चिट्ठियां ::
बाबुषा कोहली

सोते हुए मैं आर्किमिडीज हूं
नींदें मेरा एथेंस नगर
स्वप्न मेरे
पानी पर शोध हैं

मेरी कविताओं को पढ़ा नहीं जाना चाहिए

वह,
जो सुन सकता है, सुन ही लेगा
इन अक्षरों की देह में धुकधुकाता
धरती से आकाश तक गूंजता

‘‘यूरेका! यूरेका!’’

*

रात के तीजे पहर मेरे उनींदे चित्त को उसकी आवाज एकदम साफ सुनाई दे रही थी. उसकी आवाज में बेचैनी थी, ढंग में उन्माद था. वह कहे जा रहा था :

‘‘ये मुझे क्या हो गया है?’’

सात जन्मों के स्वप्न मेरी नींद में कोहराम मचाए हुए और हर जन्म में मेरे बाईं ओर नजर आने वाली तू! तेरा प्रश्नहीन चेहरा! तुझे सात वचनों में बांधकर किसी अग्निकुंड की सात बार परिक्रमा कर चुके मेरे सातों विवश मन.

नहीं! ऐसा नहीं हूं मैं!

अपने हर एक मन में मेरा अलग रूप और चेहरा है. दुनिया के सात भरमाने वाले अचरज एक तरफ और मेरे भीतर छुपे सात मन एक तरफ. सबसे शक्तिशाली शासक हुआ करता था मैं जो हर मन की प्रजा पर मनमाने ढंग से राज करता.
सारे मनों को एक मटकी में रखकर घोल देने वाली एक जिद्दी तू! मेरी आत्मा पर पड़े सात तालों को तोड़ कर मेरी देह और मन पर शासन करने वाली सतरंगिनी! मेरे ऊबड़-खाबड़ मन के मानचित्र पर खिंची सात सीमाओं को मिटाने लगी है तू! सात जटिल प्रश्नों से भरा वह पर्चा हूं जिसे तूने उस हिम्मती हातिम की तरह हल कर डाला है.

मेरे मन की सात पृथ्वियां और हर पृथ्वी का एक अलग आकाश. सात समुद्र पार से उड़ कर आई तू वह पहली चिड़िया, जो उड़ान भरती है हर आकाश पर. अलग-अलग ग्रहों की मिट्टी जमा कर मेरे आकाशों पर तूने रंग-बिरंगी रेखाएं खींच दीं. हां! ठीक है कि अपनी इंद्रधनुषी रस्सी से तूने मुझे बांध रखा है पर तू ये जान ले कि मैं बंधने वाला नहीं!

मैं मोह हूं, माया हूं, मृगतृष्णा हूं. खंड-खंड बंटा हुआ मैं द्वैत की देहरी पर बंद पट, और तू अद्वैत की खट! खट!

नहीं! तू मेरे अस्तित्व के लिए खतरा है. मैं तुझे मिटा दूंगा. होगी तू चतुर खिलाड़िन, जो मां के गर्भ से ही व्यूह-भेदने की कला सीख कर आई पर मैं तेरे लिए ऐसा व्यूह रचूंगा, जिसकी कोई काट तेरे पास न होगी.

देखना तू!

सबसे पहले द्वार पर मैं तुझे एक स्वप्न की तरह मिलूंगा. तेरी नींद के घने जंगल में लुका-छिपी खेलते हुए तुझे बहुत दूर तक ले जाऊंगा. दूसरे द्वार पर वसंत ऋतु बन कर तेरे तन-मन पर छा जाऊंगा. तू बौराई-सी तीसरे द्वार तक पहुंचेगी, तब मैं वैद्य का रूप धरूंगा और तेरे तन-मन की पीर के लिए औषधि पीसकर एक पुड़िया में रख दूंगा. पुड़िया हाथ में थामे तू आगे बढ़ेगी तब चौथे द्वार पर मैं नाव बन जाऊंगा और चौड़े पाट वाली उस गहरी नदी के उस पार ले चलूंगा. उस पार पांचवें द्वार पर मैं तेरी सांवली परछाईं बनूंगा और छठे द्वार तक तेरी उजली देह से झरते हुए तेरे साथ चलूंगा. छ्ठे द्वार पर मैं सूर्य बनूंगा और तुझे आश्वस्त कर दूंगा कि तेरी हथेली पर कभी पश्चिम दिशा न होगी.

आखिरी द्वार पर तू मारी जाएगी. हां! तू मारी जाएगी, जादूगरनी!
मारी जाएगी तू!

उस सातवें द्वार पर मैं तुझे प्रेम बनकर मिलूंगा.

*

यूं तो मैं जीवन की ही विद्यार्थी रही हमेशा पर औपचारिक शिक्षा में ह्यूमैनिटीज पढ़ती आई. मेरे बीए और तरह-तरह के एमए के पर्चे भाषाओं और इतिहास, समाज और सभ्यताओं के विकास, संगीत और अन्य कलाओं के इर्द-गिर्द डोलते रहे. अभी ठीक-ठीक याद नहीं कि किस आघात से यह एकरसता चटकी और मेरा वजूद विज्ञान के फर्श पर जा बिखरा.

वह टर्निंग प्वाइंट था. साफ-साफ देखा जा सकता था कि जितना समेटेंगें, उतना फैलेंगे. सूत्र, जब घटनाओं के जरिए आप पर खुलते हैं, तब आप जान जाते हैं कि आकाश उतना भर नहीं है जितना आपके घर की बालकनी से दिखता है. आप अपने नन्हेपन पर खिलखिला पड़ते हैं, संगीत सुनते हैं, प्रेम करते हैं, प्रार्थना करते हैं, जंगल-जंगल खाक छानते हैं और जाने क्या ढूंढ़ते फिरते हैं.

जाने क्या…

फिर जंगल आपके कान में कुछ फुसफुसाते हैं, आप झटपट कागज निकालते हैं, कुछ पर्चियां लिखते हैं, कुछ जेब में संभालते हैं, कुछ हवा में उड़ाते हैं और बस! अगले ठौर की ओर निकल पड़ते हैं.

इधर बीते कुछ बरसों में फिजिक्स के प्रति पैदा हुई असह्य जिज्ञासा मुझे आइन्स्टाइन तक ले जाती है और बरास्ते आइन्स्टाइन मैं मिलेवा से मिलती हूं.

मिस मिलेवा मारिच.

बुद्धिमान और हठीली मिलेवा, कायनेटिक थियरी पर अपने प्रश्नों से प्रोफेसर लेनॉर्ड को चौंकाने वाली मिलेवा, फिजिक्स की क्लास में तमाम पढ़ाकू लड़कों के बीच सख्त चेहरे वाली इकलौती लड़की मिलेवा, अपाहिज मिलेवा, क्रोधी मिलेवा, आइन्स्टाइन को अपना दीवाना बना छोड़ने वाली मिलेवा.

मिलेवा, जो आइन्स्टाइन से संबंध के शुरुआती दिनों में अपने मन को अपनी बर्फीली प्रतिक्रियाओं के पीछे छुपाए रखना चाहती थी. वही मन, जो आइन्स्टाइन के वॉयलिन की निरंजन धुनों पर ताउम्र थिरकना चाहता था, पतली-लंबी उंगलियों पर उनके घुंघराले बाल पिरोने की क्रीड़ा करना चाहता था. अपने अनुशासित व्यक्तित्त्व से दगा करने वाले मन को परे झटक वह लगातार एक चौड़ी दूरी बनाए रखती. लेकिन आइन्स्टाइन जैसे जुनूनी के सामने कब तक ठहरा जा सकता था? सो, मिलेवा नाम की मजबूत इमारत आइन्स्टाइन नाम की आंधी चलने से ढह जाती है.

इस कहानी में बार-बार मेरा मन उस पूरे समय पर ठहरता है, जब आइन्स्टाइन अपने लेक्चर्स छोड़ते थे मिलेवा को प्रेम करने के लिए.

मिलेवा प्रेम करती थी आइन्स्टाइन से, पर उसके भीतर भावों का वह उछाह देखने नहीं मिलता जो उसके प्रेमी में है. इसके उलट कॉलेज के दिनों में ही उसे लगता था कि जो पहचान और सम्मान आइन्स्टाइन को मिल रहा है, उसकी वह भी हकदार थी. आखिर वह भी जीनियस थी, महत्वाकांक्षी थी, मेहनती थी.

लेकिन इतिहास आइन्स्टाइन को चीन्हता है.

मिलेवा और आइन्स्टाइन के मुहल्ले से गुजरते एकाएक मुझसे खलील जिब्रान आ टकराते हैं. जिब्रान, जो कहते हैं कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य इसके भेदों तक पहुंचना है और दीवानगी, इसका एकमात्र रास्ता है.

मैं इस कथा से लौटते हुए E = mc2 के ठीहे पर एक और बार जाने की कोशिश करती हूं, मन नहीं लगता. साइड टेबल की दराज से ढेर सारे कच्चे कागज के पुर्जे निकालती हूं. एक साथ कबीर, रांझा, न्यूटन, डार्क फ्लो रिसर्च, बेन फोगल, इयान राइट, बाबा बुल्लेशाह, नील आर्मस्ट्रॉन्ग आंखें तरेरने लगते हैं. मैं मुंह मोड़कर देर तक तकिए पर औंधे पड़ी रहती हूं.

बेचैनियों का जलसा जारी है.

मेरा जी करता है मिलेवा से मिलने का, टाइम मशीन पर सवार हो उस तक पहुंच जाने का, उसे गले लगाने का, उसकी हथेलियां चूमने का, उसे यह बताने का, कि देखो! मैं भी आइन्स्टाइन से प्रेम करती हूं. मैं उसे यह भी कहना चाहती हूं कि यह दुनिया आइन्स्टाइन के अतिसक्रिय मस्तिष्क से कम, उनकी दीवानगी से कहीं जियादह समृद्ध हुई है. और यह भी कि यह मैं जानती तो हूं, पर इसे फिजिक्स के किसी नियम से सिद्ध नहीं किया जा सकेगा. इस बिंदु से मेटाफिजिक्स की फ्रेक्वेंसी लगना शुरू हो जाती है.

