नस्र ::
तसनीफ़ हैदर 

Tasneef Haidar urdu poet MAY 19
तसनीफ़ हैदर

राही मासूम रज़ा ने अपने नॉविल टोपी शुक्ला में लिखा है :

ये बात कहानी और आप-बीती दोनों ही के उसूलों के ख़िलाफ़ है कि पाठक को अँधेरे में रखा जाए। पाठक और गाहक में फ़र्क़ होता है। लेखक और दुकानदार में फ़र्क़ होता है। दुकानदार को अपनी चीज़ बेचनी होती है, इसलिए वो जासूसी कथाकार की तरह कुछ छुपाता है और कुछ बताता है। लेकिन लेखक के पास बेचने के लिए कोई चीज़ नहीं होती। कहानी का ताना-बाना ठप हो तो पाठकों से झूट बोलने की क्या ज़रूरत है।

इस बात से दरगुज़र करने के बावजूद कि कहानी कैसे कही जाए, यह सोचना चाहिए कि कहानी ख़ुद क्या कहती है। एक अख़बार की ख़बर से प्रेरित होकर कहानी लिखने में कोई परेशानी नहीं है, मगर कहानी, कहानी बननी चाहिए, ख़बर नहीं। क्योंकि पढ़ने वाला ख़बर पढ़ चुका है और कहानी ख़बर को ख़बर बनाने वाले हालात पर बात करती है, कहानी का बयान सीधा हो, टेढ़ा हो, गुंजलक हो या उलझा हुआ हो, लेकिन अगर आप यह समझते हैं कि ख़बर की भेल पर थोड़ी-सी चटनी डालकर उसे लोगों के सामने परोस देंगे तो यही कहानी के बुनियादी उसूल को समझने में की गई ग़लती होगी।

राही मासूम रज़ा ने जासूसी कथाकार को दुकानदार कहा है, मैंने उनकी बात यहाँ सिर्फ़ अपनी बात बढ़ाने के लिए पेश की है, मेरा यह मानना बिल्कुल नहीं कि कोई जासूसी कहानी, कहानी नहीं हो सकती क्योंकि उसमें कुछ छुपाया और कुछ बताया जा रहा है; बल्कि बहुत-सी ग़ैर-जासूसी कहानियों की भी यह ख़ास ख़ूबी रही है। बहुत से ऐसे लिखने वाले हैं, जिन्होंने जासूसी कहानियाँ नहीं लिखी होंगी, मगर यह भेद भरा ढंग उन्हें पसंद होगा। जैसे मलयालम लेखक वैकम मुहम्मद बशीर की कहानियाँ हैं। बशीर बहुत कुछ नहीं बताते, उनकी कहानियाँ बिल्कुल आख़िर में न सही, लेकिन किसी न किसी मुक़ाम पर अपने एक बिल्कुल अनोखे पहलू से चौंका देती हैं। और जब पढ़ने वाला चौंक उठता है तो उसके ज़ेहन को धक्का लगता है, वह इसी मुक़ाम से कहानी के बारे में, कहानी में मौजूद छोटे-छोटे क़िस्सों के बारे में नई राय बनाता है या पुरानी राय को बनाए रखते हुए एहतियात से आगे बढ़ता है।

अच्छी कहानियों का बेहतरीन पहलू यह है कि इंसान को जजमेंटल होने से रोकती हैं। लेकिन राही साहब की इस बात को में भी मानता हूँ कि लेखक के पास बेचने की कोई चीज़ नहीं होती, उसमें और दुकानदार में एक बड़ा फ़र्क़ यह होता है कि वह फ़ायदे के लिए नाप-तोल में किसी क़िस्म की धोकाधड़ी का रास्ता नहीं तलाश करता। अब वह साफ़गोई का रास्ता कैसे इख़तियार करता है, पढ़ने वाले के दिमाग़ के साथ किस तरह का रवैय्या अपनाता है, यह मुकम्मल तौर पर उसी लिखने वाले का हक़ है। बाज़-औक़ात मुझे हिंदी कहानियों में कथाकारों का पाठक को दिया जाने वाला लंबा-चौड़ा लेक्चर बोर करता है। यह समस्या उर्दू वालों के साथ नहीं है। उर्दू के अफ़साना-निगार यही काम बयानिए यानी नरेशन से लेते हैं। वे बात बढ़ाते रहते हैं, जब तक पैरा मुकम्मल नहीं हो जाता। दूर क्यों जाएँ, ख़ुद मंटो के यहाँ यह बुराई मौजूद है। मंटो को जितना मैंने पढ़ा उससे मेरी राय यह बनी कि वह वन-लाइन कोटेशन लिखने में माहिर हैं, जुमले गढ़ने में माहिर हैं। उनकी चंद बेहतरीन कहानियों से अलग ज़्यादा-तर में मंटो एक बात कहते हैं, जो बहुत गहरी मालूम होती है, और फिर उस पर लेप मलना शुरू कर देते हैं। इसी चक्कर में उन्हें मालूम नहीं होता और वह अपनी बातों को दोहराये जाते हैं।

मंटो जिन हादसों पर कहानी लिखते हैं, वो उनके समाज में कितने ही विवादात्मक क्यों न हों, कई बार उनके तअल्लुक़ से भी वो जज़बाती मालूम होते हैं। मिसाल के तौर पर मंटो ने ब्लू फ़िल्म पर कहानी लिखी, बुर्के पर कहानी लिखी, सेक्स के दौरान पैदा होने वाली आवाज़ों से पैदा होने वाले फ्रस्ट्रेशन को अपना टॉपिक बनाया, फ़िल्म इंडस्ट्री के नाकाम लोगों को ढूँढ़ा, मज़ारों की पूजा, नैतिकता के भूत और मनोविज्ञान के बिल्कुल अनोखे पहलुओं पर पाँव रखने की कोशिश की। मगर वह ढूँढ़-ढूँढ़ कर ऐसे मुआमलात तलाश करते हैं, जिनसे यह साफ़ मालूम होता है कि वह ख़ुद चाहते हैं कि लोग उनकी कहानियों को डिस्कशन का मौज़ू बनाएँ, ऐसा महसूस होता है जैसे वह कहानियों के लिए कुछ जुमले पहले से सोचते हैं और कई दफ़ा तो पूरी कहानी इस जुमले का हक़ अदा करने में ख़र्च हो जाती है। औरत के मुआमलों में भी मंटो तवाइफ़ों की सोच, उनके काम करने के तरीक़ों और उनसे तअल्लुक़ का ज़िक्र करके एक ख़ास क़िस्म की एक-तरफ़ा फ़िज़ा पैदा करते हैं।

यह सिर्फ़ सवाल है जिस पर मुम्किन है कि उर्दू के आलोचक कुछ मुँह टेढ़ा करें, लेकिन पिछले दिनों शरत्चंद्र की कहानियों को पढ़ते हुए मुझे एक अजीब-सा ख़याल आया, ख़याल बाद में और सवाल पहले पेश करता हूँ। कहीं ऐसा तो नहीं कि मंटो अपने और उन तवाइफ़ों के दरमियान एक क़िस्म का फ़ासला रखने के लिए अक्सर उनके मुँह से ख़ुद को भाई कहलवाते हैं। यह फ़ासला किसी नैतिक उसूल के ज़ेर-ए-असर नहीं बनाया गया है, बल्कि मंटो के बारे में ऐसा सोचना ही बेवक़ूफ़ी है। लेकिन यह ज़रूर है कि वह अपने आपको बतौर कहानीकार पेश करना चाहते हैं और नहीं चाहते कि तवाइफ़ से उनका तअल्लुक़ पढ़ने वाले का ध्यान किसी और सिम्त भटका दे और वह तवाइफ़ की ज़िंदगी को मंटो का ऑब्सेशन समझ ले। सिर्फ़ इस पहलू पर सोचकर देखिए। यह सवाल शरत्चंद्र को पढ़ते हुए कैसे पैदा हुआ?

शरत्चंद्र ने अपनी बहुत-सी कहानियों में औरत और मर्द के जिस रिश्ते को दर्शाया है, वे दरअसल सो कॉल्ड रिश्ते हैं। उनकी कहानियों में लड़का और औरत, लड़की और मर्द, लड़का, लड़की या मर्द , औरत, एक दूसरे से सौतेला, दूर का या बग़ैर कोई रिश्ता रखते हुए और एक दूसरे को भाई, दीदी या ऐसे ही नामों से पुकारते हुए भी उनसे एक क़िस्म के जज़बाती तअल्लुक़ को महसूस ही नहीं करते बल्कि इस पर मज़बूती से डटे भी रहते हैं। समाज में इस रुझान को कौटुम्बिक व्यभिचार से भी ताबीर कर सकते हैं, मगर इससे बचने के लिए शरत्चंद्र ने (जो कि ज़ाहिर है उनके ज़माने की एक बड़ी मजबूरी भी होगी) इन रिश्तों में कोई जिस्मानी तअल्लुक़ पैदा नहीं किया है और किया भी है तो बेहद एहतियात से काम लिया है। मगर उनकी समस्या यह नहीं है कि पाठक इस जज़बाती लगाव से किसी तरह के जिस्मानी रिश्ते का तसव्वुर पैदा करके लुत्फ़ उठा सकता है या नहीं या वह इन रिश्तों में जिस्मानी तअल्लुक़ पैदा करने की ख़्वाहिश के अंश को ढूँढ़ सकता है या नहीं।

मेरा मक़सद इन दो कहानीकारों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं है। मैं सिर्फ़ यह देखना चाहता हूँ कि उर्दू कहानी का बड़ा नुक़्सान मंटो की इस जानिबदारी से कैसे हुआ, मंटो अपने कहानीकार को बचाने के चक्कर में बाज़ दफ़ा औरतों की जिस्मानी ज़रूरतों और बुनियादी ख़्वाहिशों को ज़लील करने से भी नहीं चूकते।

अब आते हैं दूसरी तरफ़। कहानी मेरे ख़्याल में सिर्फ़ यही कहती है कि उसको जस का तस पाठक के हवाले कर दिया जाए। इस काम में किसी क़िस्म का घोटाला करना, उसको अपने फ़लसफ़े की आँच पर ज़्यादा तपाना या फिर उसे बयानिए या नरेशन की मुलम्मासाज़ी का शिकार बनाना दोनों ग़लत बातें हैं। फ़लसफ़ा भी हो, बयानिया भी, मगर कहानी गुम नहीं होनी चाहिए। बहुत-सी कहानियों में (हालाँकि मैंने बहुत कम पढ़ा है) फ़लसफ़ों की तपिश ज़्यादा महसूस होती है, शुरू में दिया हुआ राही मासूम रज़ा का बयान ही देखिए। राही मासूम रज़ा ने कहानी लिखी है, ‘टोपी शुक्ला’। एक शख़्स की कहानी, मगर इस कहानी के बीच-बीच में कभी वह दूसरी औलाद के दुख पर तक़रीर करते हैं, कभी कहानी के फ़न पर, कभी फ़लाँ बात पर कभी फ़लाँ बात पर। इसमें कोई शक नहीं कि इन फ़लसफ़ों को कहानी के दरमियान खपाने का उनका तरीक़ा बहुत ख़ूबसूरत है, जुमले बड़े चुस्त, बातें बहुत अहम और गहरी हैं। मगर कहानी को वापिस लाना पड़ता है। हालाँकि हर लिखने वाला कहानी लिखते वक़्त अपना अंदाज़, अपना ब्यानिया और अपना क़िस्सा ख़ुद गढ़ता है और इस चयन की उसे मुकम्मल आज़ादी है, मगर मुझे ज़ाती तौर पर ऐसी कहानियाँ खलने लगती हैं, जिनमें किसी क़िस्से के जन्म लेने के कारणों पर मुसन्निफ़ या लेखक कहानी के दौरान रोशनी डालने लगे। यह शायद उस कमज़ोरी की तरफ़ एक इशारा है, जिसे कहानी लिखने वाला ख़ुद भी समझ जाता है कि पढ़ने वाले तक उसकी बात सिर्फ़ उसकी कहानी नहीं पहुँचा सकती, इसलिए चुपके से अपना नुक़्ता-ए-नज़र मज़हबी टेक्स्ट की व्याख्या की तरह चिपका देना ही ज़्यादा बेहतर है। यह ख़याल इन दिनों कुछ और शिद्दत इसलिए इख़तियार कर गया क्योंकि तमिल लेखक-बुद्धिजीवी पेरुमल मुरुगन की कहानियों ने मुझ पर अपना गहरा असर डाला है। उनके मुख़्तसर नॉवि, भयानक समाजी हादसों का नंगा सबूत होने के बावजूद कभी इस तरह के जुमलों के रवादार नहीं होते कि ‘रमेश सोच रहा था कि क्या हम बरसों तक ऐसे ही रहेंगे?’ या ‘क्या हम कभी बदल नहीं सकते?’ वग़ैरह वग़ैरह…

