डायरी ::
मलयज

मेरे लिए तो अप्रकाशित से ही अप्रकाशित पैदा होगा. मैं ‘सादी स्लेट’ लेकर नहीं चल सकता. अब तक का मेरा सब कुछ अगर प्रकाशित हो गया तो फिर मेरे पास सादे कागज के लिए बचेगा क्या? सादे कागज की चुनौती जितनी मेरे प्रकाशित से है, उतनी ही अप्रकाशित से. मैं तो कहूंगा कि प्रकाशित और अप्रकाशित का औसत एक और तीन का होना चाहिए— यह आदर्श है. सब कुछ लिखकर छपा लेना ‘आइसबर्ग’ के उस तीन-चौथाई रहस्य से अपने को वंचित कर देना है. …और लिखना सारे विश्लेषण के बाद एक रहस्यमय क्रिया है, एक रहस्य का चमत्कार, ऐसा जो बिना आहूत सहसा प्रकट होता है और चकित कर देता है.

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हम उम्र के एक ऐसे सख्त जमे हुए शिखर पर हैं जहां से अगर पिघले भी तो नीचे बहना मुश्किल है— हम कौन? नीचे उतरना और बहना. पर चेहरे पर पहाड़ की ऊंचाई और कठोर चट्टानें जो माथे पर फिक्र की शिकनें बनकर धूप में चमकती हैं. हर आदमी अपनी परछाईं का गुलाम है. अपने प्रतिबिंब का मातहत, अपनी ‘इमेज’ का शिकार. अपने को पाने के लिए इस ‘इमेज’ को तोड़ना होगा. एक जगह रहकर प्रतिष्ठा बढ़ाना नहीं, टूटना है, ताकि तत्वों का नया समवाय कायम हो.

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…जो मुझ पर घट रहा है वह कोई दूसरा लिखता तो अच्छा रहता. जो घट रहा है वह अभी स्मृति नहीं बना है. स्मृति में जो चीज चली जाती है उसे पकड़ना आसान है, साक्ष्य है. मैं अपने आप से मुक्त नहीं हूं. मैं बीच में हूं, शब्द किनारे पर.

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…शमशेर जी अपनी कुछ कविताओं की मूल आत्मा में अब प्रवेश नहीं कर पाते. …उन कविताओं को उनके मुंह से सुनकर लगता है जैसे उन कविताओं को उन्हें रचने वाला कवि नहीं, उन्हें रचने वाला भूतपूर्व कवि पढ़ रहा है. यह मेरे लिए एक अनुभव है— यह देखना कि एक कवि किस तरह अपनी कुछ बेहतरीन कविताओं से भी कितना दूर चला जा सकता है.

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वे कविताएं कहां हैं, जिन्हें मैं लिखूंगा…

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मैं कन्फ्यूज्ड हूं, कुछ समझ में नहीं आता. अधिक सोच नहीं पाता. दिमाग उड़ने लगता है. चीजें बेतरह जटिल और उलझी हुई लगती हैं. कई मोर्चे हैं, कोई भी नहीं संभल रहा. मैं सिर्फ उन्हें टालता जा रहा हूं. घर के लोग बहुत उदार हैं जो मुझे सहन कर रहे हैं. मैं बिल्कुल नालायक हूं. मैंने दिया कुछ नहीं, सिर्फ लिया ही लिया…

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शुरू में मुझे हर चीज, छोटी से छोटी चीज जटिल उलझी हुई दिखाई देती है और इससे मैं घबरा जाता हूं, नर्वस हो जाता हूं. बाद में जब मजबूरन (अंतिम क्षण तक जान बचाकर भाग निकलने के दांव से चूक कर) उसमें धंसना पड़ता है तब, तब क्या होता है? चीजें उतनी मुश्किल और जटिल नहीं नजर आतीं. मैं उनकी एक-एक परत में घुसता जाता हूं, और वे पत्तों जैसी एक-एक खुलती जाती हैं. मैं अपने को उनके बीच पाता हूं, और सहसा उनके बाहर. इस एहसास के साथ कि मैंने उनसे गुजरने में कुछ किया है, कुछ जिया है.

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कविता का जो नया अंदाज — भाषा का नया तेवर — अक्सर देखता हूं तो यही लगता है कि उसमें कवि अपने कथ्य के साथ आत्मीय नहीं है, वह कथ्य के भीतर नहीं है बल्कि उसे बाहर से देख रहा है. संयोजित कर रहा है, व्यक्त कर रहा है. जो कथ्य कवि के साथ अंतरंग होगा, आत्मीय होगा, उसका सगा होगा, उसमें भाषा-तेवर की विलक्षणता न होगी, ऊपर तुर्शी और तेजी और चुस्ती और शब्दों का नया-नया गैर-जरूरत बांकपन न होगा.

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आलोचना की जरूरत भक्तिकाल के कवि को न थी. वह लीन रहता था, लीनता में ही रचता था, उसके लिए रचना रचना थी ही नहीं, वह अर्चना थी और उसे वह शक्ति भर शुद्ध भाव-चित्त से करना चाहता था.

आलोचना आधुनिक काल की जरूरत है. जहां से आदमी अपने को कन्फ्रंट करता है, अपने को संबोधित करता है.

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[ प्रस्तुत अंश ‘वाणी प्रकाशन’ से तीन खंडों में प्रकाशित, लेकिन अब अप्राप्य ‘मलयज की डायरी’ से साभार हैं. मलयज (15 अगस्त 1935 – 26 अप्रैल 1982) तमाम अनदेखियों और अन्याय के बावजूद हिंदी साहित्य संसार की अप्रतिम प्रतिभाओं में से एक हैं.  

वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने ‘मलयज की डायरी’ पर लिखते हुए अपनी पुस्तक ‘गोलमेज’ में कहा है कि ‘इसकी सबसे अच्छी समीक्षा यही होती कि मैं पूरी डायरी यहां उद्धृत कर देता.’

यह उद्धरण एक अतिकथन है, क्योंकि मलयज की डायरी के पहले (1951-1960) और दूसरे (1961-1970) खंड में बहुत सारे ऐसे इंदराज हैं, जिन्हें ठीक से श्रमपूर्वक संपादित किया जाना चाहिए था. यह संपादन तब तो और भी अनिवार्य हो उठता है, जब यह डायरी मलयज की मृत्यु के करीब 18 सालों बाद प्रकाशित की जा रही हो. वर्ष 2000 में वाणी प्रकाशन से नामवर सिंह के अकुशल और कुरुचिपूर्ण संपादन में ‘मलयज की डायरी’ का प्रथम संस्करण शाया हुआ था. यह कई वर्षों से आउट ऑफ प्रिंट बताया जा रहा है. इसका कोई पेपरबैक संस्करण भी नहीं है. इन तीनों खंडों से चयनित कोई प्रतिनिधि चयन भी नहीं है… ऐसी करतूतें एक प्रासंगिक, बहसतलब, विचारणीय, अर्थपूर्ण और महत्वशाली दृष्टिकोण को दृश्य में अनुपस्थित और अलोकप्रिय करने की साजिश के अंतर्गत आती हैं.

‘मलयज की डायरी’ हिंदी साहित्य में एक बेशकीमती काम है, लेकिन इसे इसके मौजूदा स्वरूप में समग्रता में हासिल करना और पढ़ना एक बोझिल और संघर्षपूर्ण प्रक्रिया है. लेकिन कैसे भी यह डायरी पढ़ी जानी चाहिए— कम से कम इसका तीसरा खंड (1971-1982) तो जरूर ही. मलयज की 47 साल की जिंदगी में मलयज की डायरी के 32 साल एक कीर्तिमान हैं.

इस पोस्ट के माध्यम से ‘सदानीरा’ का विनम्र अनुरोध है ‘वाणी प्रकाशन’ के संचालकों से कि अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच वे किसी कुशल और कर्मठ संपादन के मार्फत लंबे समय से पहुंच से दूर ‘मलयज की डायरी’ का पुनर्प्रकाशन करें. क्योंकि बकौल आलोचक संजीव कुमार : ‘‘साहित्यिक विधा के रूप में डायरी एक जीती-जागती दुविधा है. अपने इस अवतार में वह सार्वजनिक होने के लिए, यानी दूसरों के पढ़ने के लिए लिखी जाती है. यह ख्याल कि वह स्मृतियों के संरक्षण और निजी उपभोग के लिए है या फिर किसी और काल में दूसरों के हाथ लगने वाले कालपात्र का दर्जा हासिल करने के लिए, डायरी में कई ऐसी बातों को दर्ज करा देता है जो अन्यथा/अन्यत्र नहीं कही जा सकतीं.’’]

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