रफ नोट्स : पटना पुस्तक मेला-2017 ::
अंचित

मेरा एक करीबी मित्र मिल्टन की लिखी ‘पैराडाइज लॉस्ट’ पढ़ रहा है. पुस्तक मेले के पास आते हुए, उसका पढ़ने का चयन मजेदार होता जाता है.

पटना पुस्तक मेला इस बार गांधी मैदान में नहीं ज्ञान भवन में हुआ— किताबों का मेला, कहते हैं, बिहार की पहचान है. और यह भी कहते हैं कि बिहार में साहित्य बहुत गंभीरता से पढ़ा जाता है. एक प्रोजेक्ट पर काम करते हुए, मेले के दौरान ही पटना यूनिवर्सिटी से लेकर गांधी मैदान के बीच तकरीबन सौ युवाओं से पूछने पर भी शहर या बिहार के किसी कवि का नाम किसी ने नहीं बताया. सैम्पल साइज पर बहस हो सकती है.

प्रकाशक जो भी चला आए, डिस्काउंट ज्यादा ऑनलाइन ही मिलता है. सो, मेरी पीढ़ी के लिए और उसमें भी जो पढ़ने वाले हैं, उनके लिए तो एक हद तक किताबों के स्टॉल अप्रासंगिक हो जाते हैं.

हिंदी पट्टी में किताब खरीदने के लिए सबसे अच्छी जगह शायद दरियागंज है. कलकत्ते के बाजार से साहित्यिक किताबों को लेकर मुझे जो उम्मीद थी, वह अभी गए हफ्ते ही धराशायी हुई.

नई किताबों वाले लेखकों से बातचीत का कार्यक्रम आयोजक करते रहे हैं और ऐसे कई कार्यक्रम इस बार भी हुए. कमोबेश किसी लिटरेचर फेस्टिवल की तरह ही. हालांकि कविताएं गुम रहती हैं. संजय कुंदन और गीता श्री के इन कार्यक्रमों को मैंने सुना. यहां सवालों को लेकर लोकतंत्र है, भीड़ भी सवाल पूछ सकती है.

जरूरी किताबों में अवधेश प्रीत के उपन्यास ‘अशोक राजपथ’ का विमोचन हुआ. यह किताब शायद हिंदी में शहरों के ऊपर लिखी गई किताबों में मील का पत्थर साबित हो. पटना के लिए भी यह एक सुअवसर लगता है क्योंकि जो आखिरी किताब अपने शहर पर दिखी, वह अंग्रेजी में थी और उसमें जहाज पर चूहा होने की चर्चा थी. उस किताब से किसी किताब की तुलना न ही हो. सो, अपने पटना को अपने पटना जैसे देखने की कुछ इच्छा पूरी होती दिख रही है.

इस पुस्तक मेले को नजदीक से देखते हुए पता चला कि जो मेले में होता है, दरअसल वह सब आयोजकों के हाथ में नहीं होता. कुछ स्लाट्स में मंच संस्थाओं को दिए जाते हैं, कुछ मंचों का हरण होता है और आयोजक शिष्टाचार और अन्य वजहों से शायद मना नहीं कर पाते. इसीलिए लानत भेजते हुए कुछ इनके लिए भी छोड़ दिए जाने चाहिए.

मैं आयोजकों को इधर-उधर भागता देखता रहा. कोई भी कहीं भी गाना-बजाना, कविता-गजल सुनना-सुनाना चालू कर सकता है… इसलिए ज्ञान भवन जैसी छोटी जगह पर मिस-मैनेजमेंट आसान है. मंचों से बेवकूफियां करने का काम बदस्तूर जारी रहता ही है. एक संचालक ने पिछले मेले में भगत सिंह को लेकर कुछ ऐसी मूर्खतापूर्ण टिप्पणी कर दी थी कि उसकी हूटिंग हो गई थी. इस बार भी दो-तीन संचालक उनसे टक्कर लेते दिखे. मुझे लगता है मंच मिलने की अलबलाहट से हिंदी पट्टी के अनेक लोगों का अभिन्न नाता है. उन्हें ट्रेनिंग मिलनी चाहिए, उन्हें इसकी सख्त जरूरत है.

तीस से कम उम्र की स्त्रियों का भी एक कविता-पाठ आयोजकों ने कराया. उन कवयित्रियों में से कुछ उत्साहित करती हैं, पर अधिकांश डराती हैं. एक-आयामी कंटेंट ‘विमर्श’ वाले लेखन को बहुत सीमाओं में बांधता है. अलग तरह के कार्यक्रमों की शुरुआत के लिए भी मेला खास रहा. मैंने कार्यक्रमों का सुझाव देते हुए, कविता की कार्यशाला कराने की बात की थी और संयोजक सत्यम ने इस वादे को बखूबी निभाया.

अब तक के आयोजनों में कविताओं और कवियों के लिए जगह बहुत कम रही है. शहर में और भी जो आयोजन होते हैं— साल में कुछेक, उनमें भी कविता उपेक्षित है. विश्वविद्यालयों की ओर हम न ही चलें तो बेहतर. एक पीढ़ी के कुछ कवि हैं जिनका कविता-पाठ मेले में हर साल हो जाता है. उनमें से एक-दो को सुना और उनसे कुछ सीखा भी जा सकता है. अपनी गंभीरता और प्रासंगिकता तलाशते हुए जब यह मेला कविता के कुछ पास पहुंचा, तब मुझ समेत बीस नए कवियों ने संजय कुंदन और आलोकधन्वा को सुना और उनसे कुछ सीखा.

