सत्य के सम्मुख सत्ता से विमुख

शुरुआत ::
आग्नेय

दिल से बातें करना आसान होता है, लेकिन दिल से अपनी बात कहने के कुछ खतरे भी हैं. जैसे विषय से बहक जाने का खतरा, रास्ते से भटक जाने का खतरा. इसके पहले कि मैं भटक जाऊं या बहक जाऊं, अपने को पाब्लो नेरुदा की एक कविता से सावधान कर लेना चाहता हूं. ‘सत्य’ पर लिखी उनकी कविता के अंश हैं :

‘‘मैं आदर्शवाद और यथार्थवाद
दोनों के प्रति समर्पित हूं
तुम पत्थर और पानी की तरह
इस दुनिया के हिस्से हो
जिंदगी के उजाले हो
उसकी धंसी जड़ें हों
मेरे मर जाने के बाद भी
मेरी आंखें बंद नहीं करना
सीखने के लिए देखने के लिए
अपने अवसान को समझने के लिए
मुझे उनकी ज़रूरत होगी…’’

इस तरह कवि कविता के माध्यम से अमर हो जाने की परिकल्पना करने लगता है. उसकी यही लालसा और जिंदगी से लगातार सवाल पूछते रहने की आदत दिल में न जाने कितने ज्वालामुखियों को धधका देती है. उनके पिघलते लावे में मुझे तैरना सीखना होगा. न जाने कितने कवियों और शाइरों ने आग के दरियाओं को डूबकर-तैरकर पार किया है. ये सारे के सारे ज्वालामुखी हमारी दुनिया में अब तक दबे-धंसे हुए थे. अब एक साथ सारी दुनिया में फूट पड़े हैं. इनका वजूद हमसे लगातार सवाल पूछ रहा है.

इन ज्वालामुखियों के कुछ सवाल हैं : क्या हम ऐसा समाज बना रहे या बना चुके हैं, जिसमें अच्छाई की कोई ताकत नहीं है? ऐसे समाज में वे ही ताकतवर हैं, जो बुरा कर सकते हैं, किसी को नुकसान पहुंचा सकते हैं, पीठ के पीछे वार कर सकते हैं, आपको कुचलते हुए आगे बढ़ सकते हैं. लालच इनकी प्रेरक शक्ति है.

ऐसे समाज में लोग सत्ता का उपयोग नहीं उसका दुरुपयोग करते हैं, उससे डरते हैं. उसकी दासता में गौरवान्वित अनुभव करते हैं. क्या हम एक ऐसी बंद गली में पहुंच चुके हैं, जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है? कुछ और सवाल भी हैं. क्या मनुष्य की यात्रा का अंत होने वाला है? उसकी अब तक की यात्रा पशु से मनुष्य होने की रही है, क्या हम अब एक अंधी यात्रा पर जा रहे हैं? क्या यह पीछे लौटने की यात्रा है, मनुष्य से पुनः पशु हो जाने की यात्रा? क्या मनुष्य के पास अपना इतिहास रचने के लिए कुछ शेष नहीं रहा? क्या इन यक्ष-प्रश्नों का कोई उत्तर है हमारे पास? ‘है’ और ‘नहीं है’ की तलवार की धार पर चलते हुए हम ठिठक गए हैं.

इन तमाम सवालों से घिरा मैं सोचता हूं कि कवि आज एकांत में कवि है और अपने जीवन-संग्राम में एक साधारण नागरिक. इस सच्चाई के नाते उसके लिए एक नागरिक कवि की तरह रहना ज्यादा सार्थक और श्रेयस्कर है. लेकिन मैं पाता हूं कि सत्ता के सम्मोहन से संक्रमित मेरे समाज में उस नागरिक के लिए कोई स्पेस नहीं बचा है, जो सड़क की बाईं ओर चलता है. लालबत्ती होने पर अपना वाहन रोकता है. अपने घर के सामने कचरा नहीं फेंकता. इधर-उधर थूकता भी नहीं. नियमित रूप से टैक्स देता है. अपना काम सेवा-भाव और ईमानदारी से करता है. रिश्वत नहीं लेता. चुनावों के समय मतदान करता है. पड़ोसी से दोस्ती रखता है. अपनी पत्नी का सम्मान करता है. अपने बच्चों से प्यार करता है और अपने माता-पिता की भरसक देखभाल करता है और देश के लिए अपनी जान भी दे सकता है.

जिस तरह साधारण नागरिक के लिए कोई स्पेस नहीं है, उसी तरह यहां एक कवि के लिए भी कोई स्पेस नहीं बचा, क्योंकि वह जानता है कि अच्छा और ताकतवर आदमी अलग-अलग तरह के दो आदमी हैं. वह मानता है कि अच्छा और ताकतवर एक नहीं हो सकते. अच्छा आदमी ताकतवर नहीं है और ताकतवर अच्छा आदमी नहीं है. अच्छाई और ताकत में छत्तीस का आंकड़ा है. एक का न होना दूसरे का होना है.

सत्य के सम्मुख अच्छाई ही टिकी रह सकती है. ताकतवर में इतना ताब नहीं होता कि वह सत्य से आंखें मिला सके. ताकतवर तभी हार सकता है, जब हम सत्य के सम्मुख खड़े रहने का साहस अर्जित करें और यह तभी संभव है, जब हम सत्ता से विमुख होने का निर्णय करें. यदि मनुष्य को इस पृथ्वी पर खुद को बनाए रखना है, कुदरत के खेल में बाजी को जीतना है, तो उसे स्वयं अपने भविष्य का निर्माता बनना है. इसके लिए उसे अपने अंत:करण और अपने किए पर यकीन करना होगा और अपने सारे कामों को अपनी करुणा, सद्भावना और अपनी सहनशीलता से जोड़ना होगा. उसे यह स्वीकार करना होगा कि उसे तब तक शांति नहीं मिलेगी, जब तक वह अपने विश्वासों के विरुद्ध काम करता रहेगा. उसे अपने नैतिक प्रयत्नों से अपने लिए मुक्ति के दरवाजे खोलने हैं. बाहरी दुनिया के बरअक्स, वह पूरी तरह स्वाधीन नहीं हो सकता, क्योंकि इस दुनिया में वह अकेला नहीं है और मानवीय स्थिति की यह सीमा है कि मनुष्य होने से बचा नहीं जा सकता है.

हम मनुष्य बने रहें, इसलिए हमें पूरी सभ्यता की पुनर्रचना करनी है. प्रेम और घृणा, आतंक और निर्भयता के बीच जो कुछ बचा रह जाएगा, उसे सहेजना है, उसे बचाए रखना है. जब हमारी स्मृतियां और लालसाएं राख होने लगें, उसी क्षण हमें अपने स्वप्नों का हिसाब रखना है. इन स्वप्नों को देखकर ही हम मनुष्य होने का गौरव प्राप्त कर सकते हैं.

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[‘सदानीरा’ के 18वें अंक में प्रकाशित.
agneya@hotmail.com ]

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