कवितावार में जितेंद्र कुमार की कविता ::

शीर्षकहीन

और अचानक मुझे बोध हुआ
जब दार्शनिक, सुधारक
राजनीतिज्ञ और ढोंगी
समग्र जीवन-मूल्यों पर विचार कर रहे थे
एक पूरी सृष्टि मेरे विरुद्ध अड़ी थी
रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों में
और निरर्थक छिछली भावनाओं के
उत्तेजित विस्तार में नर्क था!
मैंने झील को देखा
और वह पड़ी थी वहां
ठंडी, तीक्ष्ण और निर्वैयक्तिक!
अकस्मात जब मैं उसमें कूदने को था
वह मुझे अंदर तक बेध गई
और मैंने चाकुओं को पसलियों से टकराते हुए सुना!
— वहां भी स्वागत मेरा नहीं था
मैं सड़क की ओर निकला
तो वह भी उतनी ही निस्पृह लेटी थी
कुत्ते और गधे, सवारियां और सुंदरताएं
मेरे साथ-साथ उस पर चल रही थीं
मैं कभी जान नहीं पाया
कि वह अच्छाई
जिसका दावा मैं अपने अंदर करता हूं
क्या एक छद्म भी नहीं है!

***

[ ‘‘मैं गलत वक्त पर भावुक इसलिए हो उठता हूं, क्योंकि सही वक्त पर कठोर बने रहना चाहता हूं.’’ यह कथ्य जितेंद्र कुमार की एक कहानी ‘मेरे शहर में घोड़े’ से है. जितेंद्र कुमार को जिन्होंने पढ़ा है, वे यह सहज स्वीकार कर सकते हैं कि रोजमर्रा के तमाम प्रसंगों में उन्हें जितेंद्र कुमार का कवि-कथाकार अक्सर याद आता होगा. लेकिन दिक्कत यह है कि जितेंद्र कुमार की रचनाएं धीरे-धीरे साहित्यिक परिदृश्य से अदृश्य होती रही हैं. इंटरनेट पर जितेंद्र कुमार की एक तस्वीर तक नहीं है तो उनकी रचनाएं क्या होंगी. ‘कविता कोश’ और ‘हिंदी समय’ जैसी हिंदी साहित्य की मशहूर वेबसाइट्स कैसे-कैसे नामचीनों के साथ कैसे-कैसे नामहीनों से भरी पड़ी हैं, यह बताने की जरूरत नहीं. लेकिन यह बताना जरूरी है कि वहां ‘रतजगा’, ‘आईने में चेहरा’, ‘ऐसे भी संभव है मृत्यु’ जैसे कविता-संग्रहों के कवि और ‘वहीं से कथा’ जैसे कहानी-संग्रह के कहानीकार जितेंद्र कुमार नहीं हैं.

साल 2006 में हुई जितेंद्र कुमार की मृत्यु के बाद साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका ‘समास’ के दो अंकों में जितेंद्र कुमार की कुछ कविताएं आई थीं. इनमें से ही एक अंक में उनके पहले कविता-संग्रह ‘रतजगा’ पर कवि-आलोचक-रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल का गद्य भी था.

यहां तक आकर पढ़ने वालों के मन में शायद जितेंद्र कुमार के बारे में और जानने की जिज्ञासा बढ़ जाए, इसके लिए ‘समास’ में उनकी कविताओं के साथ दी गई टिप्पणियां काम आ सकती हैं, जिनमें कहा गया :

‘‘जितेंद्र कुमार हिंदी के उन बेहतर कवियों में हैं जिन्हें हमारे साहित्य की तथाकथित प्रगतिशीलता और जनवादिता ने अपने चिर अज्ञान और तात्कालिक राजनीति के कारण कभी प्रकाश में नहीं आने दिया.
जितेंद्र की कविताओं को निर्मल वर्मा जैसे मूर्धन्य लेखक पसंद करते रहे, पर हमारी अकादमियों पर छाए मार्क्सवादी अंधकार में उन पर कभी गहन विचार करने की स्थिति नहीं बन सकी. उनके चार कविता-संग्रह, दो कहानी-संग्रह और तीन उपन्यास प्रकाशित हुए.

‘ऐसे भी संभव है मृत्यु’ जैसी कविता लिखकर — जो हिंदी की प्रसिद्ध कविताओं में गिनी जाएगी — स्वयं अपनी मृत्यु का साक्षात्कार करने वाले जितेंद्र कुमार को जब अपने डॉक्टर-सैनिक बेटे देवाशीष की मृत्यु की खबर मिली, वह भीतर से टूट गए. घर से बाहर पहले ही वह कम निकलते थे, इस हादसे के बाद, उन्होंने खुद को अपने ही घर में कैद कर लिया.’’]

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