यह मेला लिट-फेस्ट था?

यह सवाल बहुत सारे लोग पूछते दिखे. ये अच्छा या बुरा है, इस पर भी मैं सोचता रहा. गंभीर साहित्य और उत्सवधर्मिता के परस्पर के संबंध पर भी एक बहस हो सकती है. ‘साहित्य के सर्वहारा’ से ‘साहित्य के बुर्जुआ’ बन पाने की जद्दोजहद भी खूब साहित्यिक भीड़ को मेले की तरफ आकर्षित करती है. आखिर के दो-तीन दिन भीड़ इतनी हुई कि किसी को भी किसी से भिड़ा दिया गया. मंच पर बैठे लोगों को एग्जिट गेट को भी हॉल समझ लेने की भूल करने का अवसर मिलता रहा.

पटना पुस्तक मेले को अपने लिए, वापस गांधी मैदान लौटना ही होगा.

गंभीर साहित्य मेरी समझ से अगर उत्सव है, तो असफलताओं का उत्सव है. एलियट ने ‘हैम्लेट’ को असफल कहा. मुक्तिबोध व्यावहारिकता और महत्वाकांक्षा में कई-कई बार असफल माने गए. हम अपने नायक कैसे तय करते हैं. शेली के सब काव्यात्मक नाटक, खासकर ‘प्रोमेथ्युस’ असफल रहा, क्योंकि उसका मंचन मुश्किल रहा.

मेरे शहर और आस-पास के लोगों में से कई का यह मानना है कि मेलों से और वहां मिले कवियों और लेखकों से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वहां कुछ गंभीर होगा, मसलन विमोचन के समय सिर्फ लेखक-कवि की तारीफ होनी चाहिए और कविताओं पर औपचारिक बात होनी चाहिए. उनके घेराव के लिए किसी विशेष संसद-सत्र का इंतजार किया जाए. मेरे जैसे ‘नए मुल्ले’ के लिए यह थोड़ा मुश्किल काम है.

मैं चाहता था कि यहां किताबों पर भी बात करूं, कुछ ऐसा बताऊं कि लगे कि पुस्तक-प्रेमियों के लिए मेला कुछ विशेष लाया— कोई खास किताब, कोई खास ऑफर.

बहरहाल, मैंने एक किताब पिछले दिनों लंदन से मंगाई और एक खुद कवि को फोन करके, कुछ कलकत्ते से लीं. अगर आप बिल्कुल नए पाठक नहीं तो मेले में आपके लिए कम से कम किताबें तो उंगलियों पर गिने जाने लायक भी नहीं थीं.

मैं आयोजकों से कहना चाहूंगा कि मंच देने से पहले, कुछ कठोर परिमाण तय कर दें. सबसे ज्यादा आयोजकों को ही सुनना पड़ता है. मंच-हरण से बचने के लिए बल का प्रयोग करें. किताबों के प्रति सम्मान और प्रेम जगाने के लिए अब आम साहित्य-प्रेमी को भी अपने स्तर से प्रयत्न करना होगा. पटना के पास लोकतांत्रिक सिर्फ यही एक मेला है जिसकी पहुंच हर वर्ग तक है.

उत्तर-आधुनिकता या उससे भी बेहतर अनुवाद मेरी समझ से है आधुनिकोत्तर, इस समय ने जो विमर्श और संदर्भ दिया है, वहां सब रेखाएं महीन हो जाती हैं और एक सत्य की काट कोई भी एक दूसरा सत्य हो सकता है. मैं और मेरा करीबी मित्र हमेशा ये मानते हैं कि हमारे होने के लिए यह काल एक गलत काल है. हमारी रूहें अभी भी यूरोपियन मॉडर्निज्म का दाना चुगती हैं. पहला फरिश्ता कौन लौटा खुदा की तरफ मिल्टन की किताब में, यह सवाल परेशान नहीं करता— लूसिफर गिरा आसमान से और फिर भी जीता रहा, यह खुश कर देता है.

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[ दृश्य में अपनी उपस्थिति से अचानक या बहुत आहिस्ते-आहिस्ते भी एक विचारोत्तेजना उत्पन्न कर देने वाले किसी नए रचनात्मक व्यक्तित्व को ‘संभावनाशील’, ‘प्रतिभाशाली’, ‘युवा’ वगैरह कहने का चलन है. इस चलन की सफलता हमारी भाषा में व्याप्त ‘संरक्षणशीलता’ को दर्शाती है. यह अपने सबसे बुरे अर्थों में हिंदी साहित्य में मौजूद है और इसका प्राथमिक कार्य संभावनाओं, प्रतिभाओं और युवाओं को बेहाल-ओ-बर्बाद करना है. इसलिए अंचित के लिए यहां इन विशेषणों से बचकर बस यह कहना है कि वह कवि हैं और अपने समय-समाज को लेकर उनकी चिताएं उनके होने में नजर आ रही है. यही बात सबसे पहले आपको बचाती है. 2 दिसंबर से शुरू होकर कल खत्म हुए पटना पुस्तक मेले पर यह रपटनुमा नोट्स अंचित ने ‘सदानीरा’ के आग्रह पर लिखे हैं. उनसे anchitthepoet@gmail.com पर बात की जा सकती है.]

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