डायरी ::
मरीना त्स्वेतायेवा
अनुवाद : सरिता शर्मा

Marina Tsvetaeva
मरीना त्स्वेतायेवा, 1913

आत्माओं की पूर्ण सहमति के लिए सांसों के समन्वय की जरूरत है, क्योंकि सांस आप्त्मा की लय होती है.

इस तरह जो लोग एक दूसरे को समझते हैं. उन्हें साथ में टहलना और पास-पास लेटे रहना चाहिए.

हृदय, अंग की महानता. लगातार सावधानी. सबसे पहले खतरे की घंटी बजती है. मैं कह सकती हूं : मेरा दिल प्रेम से नहीं धड़कता, बल्कि मेरा धड़कता हुआ हृदय— प्रेम का कारण है.

हृदय : शरीर का अंग होने की बजाय संगीतमय है.

हृदय गूंजने वाली लकीर, बोझिल, लट्ठा, शक्तिमापक, तापमापक— यह सब कुछ होने के साथ-साथ प्रेम की सही वक्त बताने वाली घड़ी है.

आप दो व्यक्तियों से प्रेम करते हैं, इसलिए आप किसी से प्रेम नहीं करते हैं. क्षमा करें, मगर एन के साथ-साथ मुझे हेनरिच हीने से भी प्रेम है. आप यह नहीं कह सकते कि मैं पहले व्यक्ति से प्रेम नहीं करती हूं. इसलिए एक जिंदा और एक मृत व्यक्ति से एक साथ प्रेम करना— यह बड़ी बात नहीं है. मगर सोचिए, हेनरिच हीने जिंदा होकर किसी भी पल कमरे में आ सकता. मैं वही हूं हेनरिच हीने वही है, बस यह अंतर है कि वह कमरे में आ सकता था.

इस प्रकार : दो लोगों से प्रेम करना, उनमें से कोई भी कमरे में प्रवेश कर जाए, वह प्रेम नहीं है. मेरे द्वारा दो व्यक्तियों को प्रेम करना संभव होने के लिए यह जरूरी है कि उनमें से एक का जन्म मुझसे सौ साल पहले हो चुका हो या कभी हुआ ही न हो (एक तस्वीर, एक कविता). एक ऐसी शर्त जो कभी पूरी नहीं हो सकती है.

और फिर भी ऐसोल्ड का ट्रिस्टन के सिवाय किसी और से प्रेम करने के बारे में सोचना अकल्पनीय है और साराह (मरग्राइत गोतिए) का उसके युवा साथी नहीं, बल्कि किसी और के लिए प्रेम! प्रेम! चिल्लाना हास्यास्पद है.

मैं एक और तरीका सुझाती हूं : जो औरत उसके प्रेमी के कमरे में प्रवेश करने बावजूद हेनरिच हीने को नहीं भूल पाती है, वह सिर्फ हेनरिच हीने से प्रेम करती है.

‘प्रियतम’ नाटकीय है, ‘प्रेमी’ बिंदास है, ‘दोस्त’ अस्पष्ट है. हमारा देश प्रेमियों के लिए नहीं है.

प्यार की पहली झलक दो बिंदुओं के बीच की सबसे कम दूरी है, वह दिव्य सीधी रेखा, जिसके बाद कोई और रेखा नहीं है.

एक पत्र से :

“अगर तुम्हें अब कमरे में प्रवेश करना हो और कहना पड़े : मैं लंबे अरसे तक हमेशा के लिए जा रहा हूं — या : मुझे लगता है मैं अब तुम्हे प्रेम नहीं करता हूं — मेरे खयाल से मुझे कुछ भी नया महसूस नहीं होगा : हर बार जब तुम जाते हो, हर बार जब तुम यहां नहीं होते हो, तुम यहां हमेशा के लिए नहीं होते हो और तुम मुझे प्रेम नहीं करते हो.”

बच्चे की तरह मेरी भावनाओं में कोई हद नहीं है.

किसी आदमी पर औरत की पहली फतह आदमी की किसी और के लिए प्रेम-कहानी होती है. मगर उसकी अंतिम विजय किसी और औरत द्वारा उस आदमी के लिए प्रेम और आदमी के उसके प्रति प्रेम की कथा होती है. जो राज था वह उजागर हो जाता है, तुम्हारा प्यार मेरा हो जाता है… और जब तक वह नहीं होता है, तुम चैन से सो नहीं सकते हो.

जो कुछ भी बताया नहीं जाता है, टूटने से बचा रहता है. लगभग उस तरह जैसे ऐसी हत्या जिस पर पछतावा न किया जाए, ताजा बनी रहती है. प्यार उसी तरह है.

तुम नहीं चाहते कि लोग जानें कि तुम्हें किसी विशेष व्यक्ति से प्रेम है? तो यह कहो : ‘‘वह मेरा आराध्य है!’’ मगर लोग समझ जाएंगे कि उसका अर्थ क्या है.

एक किस्सा :

“जब मैं अठारह साल की बैंकर थी, तब एक यहूदी को मुझसे प्रेम हो गया. मैं शादीशुदा थी और वह भी. वह मोटा था, पर बहुत प्यारा था. हम एकांत में बहुत कम मिलते थे, मगर जब भी ऐसा हुआ, वह मुझसे सिर्फ एक शब्द कहा करता था : ‘जीयो! जीयो!’ और उसने कभी मेरे हाथों को नहीं चूमा. एक बार उसने मेरे लिए एक विशेष शाम का कार्यक्रम रखा, वह अपने साथ अद्भुत नर्तकों को लेकर आया. मुझे उस समय नाचने में बहुत मजा आया! बेहद मोटा होने की वजह से वह खुद नाच नहीं सकता था. आमतौर पर इस तरह मजमों में वह ताश खेला करता था. उस शाम उसने ताश नहीं खेले.”