हालाँकि में अपने इस मज़मून में सारी बातें नहीं कहना चाहता, कहानी की ज़बान पर किसी और रोज़ गुफ़्तगू होगी। मगर यह बात सच है कि हमने इस समस्या पर ग़ौर नहीं किया कि कहानी का छोटा-बड़ा होना, उसकी ताक़त को कम नहीं करता। मगर कहानी का ग़ैर-ज़रूरी तौर पर लंबा होना उसके असर को ज़रूर मुतास्सिर करता है। संवाद की सूरत में लिखी जाने वाली कहानियाँ किसी की भी हूँ, मुझे पसंद नहीं आतीं। इसके लिए ड्रामा मौजूद है, मेरे ख़याल में कहानी में डायलॉग सिर्फ़ उसी वक़्त लिखा जाना चाहिए, जब वह बेहद ज़रूरी हो जाए।

ख़ैर, हिंदुस्तानी युनिवर्सिटियों के उर्दू डिपार्टमेंट्स में तो उर्दू अफ़साना अपनी तमाम ‘तरकीबों’ के साथ आज भी पढ़ाया जाता है। और उनके परिचय, आरंभ और उन्नति पर नोट्स भी लिखवाए जाते हैं, मगर यह नहीं सोचा जाता कि कहानी पर सोचने के नए तरीक़ों का रास्ता कैसे खोला जाए। तरकीबों की मदद से किसी शैली को समझना बिल्कुल वैसा ही मज़ाक़ है, जैसा कि औसत निकाले जाने से किसी समाज की असल आर्थिक, शैक्षिक और बौद्धिक दुनिया को समझने का दावा करना है। आप अफ़साने को मुख़्तलिफ़ हिस्सों में बाँट कर, यानी उलझी हुई या आसान कहानी या पता नहीं क्या-क्या कह कर पढ़ा तो सकते हैं, मगर इससे कोई ऐसा फ़ायदा पढ़ने वालों को नहीं होगा, जब तक उन्हें भाँति- भाँति की कहानियाँ पढ़ने का तज’रबा न हो। हमें सिर्फ़ उर्दू की कहानियाँ पढ़ने के बजाय कहानी पढ़ने पर ज़ोर देना चाहिए।

हिंदुस्तान में बंगाली, तमिल, मलयालम, गुजराती, मराठी, कश्मीरी, असमिया और न जाने दूसरी कितनी ज़बानों की कहानियाँ मौजूद हैं; जो यहीं के मुख़्तलिफ़ समाजी चेहरों को उनकी झुर्रियों समेत देखने का मौक़ा देती हैं। ये कहानियाँ चेहरे हों या चेहरों पर सजे ज़ख़्म हों, मगर उनसे अलग-अलग ज़मानों में इंसानी सोच और तरक़्क़ी में टाँग अड़ाने वाली रुकावटें, मुख़्तलिफ़ तहज़ीबें और मौजूदा दौर में उनकी अच्छाइयों-बुराइयों के तअल्लुक़ को जानने का जो मौक़ा मिलता है, वह किसी और तरीक़े से मुम्किन ही नहीं। तकनीकी आलोचना नुक़्सानदेह है, इसके बँधे-टिके उसूलों से दामन छुड़ाना ज़रूरी है। जब हम इन कहानियों को विद्यार्थियों की आँखों के मैदान में आज़ाद छोड़ देंगे तो किसी इम्तिहान की ज़रूरत न होगी और वह ख़ुद को रचना और सोच दोनों ही एतबार से ज़्यादा विकसित महसूस करेंगे।

ये कहानियों का दौर है, और कई कहानियाँ तो अपने कामयाब रचनात्मक सफ़र में नॉविलों को मात दे रही हैं। ऐसे में नॉविल लिखना आसान और कहानी लिखना ज़्यादा मुश्किल हो गया है। और जाते-जाते हमारे बेहतरीन तालीमी निज़ाम की कामयाबी का एक रौशन पहलू दिखाता चलूँ कि अब हमारे पास हिंदुस्तान की नई नस्ल में उर्दू अफ़साना लिखने वाला एक ऐसा नाम नहीं, जिसकी प्रतिभा कहीं से भी ज़िक्र के क़ाबिल हो। यह नतीजा है इस बात पर कान न धरने का कि कहानी ख़ुद क्या कहती है।

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तसनीफ़ हैदर उर्दू की नई नस्ल से वाबस्ता कवि-लेखक हैं। ‘सदानीरा’ पर समय-समय पर शाया उनकी नज़्मों और नस्र को उनके ही लिप्यंतरण/अनुवाद में पढ़ने के लिए यहाँ देखें :

तसनीफ़ हैदर

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