इंग्रिड जोंकर और लेबोगांग माशिले ::
अनुवाद और प्रस्तुति : विपिन चौधरी

वर्तमान में अफ़्रीका में प्रसिद्ध ‘स्पोकन वर्ड’ और ‘परफॉर्मेंस पोएट्री’ और कविता के दूसरे बहुआयामी रूपों को अफ़्रीका की स्थानीय मौखिक परंपराओं के तर्कसम्मत क्रमागत विकास के रूप में देखा जा सकता है।

अफ़्रीका की स्त्री-कविता का परिदृश्य, गद्य-लेखन के बनिस्बत कुछ शांत रहा है। बाद के दौर में विश्व कविता में शामिल होने के लिए अफ़्रीकी कविता मुस्तैदी से प्रयासरत रही। अफ़्रीका की स्त्री-कविता में कविता में अपने गंभीर सरोकारों से साथ जो नाम सामने आए सामने उसमें इंग्रिड जोंकर का नाम भी आता है, जिन्हें उनके जीवन के एक के बाद एक आने वाले दुखद अध्यायों के चलते दक्षिण अफ़्रीकी की सिल्विया प्लाथ भी कहा गया।

अफ़्रीकी भाषा में लिखने वाली इंग्रिड जोंकर संस्थान-विरोधी कवयित्री मानी जाती हैं। दक्षिण अफ़्रीकी कविता में पहली बार स्त्री के मनोवैज्ञानिक अनुभवों को उन्होंने आवाज़ दी और स्त्री की गहन और जटिल शक्ति को शब्दों में रूपांतरित करने का काम भी बख़ूबी किया।उनका जन्म 19 सितंबर 1933 को डगलस, नॉर्थ केप में हुआ। अपने पहले कविता-संग्रह ‘इस्केप’ 1956 में प्रकाशित होते ही वह चर्चा के केंद्र में आ गईं। जोंकर की अफ़्रीकी कविताओं का अँग्रेज़ी, जर्मन, डच, पोलिश, हिंदी और जूलु में अनुवाद हुआ है। अफ़्रीकी संगीतकारों ने इंग्रिड जोंकर की कई कविताओं को संगीतबद्ध भी किया है। 19 जुलाई 1965 की रात उन्होंने अपने जीवन की समाप्ति के लिए चुनी, केपटाउन के ‘थ्री एंकर बे’ के समुद्र में डूबकर उन्होंने अपना जीवन ख़त्म कर लिया।

ingrid jonker poet
इंग्रिड जोंकर

पलायन

इस वॉकनबर्ग से मैं भाग रही हूँ
और अपने ख़यालों में गॉर्डन बे में वापसी करती हूँ

मेंढ़क के बच्चे के साथ स्वतंत्र तैरते हुए खेलती हूँ
कंडेलब्रा अलॉय1अफ़्रीका में पाया जाने वाला मुसब्बर श्रेणी का पौधा। के वृक्ष पर
उकेरती हूँ स्वस्तिक

एक समुद्र तट दूसरे समुद्र तट तक छिपकर जाने वाला
श्वान हूँ मैं
सायंकालीन हवा के ख़िलाफ़
भौंकती
हक्की-बक्की
अकेली

धोखे में फँसने वाली मूर्ख हूँ मैं
भूखी उड़ान में एकाएक टूट पड़ती है जो
लंबी मृत रातों के परोसे भोजन के लिए

ईश्वर जिसने
मेरी पीड़ा की पूर्ति
तुम्हारे भीतर करने के लिए
हवा और ओस से गढ़ा
तुम्हें

मेरी थकी-हारी देह
जंगली घास और ओस विश्राम कर रही है
उन सभी ठिकानों पर
जहाँ से गुज़रे थे
हम कभी।

*

Lebogang Mashile poet
लेबोगांग माशिले

7 फ़रवरी 1979 को संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मी लेबोगांग माशिले का पहला कविता-संग्रह ‘रिबन ऑफ रिदम’ शीर्षक से साल 2005 में प्रकाशित हुआ। रंगभेद के अंत के बाद 1990 में वह दक्षिण अफ़्रीका लौट आईं। वह दक्षिण अफ़्रीका की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। उनके कविता-संग्रहों और प्रदर्शनों ने युवा स्त्री-कविता की दुनिया में निर्णायक प्रभाव उत्पन्न किया है।

परदेसी के भीतर

घर एक विदेशी ज़मीन है
दुनिया भर में इस भ्रम की ताक़त दर्द देती है
अजनबी मानते हैं कि
परिचित हैं वे मेरे घावों से
छोटे संदूक़ में वे आखों का आह्वान करते हैं
और झूठे आराम से उसे लुभाते हैं

संदूक़ में मैं नहीं रहूँगी
वह नहीं है मेरा आश्रय

घर खिलखिलाहट का नाम है
घर गोलाकार आकृति है
घर एक नुकीला मानसिक हथियार है—
परदेसी आत्मा के ख़िलाफ़ चलाने के लिए

अलग होने से परेशान हूँ मैं
मेरे पाँव उनके दाह से जलते हैं
जिनका राजतिलक
उत्पत्ति के यक़ीन से किया गया है

अपने कुटुंब की खोज में
पृथ्वी पर भटकूँगी मैं
या इस तितर-बितर बक्से के टुकड़ों से निर्मित करूँगी घर
अपने ही हाथों।

***

यहाँ प्रस्तुत कविताएँ क्रमशः Antjie Krog और Andra Brink के अँग्रेज़ी अनुवाद पर आधृत हैं। विपिन चौधरी हिंदी की सुपरिचित लेखिका और अनुवादक हैं। उनसे vipin.choudhary7@gmail.com पर बात की जा सकती है। इस प्रस्तुति की फ़ीचर्ड इमेज़ :  Emitaï (1971)

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *