर इशारे से बुला रही।

अप्रैल

भीगा-भीगा-सा लग रहा यह रास्ता मरीचिका-सा
दिखता, मानो जगह-जगह तुम ही खड़ी हो
तुम्हारे पास घड़ी भर रुक जाना
छाँव-सा, ठंडे पानी-सा
संक्रमण नहीं है मेरे ख़ून में
यह उस फॉर्मासिस्ट की कही हुई बात जैसा

कोई न कोई छटपटाने लगता
जब कोई सूरज गिरता है
दोपहर के कोलतार पर
आओ मेरे स्कूटर के पीछे बैठो
निगल जाए मेरी छाँव तुम्हारे सारे बदन को
और यह अप्रैल की धूप, मेरे माथे को

धूल उड़ाकर जो बस निकल गई
कोई नाविक-सा हाथ हिला रहा
कौन है वह? वह क्या जाने
मुझे पहुँचना कहाँ है

कुछ लोग कीर्तन कर रहे
सड़क किनारे, मंदिर में
पंगत है, प्याऊ लगा है
उस तरफ़ बीयर पॉर्लर में
यहाँ-वहाँ लगी हैं लाल-लाल कुर्सियाँ
किसी के ऋतुस्राव की तरह

मेरे माथे के ऊपर से गुज़रते
गिरा एक हवाई जहाज़
उसकी गाभिन मछली के पेट में
बेशुमार सपनों के घाव लिए
क्या तुम आई होगी, इसी में?
रिक्शे में बुर्का ओढ़कर
इस धूप में कौन है जो घूम रही
तुम्हारी तरह चेहरा छुपाकर?

सायरन बजाते दौड़ रही है एंबुलेंस
मौत को क्या कोई ऐसे ही
घसीट कर ले सकता है राजपथ पर?

छोड़ो किसी का जीना-मरना
मेरे लिए एक ही जैसा
रंग-बिरंगे छाते लिए गुलमोहर या
यूकेलिप्टस के पेड़ तले
तुम हो सकती हो, कहीं भी
एक बीयर है मेरी डिक्की में
अप्रैल और भी बाक़ी है।

फेरीवाला

बाबू जी, ये चश्मा लो, सपने इससे अच्छे दिखते हैं
आँखों में समाया डर, पनियारी आँखों में किसी की
अनचाही छाँव, सब ओझल हो जाएगा इस चश्मे से

ये घड़ी पहन कर देखो तो, कलाई पर खूब जँचेगी
इसकी टिक-टिक उस अदृश्य छिपकिली की सच-सच जैसी
इस घड़ी को पहन कर समय से बाहर भी जा सकते हो
इसकी सूई से सलीब पर टाँग सकते हो समय को

ज़रा इस मुखौटे को लगा कर देखो, अरे वाह तुमको
अब कोई पहचान कर दिखाए, बस इसके पीछे आँखें मूँद लो
और ख़ुद को कनिष्क समझ लो

देखो तो, यह क़लम तुम्हारी छाती पर कितनी सुंदर लगेगी
कोरे काग़ज़ का पन्ना लेकर बैठो और क़लम से उड़ेल दो अपना ख़ून
स्याही से नहीं बाबू जी, ख़ून से कविता लिखो

लो, इस रूमाल में आँसू की हर बूँद खिलती है फूल बनकर
काफ़ी ताज़ा लगती हैं चुंबन की निशानियाँ
बाँध कर देखो माथे पर, काफ़िर-से लगोगे

बाबू जी, चाभी की रिंग भी है, दिखाता हूँ
अपने सारे राज को गूँथ कर झुला देना कमर में उसके
जो बार-बार पड़ती है तुम्हारे प्रेम में
या अतीत के उस कैलेंडर पर लटका देना
जिसकी हर तारीख़ इतिहास है

जरा इस आईने को देखो तो, तुम्हारा पीछा
कर रहीं सारी यादें साफ़-साफ़ दिखेंगी
फ़ोन पर आवेश की तस्वीरों की भीड़ में गुमशुदा
तुम्हारा उजला चेहरा भी दिख जाएगा इस आईने में

ओह, कुछ भी पसंद नहीं आया, ठीक है
ख़ुद पर दरवाजा मत बंद करो, मैं जा रहा हूँ
अच्छा, फ़्री में दे रहा हूँ यह चुंबक, रख लो
यह दिखाता है एक और दिशा, दसों दिशाओं से अलग
ठीक उस तरफ़, जहाँ तुम होते हो।

वाल पेपर

देखा न, नर्सिंग के बच्चे किस तरह
बगुले बन कर उड़ गए झुंडों में
कहा था न, बादल के उमड़ते ही
लड़कियाँ चिड़ियाँ बन जाती हैं

इस बारिश के मौसम में तुम्हारा स्कूटर ही ठीक है
कैप्री पहन कर बाइक पर बैठा नहीं जाएगा
घुटने तक कीचड़, जानते हो
रेन कोट और हेलमेट में
तुम एक अंतरिक्ष यात्री-से लगते हो
और मैं तुम्हें जकड़ कर रखती हूँ इस धरती से

तमाम गर्मी के दिनों में तो चुनरी ओढ़ी
सफ़ेद दस्तानों में मानो अशरीरी का हाथ हो
अब मेरे सारे बदन में घमौरी
प्लीज मुझे भीगने दो, देखो-देखो
चाय के गिलास पर मेरी लिपस्टिक को
वह दूधवाला कैसे घूर रहा है

जानते हो, एक-एक आसमानी बिजली
होती है पचास हज़ार वोल्ट की
इस फ़्लाई ओवर की ऊँचाई पर सिर्फ़
तुम और मैं

अच्छा, इस फ़्लाई ओवर को धनुष बनाकर
काश हमें झटक देता कोई अंतरिक्ष में
जहाँ से ये धरती लगती कदंब के फूल-सी

आज रात बारिश जब खिड़की को झकझोरेगी
और तुम्हारे फ़ोन से काँप उठेगा मेरा तकिया
तब क्या कहूँ तुम्हें, कि आ जाओ
ईश्वर को एक आदिम वाल पेपर
भेंट करने को लौट आओ
इस बारिश की रात में

अरे, अब तो खोलो यह रेन कोट
कितनी अजीब महक दे रहा यह रबड़।

हिसाब

उठो और देखो, उजाले की साज़िश में
एक सवेरा आकर हिसाब माँग रहा है
माँग रहा बिजली का बिल, राशन कार्ड
सब्ज़ी और अगरबत्ती का ख़र्च, ऑटोवाले का बक़ाया
ऊपर से कैलेंडर के बाहर खड़ी कई उनींदी रातें
या रूखे अलार्म की नींद जो टूटी नहीं अब तक

वह बराबर आता है आधी रात को
अपनी उस जरीदार झीनी पोशाक में
बाज़ार में ख़रीददारी के वक़्त मोच खाए
कंधे को सहला कर उसकी दिपदिपाती
आँखों से, छाती पर लद जाता
उसकी भी तो हत्या करके सवेरा
आता है फिर से और हिसाब माँगता है
इतनी जल्दी ख़त्म हो गया तेरी देह का अवशेष!
कितना है फ़ास्टिंग ब्लड सुगर!
घर की ई.एम.आई.!
अब भी तू देख रहा हवाई जहाज़ की ओर
इतनी बेशर्मी से!
अपनी रिंगटोन भी पहचान नहीं पाता भीड़ में
ऐसे न जाने कितना कुछ

जब वह मनिहारी सामान ख़रीदता
पीठ दिखाकर समुद्र की उत्ताल तरंगों को
उसके साथ बीती यादों के अनगिनत पल
ऑवर ग्लास से मेरी छाती के भीतर झरने लगते
और रेलवे जंक्शन-सी मेरी हथेलियों में से
कौन-सी रेखा उसकी है, यह हिसाब भी
माँगता है निर्दयी सवेरा

ट्रेन लाइन में पिछली रात कटे हुए
जानवर-सी एक रात की लाश
कुछ मामूली कविता की पंक्तियाँ
शराब की दो ख़ाली बोतलें
जतन से सहेजे गुप्त स्वप्न की सी.डी.
चू पड़ी इत्र की शीशी
इन सबको एक काले पॉलीथिन में लपेट कर
कचरे के ट्रैक्टर में फेंक आता सवेरा
फिर नए सिरे से हिसाब लिखने को
डायरी का एक नया पन्ना खोलता।

***

शक्ति महांति (जन्म : 1974) समकालीन ओड़िया कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके अब तक चार कविता-संग्रह, तीन उपन्यास और कहानियों की एक पुस्तक प्रकाशित है। वह एक इंजीनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं और भुवनेश्वर में रहते हैं। उनसे saqti.m@gmail.com पर बात की जा सकती है। राधु मिश्र मूलतः ओड़िया साहित्यकार और अनुवादक हैं। ओड़िया के कई महत्वपूर्ण कवियों को ओड़िया से अनुवाद के ज़रिए हिंदी में लाने का श्रेय उन्हें प्राप्त है। वह राउरकेला में रहते हैं। उनसे radhu.mishra7@gmail.com पर बात की जा सकती है।

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *