Sadaneera - First Editorialशुरुआत ::
आग्नेय

‘वर्तमान साहित्य’ के जनवरी-मार्च’97 के अंक में भवदेव पांडेय का एक लेख ‘मतवाला और निराला’ प्रकाशित हुआ. इस लेख में ‘मतवाला’ के संपादक के रूप में निराला की क्रांतिकारी भूमिका को रेखांकित किया गया. ‘मतवाला’ और निराला ने किस तरह लेखकीय और पाठकीय रुचि में नवाचार लाने के लिए वैचारिक संघर्ष किया और किस तरह पूरे संपादन-काल में निराला का तीखा तेवर संपादक होने की गरिमा को आलोकित करता रहा, इसका तथ्यपरक विवेचन इस लेख से मिलता है.

जैसा कि भवदेव पांडेय ने लिखा है : उग्रता निराला का स्वभाव था, परंपरागत सामाजिक ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए संघर्ष करना उनकी प्रकृति थी, साहित्य की काल्पनिक प्रतिमाओं को खंडित कर उसे नए सांचे में ढालने और आम आदमी की भागीदारी के साथ उसे यथार्थवादी बनाने का प्रयास उनका संकल्प था. वह न रीढ़हीनता के शिकार थे और न समझौतावादी दृष्टि के कायल, क्योंकि वह सही अर्थों में ‘मत वाले’ थे.

क्या आज हमारे रचनात्मक समय में ऐसे मत वाले या मतवाले संपादक और उनके मार्फत संपादित पत्रिकाएं हैं? लघु पत्रिकाओं और तीन-चार बड़ी पत्रिकाओं के संपादकों को छोड़ दें तो यह कहना मुश्किल नहीं होगा कि अनेक संपादक ऐसी पत्रिकाओं के संपादक हैं जो उनके द्वारा ही संपादित, उनके द्वारा ही प्रकाशित, सौभाग्य से या दुर्भाग्य से उनके द्वारा ही पठित हैं. ये वे पत्रिकाएं हैं जिनको उनके संपादक आत्मप्रवंचना में साहित्य के सत्य का बखान करने वाली समझते हैं.

दरअसल, ये वे पत्रिकाएं हैं जिनके उतने ही पाठक हैं जितने उनके लेखक हैं. ये वे पत्रिकाएं हैं, जो इसलिए नहीं निकाली जाती हैं कि वे बिकें या लोग उनको पढ़ें. अपनी साहित्यिक लिप्सा को शांत करने के लिए ही उनका अस्तित्व बनाए रखा जाता है. हजारों की तादाद में छपने वाली ये साहित्यक पत्रिकाएं भंडारों में दबी दीमकों का भोजन बनती रहती हैं. उनके प्रकाशकों और उनके संपादकों को रत्ती भर चिंता नहीं रहती कि कम से कम दो-चार सौ लोग ही सही उनको पढ़ें.

ये पत्रिकाएं संपादकों और अपने मित्र लेखकों को महान रचनाकार सिद्ध करने के लिए छपती रहती हैं. इन पत्रिकाओं के संपादक कुछ अच्छे रचनाकारों को मवेशियों की तरह अपने बाड़े में बांध लेते हैं और इस प्रकार उनकी रचनाशीलता की धीरे-धीरे हत्या करते रहते हैं. कभी ये बंद हो जाती हैं तो फिर नए नामों से निकलने लगती हैं. एक संस्थान से दूसरे संस्थान को हस्तांतरित कर दी जाती हैं. कभी-कभी वे अपना चोला भी बदल लेती हैं, लेकिन उनकी संपादकीय दृष्टि आत्म-केंद्रित बनी रहती है.

दूसरी और कुछ ऐसी पत्रिकाएं हैं, जो वैचारिक संघर्ष की अनिवार्य पुस्तकों की तरह पढ़ी जाती हैं. इन पत्रिकाओं के पीछे न तो किसी संस्था और न किसी धनवान का सहारा होता है. वे सिर्फ संपादकों की अदम्य जिजीविषा, अथक परिश्रम और अटूट प्रतिबद्धता से जीवन-रस लेती हैं. ये पत्रिकाएं मात्र पत्रिकाएं नहीं होती हैं, वे एक साहित्यिक अभियान बन जाती हैं और अनेक रचनाकारों को भरोसा दिलाती हैं कि जीवन और समाज के जटिल रिश्तों की एक विश्वसनीय पहचान कराने में वे मददगार हैं. वे साहित्य के सच को अद्वितीय, अलौकिक और आध्यात्मिक बनाकर समाज के सत्यों से विमुख नहीं करती हैं. लिखे हुए को समाज तक पहुंचाने का दायित्व उनका ही है, इसे वे कभी ओझल होने नहीं देतीं.

साहित्यिक पत्रिकाओं के ऐसे द्वंद्वात्मक समय में यह जरूरी लगता है कि हम यह जानने की कोशिश करें कि किसी साहित्यिक पत्रिका का संपादक होने के क्या अर्थ हैं या हो सकते हैं? संपादक बनने पर उसके अर्थ से प्रश्नोन्मुख होने की जगह वह उससे बच निकलता है. उसके रूबरू होने से वह डरता है. संपादक हो जाने पर वह, वह नहीं हो पाता है जो उसे होना है, होना था या होते रहना है. संपादक की कुर्सी पर बैठते ही वह जीवन-दृष्टि और साहित्य-दृष्टि के विरोधाभास में इस तरह उलझ जाता है कि उसकी हालत दो पाटों के बीच पिस जाने वाले की हो जाती है और उसका साबुत बच पाना कठिन हो जाता है.

अनेक ऐसे प्रश्न हैं, जो दो पाटों के बीच आ जाने पर संपादक को अपने आपसे पूछने चाहिए. क्या संपादक का रचना के प्रति कोई पूर्वाग्रह होता है? क्या उसका कोई कलात्मक अभिजात्य है जिसकी कसौटी पर कसकर वह सफेद को काला, काले को सफेद कर सकता है? क्या संपादकत्व उसके लिए कोई सीढ़ी है, जिस पर चढ़कर वह स्वयं साहित्य की किसी मीनार पर पहुंच जाता है? क्या उसे अपने लिखे में वाचाल होते रहना है या उसे विनम्र बने रहना है? क्या उसे नेपथ्य की शक्तियों से संचालित और नियंत्रित होकर संपादक होने का बोझ उठाते रहना है? क्या संपादक जो कुछ चयनित करता है वह सबका सब उत्कृष्ट होता है या वह उसकी राख-धूल छानकर उसे सोने-सा चमका देता है?

ये सारे प्रश्न और संकट हैं जिनके बीच संपादक को अपनी नाव खेनी है, और उसे डूबने से बचाना है. साथ में उन बड़े-बड़े जहाजों, डोंगियों, कश्तियों और पनडुब्बियों को भी चट्टानों, तूफानों और चक्रवातों से वाकिफ और आगाह करते रहना है जिन्हें उनको खेने वाले धुंध और कुहासे में देख नहीं पाते हैं.

*

आयु के साथ शारीरिक क्षरण होने लगता है और आप अपने को संकल्प, इच्छा-शक्ति, ऊर्जा और स्वप्न से भरपूर नहीं पाते हैं. कहीं न कहीं कुछ छीजने लगता है, चुकने और चूकने का एहसास लिपटा रहता है. हाथों की पकड़ और पैरों की गति ढीली और धीमी होने की आवाजें आप सुनने लगते हैं और यह फैसला लेने के मोड़ पर, उस ओर मुड़कर यह कहने वाले होते हैं कि अब सूर्यास्त हो चुका है, तुम्हारी गोधूलि-बेला शुरू हो गई है. यह तुम्हारे ठहर जाने, रुक जाने का समय है, शायद तुम्हारे जाने का समय भी.

इस स्थिति में मेरे लिए ‘सदानीरा’ को नियमित रखना असंभव बनता जा रहा था. उसके अस्तित्व को बनाए रखना अपने आपसे संघर्ष करना था. अपने को ही फिर से संभालना था. अपने आपसे से ही कहना था कि क्या हुआ जो 82 के हो गए हो? क्या हुआ जो दिल के मरीज हो? क्या हुआ जो गोधूलि-बेला है? क्या हुआ जो जाने का समय आ गया है? …और इस सबके बीच मुझे बार-बार थॉमस एडीसन से जुड़ी वह घटना याद आने लगी, जब उनकी प्रयोगशाला में आग लगी थी, वह शांत-भाव से आग की लपटों को देख रहे थे और अपनी पत्नी और पुत्र से कह रहे थे, ‘‘देखो, आग की लपटें कितनी सुंदर लग रही हैं.’’

जब सब कुछ राख हो जाता है, सब कुछ नष्ट हो जाता है, वही समय होता है फिर से कुछ नया बनाने का. वही समय होता है फिर कोई नया स्वप्न देखने का.

मैंने भी सोचा कि ‘सदानीरा’ रहेगी, मैं भी बना रहूंगा. इसकी असमय मृत्यु, मेरी भी मृत्यु होगी. इसे समाप्त करना एक तरह की आत्महत्या होगी, पुत्र-पुत्री के वध जैसा होगा, यह अपने ही साथ विश्वासघात होगा.

…और यहीं से मेरे लिए हताशा का समय आशा के समय में बदलने लगा. यहीं से शुरुआत है ‘सदानीरा’ के नए कलेवर, नए रूप-विधान और उसके नए स्वप्न की.

मुझे पूरी उम्मीद है कि अविनाश मिश्र, जिनको मैं ‘सदानीरा’ सौंप रहा हूं, वह उसे सतत सलिला बनाए रखेंगे और ‘सदानीरा’ के उन युवा रचनाकारों और उन पाठकों से भी मैंने उम्मीद लगा रखी है, जिन्होंने उसे मेरे लिए अब तक बचाए और बनाए रखा है. वे ‘सदानीरा’ को पोखर या डबरा नहीं बनने दें. उसे अपनी रचनात्मकता से भरपूर रखें, उसे छलकाते रहें और उसे बहने दें : मेरे न होने के बाद भी.

नीत्से ने कहा है कि कोई भी तुम्हारे लिए ऐसा सेतु नहीं बना सकता जिस पर तुम, अकेले तुम ही जीवन की सरिता को पार कर सको.

***

[‘सदानीरा’ के 17वें अंक में प्रकाशित.
agneya@hotmail.com ]

5 Comments

  1. KULJEET SINGH October 26, 2017 at 9:31 pm

    न केवल सुन्दर विश्लेषण, गंभीर विचार बल्कि मार्मिक भी।

    Reply
  2. akhilesh October 27, 2017 at 10:48 am

    बधाइयाँ आग्नेय जी

    Reply
  3. सुजीत कुमार सिंह November 1, 2017 at 2:31 am

    बेहतरीन।

    Reply
  4. GG Shaikh November 4, 2017 at 7:18 pm

    ‘सदानीरा’ के लिए अविनाश मिश्र जी का चयन
    सुयोग्य है। उनसे उम्मीद रखते हैं कि उनके द्वारा
    क्लासिक और आधुनिक राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय साहित्य
    हमें पढ़ने को मिलता रहेगा और हम सब की सुरुचि
    साहित्य में बनी रहेगी और बढ़ेगी !

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  5. shailendra shant December 28, 2017 at 3:39 am

    sahi baaten, sadaneera ka pravah jari rahe, shubhkamanayen!

    Reply

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