चाबुक ::
शशिभूषण द्विवेदी

मॉडर्न वेदव्यास आजकल बहुत अकेले पड़ गए हैं. यों तो नोट उनके पास कभी रहे नहीं, फिर भी नोटबंदी और जीएसटी से वह हलकान रहे. ऊपर से तुर्रा यह कि उनके अकेले हमराज मॉडर्न गणेश जी का भी आजकल कहीं अता-पता नहीं. सुना यह है कि उन्होंने कहीं चार्टर्ड एकाउंटेसी का धंधा शुरू कर दिया है और खूब फल-फूल रहे हैं. साहित्य से उनका कुछ लेना-देना नहीं सिवाय बेस्टसेलर लिस्ट के. सो मॉडर्न वेदव्यास भटक रहे हैं— कभी यहां, कभी वहां. कभी पान की गुमटी पर कभी शराब के ठेके पर. लोगों ने तो अब उन्हें उधार देना भी बंद कर दिया है. वह ठहरे महाभारत लिखने के शौकीन, लेकिन पाठक हैं कि बेस्टसेलर और फेसबुक के शौकीन हो गए हैं. उन्होंने भी नए जमाने के हिसाब से अपना एक फेसबुक एकाउंट खोल लिया.

फेसबुक एकाउंट क्या खुला, उनकी आंखें ही खुली रह गईं. यहां तो महाभारत के जमाने से भी बड़े महारथी युद्धरत थे. ऐसे-ऐसे साहित्यिक योद्धा जो कभी भीष्म को टक्कर देते, कभी भीम को, कभी अर्जुन को, कभी कर्ण को, कभी द्रोणाचार्य को. कुछ द्रोपदियां भी थीं, कुछ शिखंडी भी थे और कुछ धृतराष्ट्र भी. दुर्योधन और दु:शासन बनने को तो हर कोई उतारू था. यहां कोई एक द्रोपदी नहीं थी जिसका चीरहरण हो और कृष्ण उसे बचाने चले आए हैं. यहां कई द्रोपदियां थीं और मजे की बात यह थी कि उन्हें अपना चीरहरण करवाने में खुद मजा आ रहा था. दुर्योधन और दु:शासन तो बेचारे हो चले थे. वे युद्ध में नपुंसक हो गए थे और खुद की इज्जत बचाने में जुटे थे. धृतराष्ट्रों का आशीर्वाद अब दुर्योधन और दु:शासन पर नहीं, इन्हीं द्रोपदियों पर था जिनके सहयोगी शिखंडी थे.

मॉडर्न वेदव्यास जींस टी-शर्ट पहने देख रहे थे कि अब युद्ध तीर-धनुष से नहीं, वाक्य-बाण से लड़े जा रहे थे और अक्सर ऐसा रात्रि में सुरापान के बाद होता था. अब कोई धीरोदात्त नायक युधिष्ठिर नहीं था जो इन्हें रोक सके. कोई किसी को भी छिनाल या वेश्या कह सकता था, कोई किसी को भी लंपट. स्क्रीनशॉट्स की भरमार थी. कोई कह रही थी कि लंगोट के ढीले पुरुष ही क्यों होते हैं, महिलाओं की भी लंगोटी ढीली होनी चाहिए. कोई महिलाओं के सिंदूर और बिंदी पर सवाल उठा रहा था, कोई मुस्लिम महिलाओं के बुरके पर.

वेदव्यास सोच रहे थे कि हमारे समय में तो यह सब कुछ था ही नहीं था. स्त्री-पुरुष एक ही तरह से रहते थे. पुरुष भी रंग-बिंदु लगाते थे और वस्त्र और श्रृंगार भी लगभग एक जैसे रहते थे, सिवाय कंचुकी के क्योंकि वह उनकी जरूरत थी.

