अदीब जानसेवेर की कविताएं ::
तुर्की से अनुवाद : निशांत कौशिक

edip cansever poet

कमाल है यह मेज

जीवन के प्रेम में डूबा एक आदमी
मेज पर चाबियां रखता है
तांबे के कटोरे में फूल रखता है
दूध रखता है, अंडे रखता है
रोशनी रखता है जो खिड़की से भीतर आ रही है
साइकिल की, घूमते चक्कों की आवाज रखता है
पाव-रोटी की कोमलता, मौसम की नरमी रखता है
वह आदमी हर दिमागी ऊहापोह को
मेज पर रखता है

वह जीवन में जो भी करना चाहता था
उसे मेज पर रखता है

किसे चाहता है, किसे नहीं
वह भी मेज पर रख देता है

तीन गुणा तीन नौ होता है
वह मेज पर नौ रख देता है

नजदीक में खिड़की है और आसमान भी
खींचकर वह मेज पर अनंतता रख देता है

कई दिनों से बीयर पीने की ख्वाहिश है
सो वह भी उड़ेल देता है मेज पर

जागना रखता है, नींद रखता है
भूख रखता है, तृप्ति रखता है

कमाल है यह मेज
इतने वजन के बावजूद कोई शिकायत नहीं
एकाध दफा हिली भी, फिर संभल गई
आदमी बोझ रखता ही रहा इस पर
जबकि

*

आंखें

मानो कोई भी शै
हमारी भीतरी शांति को नहीं उकसा सकती
न शब्द, न वाक्य, कुछ भी नहीं
आंखें ही पा सकती हैं आंखों को

सिवाय और कुछ के, यही समझना काफी है

पत्ते का एक अन्य पत्ते को छूना
इतना करीब, इतना विनम्र

हाथ ही पा सकते हैं हाथों को
इस जमाने में
किसी भी शय के बरअक्स रखते हैं इश्क को
हो जाते हैं एक कि रच सकें दो साये

***

[ अदीब जानसेवेर (8 अगस्त 1928 – 28 मई 1986) जमाल सुरैया एवं तुर्गुत उयार के साथ ही ‘द्वितीय नववादी’ आंदोलन के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, लेकिन उनकी कविताएं उनके समकालीनों की तरह दुरूह नहीं हैं. अदीब जानसेवेर पुराने इस्तांबुल के कापालीचारशी (भूमिगत विशाल बाजार) में कालीन और एंटीक्स (Antiques) बेचते थे. उनकी कविताओं में ऐसी फरोशगाह, खरीद-फरोख्त, दुकानदार, अनजाने ग्राहक, लोगों से बातचीत आदि का जिक्र अक्सर आता है. यहां प्रस्तुत कविताएं उनकी कविताओं के समग्र चयन Sonrasi Kalir से ली गई हैं. निशांत कौशिक जामिया मिल्लिया इस्लामिया से तुर्की भाषा में स्नातक हैं. फिलहाल पुणे में एक कंपनी में अस्थायी रूप से कार्यरत हैं. वह भाषा-विज्ञान में गैर अकादमिक पढ़ाई कर रहे हैं और उसमें ही भविष्य ढूंढ़ रहे हैं. तुर्की से उनके अनुवाद में जमाल सुरैया की कविताएं ‘सदानीरा’ के 19वें अंक में जल्द पढ़ी जा सकेंगी. उनसे kaushiknishant2@gmail.com पर बात की जा सकती है.]

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