किसी को टुकड़ों में खुद से जोड़े रखने से बेहतर है कि उसे पूरी तरह से हाथ से निकल जाने दिया जाए.

कमांडर जीत के बाद कहां जाता है, कवि कविता के बाद कहां जाता है— औरत के पास.

व्यक्ति का खुद को अभिव्यक्त करने का अंतिम अवसर आवेग है, जैसे तूफान के होने का अंतिम अवसर आकाश है.

आदमी तूफान है, आवेग आकाश है, जो उसे पिघला देता है.

आह कवियो, कवियो! स्त्रियों को सच्चा प्रेम तुम्हीं करते हो!

गहराई में जाने की इच्छा : रात की गहराई में उतरने की कामना, प्रेम की गहराई. प्रेम : समय में अंतराल.

‘‘अपने खुद के नाम पर’’ का मतलब है जीते हुए प्रेम करना, “तुम्हारे नाम पर” …यानी मर कर प्रेम करना.

तीसरा आदमी हमेशा विषयांतर होता है. प्रेम की शुरूआत में— धन से, प्रेम के अंत में— निर्धनता से.

अनेक संबंधों की कहानी. भावनाओं की रस्सी पर संभलकर चलना.

एक कबाड़ी की कथा :

“मैं उसके लिए अपने प्रेम की घोषणा करता हूं, और बेशक मैं गाना गाने लगता हूं…”

कामुक प्रेम और मातृत्व एक दूसरे से लगभग अलग-अलग रहते हैं. सच्चा मातृत्व मर्दाना है.

बड़ों के सिरों पर कितने ममतामयी चुंबन किए जाते हैं… और बच्चों के सिरों को कितने उदासीन चुंबन दिए जाते हैं!

वहां, जहां मुझे (औरों की वजह से) किसी रचना के बारे में सोचना चाहिए, उसे लिखना चाहिए, पूरा करना चाहिए, वह हमेशा अधूरा रहता है— शुरू करके और बिना कारण बताए उसे अधूरा छोड़ देना, मेरा तरीका नहीं है. मुझे ‘ए’ अच्छी तरह याद है और ‘बी’ याद नहीं है — और तुरंत ‘बी’ की जगह ‘ए’ — मेरी पावन चित्रलिपियां है.

उपन्यास के बारे में मैं यह लिखना चाहती हूं :

मैं बेटे में पिता से प्रेम करती हूं, पिता में बेटे से प्यार करती हूं… अगर ईश्वर मुझे सौ साल की उम्र दे दे, मैं इसे जरूर लिखूंगी!

वह धीरे से कहता है : ”अगर ईश्वर तुम्हें सौ साल दे दे, तुम जरूर ऐसा कर लोगी.”

‘सॉन्ग ऑफ सॉन्ग्स’ को उस देश में लिखा गया था जहां अंगूर फर्शी पत्थर जितने बड़े होते हैं.

‘सॉन्ग ऑफ सॉन्ग्स’ दुनिया भर की वनस्पति और लोग (अनदेखे अमेरिका समेत) एक स्त्री में समाए हुए हैं.

‘सॉन्ग ऑफ सॉन्ग्स’ में सबसे अच्छी बात आन्ना आख्मातोवा की कविता है :

मैपल का लाल पत्ता रख दिया बाइबल में ‘सॉन्ग ऑफ सॉन्ग्स’ में.

“मैं कभी नर्तकी से प्रेम नहीं कर सकता.” वह कहता है, “मुझे हमेशा लगेगा मानो मेरी बांहों में कोई पक्षी फड़फड़ा रहा हो.”

ईर्ष्या दो तरह की होती है. पहली (हमला करने की चेष्टा) खुद से, और से (छाती में मुक्का मारना). अपने आप में. खुद को चाकू घोंपने का आधार क्या है?

मुझे तुम्हें मग से पीना चाहिए था, मगर मैं तुम्हें घूंट घूंट पी रही हूं, जिससे मुझे खांसी उठ रही है.

वे लोग तुमसे दोस्ती कितनी धीमी गति से करते हैं! वे एक मिलीमीटर आगे बढ़ते हैं जबकि मैं एक मील तक सीधी छलांग लगा देती हूं.

एक संतृप्त घोल. पानी और ज्यादा घुल नहीं सकता है. नियम यह है. तुम मुझमें घुले हुए घोल हो.

मैं अथाह टंकी नहीं हूं.

मुझे किसी व्यक्ति के प्रेम भरे उपहार के प्रति उसके प्रेमपूर्ण अतीत की तरह व्यवहार करना चाहिए— यानी पूरी तरह दुराव और रचनात्मकता के आवेग के साथ.

वह मुझे जो प्रलोभन देता है, मैं उनमें से तीन को सबसे महत्वपूर्ण मानती हूं : कमजोरी का प्रलोभन, भावहीनता का प्रलोभन और यह प्रलोभन कि ‘कोई और’ क्या है.

मास्को, 1918-19

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मरीना त्स्वेतायेवा (8 अक्टूबर 1892 – 31 अगस्त 1941) की डायरी के यहां प्रस्तुत अंश हिंदी अनुवाद के लिए ‘अर्थली साइंस : मास्को डायरीज’ से लिए गए हैं. सरिता शर्मा सुपरिचित हिंदी लेखिका और अनुवादक हैं. उनसे sarita12aug@hotmail.com पर बात की जा सकती है.

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