खैर, अब का महाभारत दूसरा है. पतनशील पत्नियों ने मोर्चा संभाला है. उनका मानना है कि उन्नति पतनशीलता से ही होती है, और इसके लिए अपनी सेक्सी तस्वीरें फेसबुक पर डालने जरूरी हैं. वेदव्यास भ्रमित हैं और गणेश जी को ढूंढ़ रहे हैं. संयोग से गणेश जी एक डांस बार में पाए गए. वहां पार्टी जीएसटी और बेस्टसेलर के समर्थन में थी. हिंदी के कवि मदोन्मत्त थे. उन्हें अपना जीएसटी मिल गया था. हुआ यह था कि उन्हें चार हजार की रायल्टी मिली थी जिसमें बारह परसेंट प्रकाशक ने काट लिया, फिर बारह परसेंट सरकार ने काट लिया. मिला कुल बत्तीस हजार. मुफ्त की दारू पार्टी. कवि खुश, लेखक खुश, प्रकाशक खुश. हिंदी का सौभाग्य. चर्चा थी कि किसी को नोबेल मिल जाएगा. बड़े अफसर कवि थे, लॉबिंग भी बड़ी की, लेकिन दुर्भाग्य कि वह हिंदी के कवि थे जबकि अंग्रेजी अच्छी जानते थे. वैसे जानने से क्या होता है? अंग्रेजी तो हम भी जानते हैं, लेकिन हिंदी भी ठीक से नहीं लिख-बोल पाते— मंच पर तो खासकर. मंचीय कवि और कलाकार तो वैसे भी अच्छा बोल लेते हैं.

‘कवि होड़ है तुमसे’ यह सूक्त-वाक्य बन गया है शायद. अब असली बात जो डांस बार से धुत्त निकले गणेश जी ने बताई कि भाई वेदव्यास, तुम हो बेसिकली चैतन्य चूतिया हो (यह बात कभी ज्ञानरंजन ने कही थी), लेकिन अभी गणेश जी ने कहा तो बात समझ आई. दरअसल, सब लडक़े-लड़कियां अपनी मस्ती में थे और वेदव्यास बेचारे महाभारत के बारे में सोच रहे थे.

एक लडक़ी बार से निकली और वेदव्यास से बोली, ‘‘हैलो, वेदू हाऊ आर यू?’’ वेदव्यास भौंचक. उन्हें इसमें न द्रोपदी दिखी, न सत्यभामा. वह परेशानहाल कनॉट प्लेस की सडक़ों पर भटकते रहे कि एक भूजे वाली मिल गई. उन्होंने उससे पूछा कि तुम कौन? भोलेपन से वह बोली कि महाभारत युद्ध में जब आप महाभारत लिखवा रहे थे तब मैं आपको भूजा खिलाती थी. मैं वही द्रोपदी हूं और जंतर-मंतर पर न्याय के लिए बैठती हूं. हरियाणा में मेरे साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और मैं कृष्ण जी को पुकारती रही. आपने भी सुध नहीं ली. मेरी कंचुकी अब भी वहीं पड़ी है. सरकार ध्यान नहीं देती, और आप लोग आईआईसी में बैठकर खाली बहस करते हैं. मेरी कंचुकी मुझे दिला दो, बस यही चाहती हूं. एक ही तो थी जिसे जाट सब छीन ले गए. आपके महाभारत में भीष्म जी ने हमारा बहुत खयाल रखा. उन्होंने कहा कि मैंने समाज में समरसता बनाए रखने के लिए एक हजार वेश्याओं की नियुक्ति की है. लेकिन भाई वेव्यास, तब की वेश्याएं भी आज जैसी नहीं थीं. उनका भी अपना स्वाभिमान था. वैशाली की नगरवधू को ही देख लो. तब बलात्कार का भी कोई प्रसंग नहीं मिलता. अब हो सके तो हमारे लिए रो लो. हम तुम्हें माफ कर देंगे. सदियों की आदत है…

फिलहाल वेदव्यास रो रहे हैं और गणेश जी को ढूंढ़ रहे हैं कि वह होश में आएं. वैसे गणेश जी जल्दी मिलेंगे, यह उम्मीद तो है. शराब भी कब तक साथ देती है.

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[ शशिभूषण द्विवेदी हिंदी के सुपरिचित कहानीकारों में से एक हैं. उनसे shashibd1@gmail.com पर बात की जा सकती है. यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 17वें अंक में पूर्व-प्रकाशित.]

1 Comment

  1. Shashi sharma. December 9, 2017 at 2:57 pm

    बढ़िया व्यंग्य

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