नज़्में ::
विनीत राजा

Vineet Raja urdu poet
विनीत राजा

रफ़ाक़त1संग, मेल-जोल।

हमने बसाए घर
बनाए दरवाज़े
लगाईं कुंडियाँ
टाँगे ताले
और अब हम
निकल आएँ हैं गलियों में
कोशिश कर रहे हैं के अपनी चाभियों से
दूसरों के घरों में दाख़िल हो सकें

प्यार

नानी हर रात
इक वही कहानी सुनाती थी
बच्चे सुनते थे
ख़ुश भी होते थे
सो भी जाते थे
इक रात,
अचानक
कहानी पुरानी हो गई

सुलगता रेगज़ार2रेगिस्तान।

सुलगता रेगज़ार
भटकती प्यास
दूर, झिलमिलाता इक सराब3मृगतृष्णा, भ्रम।
जो नज़र में आ रहा है
वो समझ में आ रहा है
दर हक़ीक़त कुछ नहीं
एक मफ़रूज़ा4परिकल्पना, अनुमान। है बस
हर एक सच
अपने झुठलाए जाने का मुंतज़िर5प्रतीक्षा करने वाला। है

फ़िक्र

खूँटे से बँधी बकरी
अपने दायरे में
चर चुकने के बाद
चबा रही है
गले की रस्सी

ख़्वाब

बाढ़ का पानी
उतर गया है
मछलियाँ
खेतों में फँस गई हैं

हिसाब

मेरा शऊर6चेतना।
मेरा जहन्नुम7नर्क। है
तुम
इसके बदले
मुझे
क्या दे सकोगे?

उस पार जाने का नुस्ख़ा

पहले दाएँ देखो
फिर बाएँ
और जब
अपने
आस-पास के
हालात से
मुतमइन8सुरक्षित, शांत, संतुष्ट। हो जाओ
तब आगे चल पड़ो

वापसी

हम जब जंगल से निकल कर
बस्ती में आए
तो अपने नंगे बदन देखकर
शरमा गए
और फिर हमने तजवीज़9सलाह, राय, फ़ैसला निर्णय। की :
ख़ुद को ढँको
एक दूजे से ख़ुद को छुपाते फिरो
और अगर
जंगल की तरफ़
लौटना हो कभी
तो सुनो
है एक रास्ता
जो खुलता है
बंद दरवाज़े के पीछे

***

विनीत राजा उर्दू की नई नस्ल के उन शाइरों में से हैं, जिनके यहाँ प्रयोगशीलता की ज़मीन पक रही है। वह मधुबनी से हैं और उनकी तालीम दिल्ली में हुई है। वह पेशे से सॉफ़्टवेयर डेवलपर और प्रवृत्ति से अध्यवसायी हैं, लेकिन उन्होंने इस अध्यवसाय के समानांतर अब तक प्रकाशन को नहीं आने दिया है। एकाध मौक़ों को छोड़ दें तो वह लगभग अप्रकाशित हैं। उन्होंने अपनी शाइरी को महफ़िलों और जलसों से भी बचाए रखा है। वह सोशल नेटवर्किंग साइट्स से भी दूर हैं। यह ग़ौरतलब है कि उर्दू अदब का बड़ा हिस्सा अब तलक ख़ुद को ग़ज़ल के रूढ़ ढाँचे में ही दुहरा रहा है, ऐसे में विनीत सरीखे शाइर इस प्रचलित धार से अलग रहने की कोशिश कर रहे हैं। हिंदी में यह उनके प्रकाशन का पहला अवसर है। वह दिल्ली में रहते हैं। उनसे vineetraja@gmail.com पर बात की जा सकती है। यहाँ प्रस्तुत नज़्में उर्दू से हिंदी में उन्होंने ख़ुद लिप्यंतरित की हैं। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 20वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

1 Comment

  1. उमेश चरपे March 11, 2019 at 4:44 pm

    बेहतरीन कविताएं …..वक्त की शिनाख्त करती हुई l

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