गद्य कविताएँ ::
अंचित

prose poems by Anchit
अंचित

एक यात्रा का वृत्तांत

एक

वापसी कभी पूरी नहीं होती।

यथार्थ के जिस आयाम पर लौटना चाहता हूँ, वह अभी पूरा नहीं बना। कभी बनेगा भी नहीं।

ज़ोर से आँख भींच यह कल्पना करना कि तुम एक यात्री हो। संभवतः यह सफ़र का सबसे कठिन हिस्सा है—उलझन से भरा हुआ—इतना तयशुदा कि दमघोंटू। गंतव्य छूट जाता है हर बार—एक फ़लाँग पीछे।

बचपन का ख़्वाब ही तो कि आँखें खुलें और कुछ भी न बदला हो—एक गाछ जामुन का, दो अमरूद के, बेहिसी का ठिकाना नहीं—भाषा निजी वस्तु धूल में मिला हुआ उजास शोर करता हुआ देह से लग जाता हुआ।

यात्री, खुली आँखें कैदख़ाना बीनती हैं।

दो

मैं बहुत थका हूँ, फिर भी नींद से कोसों दूर। मैं थका नहीं होता तो बताता कि कैसे मैंने इतने शहर देखे फिर भी कहीं नहीं टिक पाया।

मैं थका नहीं होता तो बताता अपनी इच्छाएँ—मैं चाहता था कि मैं पत्थर लिखूँ और लोग पहाड़ समझ लें। बिना समंदर देखे भी यह भरोसा हो जाए कि मैं सफ़र पर निकलते हुए मौसम का समाचार देखना भूल गया था या नक़्शा देखना न आने की वजह से अपनी कश्ती उस ओर लेकर चला गया जहाँ अमूमन डूब जाती हैं कविताएँ।

मैं डूब जाने के लिए निकला था सफ़र पर।

तीन

यात्रा पर अजनबी लोगों के चेहरे देखता रहता हूँ घंटों। सोचता हुआ कि उनके शव कैसे दिखाई देंगे। फिर अपनों का ख़याल आता है और उनके शवों का।

यात्राओं के बर-अक्स भी जीवन मौत से सटकर खड़ा है, बल्कि अमूमन जितना नहीं होता, उतना।

मेरा शव कैसा दिखाई देगा?

अपनी सुंदरता से समझौता मुश्किल है। क्या यह आत्म-मुग्धता है या आत्म-रक्षा या आत्म-मोह या आत्म-करुणा…

चार

एक देह भर छूट जाने से भटकन आ जाती है। एक देह भर मिल जाने से यात्रा में अकेलापन भर जाता है।

इस बात का संगीत से कोई वास्ता नहीं। इसका किसी कोमलता से पाला नहीं पड़ा। यह बात इतनी पाशविक है कि आदिम भाषा नासमझ, फिर भी इतनी भरी हुई आदमियत से कि एक साथ अनगिनत सफ़र पैदा होते हुए।

प्यार सफ़र की तरह ही है—भीतर से बीमार करता हुआ, फिर भी तब्दील होता हुआ प्रतिक्षण।

छूट जाता हुआ एक आधा शब्द—एक आधी नींद भर स्मृति रखता हुआ।

पाँच

जैसे लिखने से ऊब हो जाती है, यात्राओं से भी हो सकती है। काश मैं इस बात को काट सकता।

आदमी प्रेम से ऊब जाता है, नफ़रत से कभी नहीं ऊबता।

यात्राओं से ऊब कहाँ ले जाती है? इस प्रश्न में एक और यात्रा छिपी हुई है।

छह

धैर्य मेरा सहयात्री नहीं था।

बेचैनी मेरी प्रेमिका थी।

दुहराव मेरे सबसे अच्छे दोस्त और ख़राब कविताएँ सबसे अच्छी क़ासिद।

यही होना था।

मेरे पास समय ही नहीं था अमरता के लिए।

दुर्भाग्य लंबा टिकता है जीवन में। आस्था से भर, मैंने एक टूटी हुए मस्जिद से कहा कि सौभाग्य किसी भीड़ वाली जगह पर छू कर निकल जाता है।

सात

सुविधा और यात्रा की पटरी नहीं बैठती।

जाने-अनजाने जो कुछ भी नहीं चुनते, वे सुविधा चुनते हैं। यही पुरानी बात बरतने भर के लिए यात्राएँ अस्तित्व में बनी हुई हैं।

आठ

यात्राएँ आवश्यक हैं—भाषा से मौन की तरफ़, वैचारिक से दैहिक की तरफ़ और जो कुछ भी असाधारण-सा है उससे साधारण की तरफ़—सूक्ष्मताओं की तरफ़—जहाँ संसार का उत्सव है, जहाँ आदमी के अंदर का लोहा उसका इंतज़ार करता है।

शायद तमाम यात्राओं को परिभाषित करने के लिए मैं जो शब्द खोज रहा हूँ, वह है भावुकता—एक साथ व्यावहारिकता, उचाट उदासीनता और निर्लिप्तता का विलोम।

भावुकता—यही एक शब्द मुझे बार-बार जीवन की ओर ले जाता है।

श्रम के बाद ही सही औचित्य परिप्रेक्ष्य में बने रहते हैं।

अंततः मैं भी आदमी हूँ, यह उद्घोष यहीं स्थापित होता है।

***

अंचित की कविताएँ, गद्य, ग्राफिक गल्प, रपट और अनुवाद-कार्य ‘सदानीरा’ पर समय-समय पर सामने आता रहा है। हाल ही में उनका एक कविता-संग्रह ‘शहर पढ़ते हुए‘ शीर्षक से प्रकाश में आया है। वह पटना में रहते हैं। उनसे anchitthepoet@gmail.com पर बात की जा सकती है। उनकी तस्वीर शिरीष पाठक की खींची हुई है।

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