घर की चुप्पा दीवारें मौसियों जैसे मेरा मन बूझने लगी हैं. जबकि अपना हिसाब-किताब एकदम गड्डमड्ड! पता ही नहीं चलता कि कब फिजिक्स की पगडंडी पर चलना शुरू कर देती हूं और देर तक मेटाफिजिक्स की भूलभुलैया सड़कों पर भटकती हूं. फिर इस ब्रह्मांड में धूल के कण बराबर एक शहर की आग उगलती सुबह को उठती हूं, आइन्स्टाइन से शुरू करती हूं, मिलेवा पर जा अटकती हूं.

आवाजें ही आवाजें हैं हर ओर. मेरे बिस्तर पर कागज फड़फड़ा रहे हैं, दरवाजे खटखटाती रूहें फड़फड़ा रही हैं. मैं नन्हे-नन्हे कदम बढ़ाते हुए विज्ञान की ओर बढ़ती हूं, ज्ञान से उलझती हूं, प्रेम से सुलझती हूं.

इस उलझने-सुलझने के दरमियान मेरी आंखों की कोर से बह निकलने वाले तरल में छुपे छोटे-छोटे मॉलीक्यूल्स नृत्य कर रहे हैं.

टप…टप…टप…

*

…और फिर कथा सुनाने वाली बुढ़िया ने कहा, ‘‘देखना! एक दिन सारे प्रेमी योगी हो जाएंगे और सारे योगी प्रेमी.”

प्रियंवदा को बुद्ध से प्रेम हो गया था. भिक्षाटन के लिए आए बुद्ध के पात्र में हर दिन वह आंसू की दो बूंदें भर देती. बुद्ध आगे बढ़ जाते. तथागत की दृष्टि अपनी जगह थिर, प्रिया की अपनी जगह. न भगवन आंखें ऊपर करते, न प्रिया नजरें फेरती. इस तरह दिन-महीने-साल बीतते रहे. प्रियवंदा ठहर गई थी समय के परे किसी बिंदु पर.

धरती पर समय और मन नामक दो दैत्यों के बीच सदा से ही होड़ रही है. क्षत्राणी प्रियवंदा मन और समय दोनों को ही पराजित कर शक्ति के थिर सिंहासन पर आसीन हो चुकी थी. किंतु प्रेम के निहत्थे देवता ने सशस्त्र प्रियवंदा को हरा कर उसे अपने वश में कर लिया. खगोल-विज्ञान, दर्शन, संगीत, वेद-पुराणों की ज्ञाता विदुषी प्रियवंदा की बुद्धि का लोहा मानने वाले विद्वान भी उसकी थिर दृष्टि के रहस्य से अनभिज्ञ थे. उसका मौन प्रकृति ने अपनी संदूकची में सुरक्षित रखा लिया जिसके भेद तक पहुंचना सरल बात न थी. पत्थरों की जकड़ में रहने वाले ईश्वर से बेहतर कौन जानता है कि इस दुनिया में सर्वाधिक अनुवाद मौन का हुआ है. प्रियवंदा का मौन भी इससे अछूता न था. इधर पेड़-पहाड़-पंछियों की आंखों में अचरज भरता जाता, उधर तथागत के कमंडल में समूचा हिंद महासागर भर जाने को आतुर था.

प्रियंवदा के हाथों पराजित समय सदा ही उसे पटकने की ताक में रहता.

और अंततः वह घड़ी भी आई जब समय को यह अवसर मिला कि वह प्रियवंदा को सैकड़ों व्याधियों से जूझता देख अट्टहास करता. पीड़ा से तड़पती प्रिया को किसी औषधि से आराम न मिलता.

कुछ महीनों पश्चात प्रियवंदा की इस अवस्था का समाचार मठ तक पहुंचा. यह स्थिति ज्ञात होते ही बुद्ध बीच सत्संग से उठ कर प्रिया के घर की ओर चल पड़े. ज्वर से तपती प्रिया को परिजनों ने घेर रखा था. कोई उसके स्वस्थ होने की प्रार्थना करता तो कोई किसी नए वैद्य का पता बताता. अचानक ही बुद्ध को चौखट के भीतर पाकर परिवार के सदस्य चौंक उठे. प्रिया की शैय्या के निकट जा बैठे बुद्ध की बड़ी-बड़ी आंखों से दो बूंदें छलक कर प्रिया की जलती हथेली पर जा पड़ीं.

प्रिया ने आंखें खोलीं, मुस्कुराई और आंखें मूंद लीं.

तभी वातायन में बैठी चिड़िया पंख फड़फड़ा कर अनंत आकाश की ओर उड़ गई.

***

[ बाबुषा कोहली हिंदी की समर्थ कवयित्री हैं. इनसे baabusha@gmail.com पर बात की जा सकती है. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 17वें अंक में पूर्व-प्रकाशित. कवयित्री की तस्वीर सरिता यादव और फीचर इमेज रचना भोला यामिनी के सौजन्य से.] 

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