कविताएँ और तस्वीरें ::
गार्गी मिश्र

gargi mishra hindi writer
गार्गी मिश्र


महेश वर्मा की कविता और कला को समर्पित

बोलता हूँ

सपने में सीढ़ियों से उतरती तुम्हारी बे-आवाज़ पुकार में बोलता हूँ। एक अनजान शहर के अनजान बाग़ के पौधे को तुम्हारे ‘टटोलने’ में बोलता हूँ।

कैसे लिखती हो तुम? एक खड़ी पाई के सदियों से खड़े रहने में बोलता हूँ। अभी-अभी बोला हूँ तुम्हारे बाएँ पाँव के अँगूठे पर लगी अधछूटी नेल पॉलिश में।

तुम्हारे नाख़ून पर उभरे नक़्श मेरी लाचार भाषा का चेहरा हैं।

उन तस्वीरों, चिट्ठियों में बोलता हूँ जो गुम जाने पर ही हासिल हुईं। तुम्हारी लापरवाह सँभाल में बोलता हूँ। तुम्हारे सीने में ज़ोर से धड़कते दिल पर तुम्हारी यक़ीन से डबडबायी आँखों से बोलता हूँ।

हमारे दरमियान जो फ़ासला है उसे शहर का सबसे पुराना रफ़ूगर जानता है। खींची और दरकी हुई उस जगह पर चित्रकार का इनसोम्निया, पान खिलाने वाली बुढ़िया की हँसी, मेरी अजन्मी बेटी की हथेली पर सजी हिना और और एक पागल का गीत साँस ले रहा है।

रफ़ू के लिए चुने गए सफ़ेद धागों की कसन में बोल रहा हूँ।

सुनो!

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मुझे जिलाए रखने वाले का पता

मैं किसी अज्ञात दृश्य को जाने वाली रेल में सवार हूँ
और टिकट पर ढाक के फूल खिले हैं
झर रहे हैं मेरी श्वास की आँच में किंशुक
पीछे छूटता दिखाई दे रहा है वह क़बीला
जहाँ मेरी गुमशुदगी की ख़बर आम हुई है

मुझे कुछ याद नहीं सिवाय इसके कि बीती रात
एक जन्मोत्सव से आने के बाद मैंने उतार दिए थे वस्त्र
मेरे सीने के दाईं ओर जन्मा था एक अर्द्ध-चंद्रमा
और आकाश हो गई थी मेरी छाती

घुप्प अँधेरा है और चंद्रमा अपनी चाँदनी ओढ़े
बढ़ रहा है इस पथ पर मेरे साथ
नींद में चलती कोई दुल्हन मेरे पाँव के अँगूठे से टकरा जाती है
करने को उसका पथ उजियारा मैं थोड़ा-सा चंद्रमा उलीच देती हूँ
गड़ा देता है कलानिधि अपने नूह मेरी छाती पर
उसे भय है कि वह पूरा न बह जाए

रुक गई है रेल और चाय की पोटली को गर्म पानी में डुबोता एक नौजवान
सवेरा हो चुकने की ग़लतफ़हमी में ख़ुश है
सहयात्रियों की अपरिचित भाषा को सुनते
और चाय के प्यालों को होंठों से लगाते
मैं दूर से अपने होंठों को देखती हूँ
मेरे होंठों के नज़दीक एक जन्मचिह्न है
वह इसे अपना घर कहता है फिर वहीं डूब जाता है
जबकि मुझे मालूम है कि एक जन्म के पूरा होने पर
पहुँचेगी यह रेल अपने गंतव्य पर

फिर भी न जाने क्यूँ अधखुले अधरों और मुँदी पलकों के साथ
मैं किसी अज्ञात दृश्य को जाने वाली रेल में सवार हूँ।

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बीच की जगहें
हर बहने वाली चीज़ क़ासिद है—आँसू, ख़ून और नदी।

बीच की जगहें नहीं होतीं तो दो किनारे कैसे होते? कैसे इस छोर से उस छोर तक जाती नाव, उत्सव के बाद कैसे डुबोई जातीं कुमारटोली के मूर्तिकारों की गूँगी अँगुलियों से गढ़ीं देवी की मूर्तियाँ? कैसे मई की कोई दुपहरी अपनी पीली ओढ़नी दाँत में दबाए चुपचाप सुनती राग मुल्तानी?

कैसे कोई उचक कर देखता अपनी दाईं तरफ़ बैठे एक अजनबी को, बहुत देर तक सोचता अपने ख़ालीपन के उजेले में कि क्या अगले से पूछे, “समय क्या हुआ है?” और फिर चुप हो जाता अपना नाम-गाँव पूछे जाने तक।

नहीं होतीं बीच की जगहें तो पृथ्वी पर जीवन कैसे संभव होता? कि कोई दुःख कितना भी बड़ा क्यूँ न हो धरती नहीं फटती कि आदमी उसमें धँस जाए और कोई सुख इतना स्थायी नहीं कि मन छू ले आकाश लिख दे उसके कंधों पर अपने हिस्से का उल्लास और साझा की पराकाष्ठा हो।

वे रिश्ते कहाँ जाते जो उलाहनाओं और असंभव परिस्थितियों की मिट्टी में फूल से खिले रहते हैं। मौसमों के फेरबदल से अपरिचित जिन्हें जीने से फ़ुरसत नहीं। उन आशाओं का क्या होता जिनके हाथ नहीं, जिनके सिर्फ़ एक जोड़ी सही-सलामत पाँव हैं, जो बिना कुछ सोचे-समझे आगे बढ़ते जा रहे हैं।

नहीं होतीं ये बीच की जगहें तो संभव है कि विलुप्त हो चुकी होतीं कविताएँ उन कविताओं को पढ़ने के बाद पाठक का मौन और कवि का निर्मोह। चित्रकारों को नहीं मिलते वे रंग जो ईश्वर जैसी चीज़ में मनुष्य की आस्था पैदा करते हैं। रेलगाड़ी से तय किए जाने वाले सफ़र शोक से भरे होते और कोई रोता हुआ बच्चा नहीं उलझता चाभी से चलने वाले खिलौने के शोर में।

इन जगहों को दूर से देखो तो मालूम होता है कि दो पीढ़ियों के बीच घर का एक पुराना मुलाज़िम खड़ा है जो किसी भी बात पर न ज़्यादा मुस्कुराता है, न ही ज़्यादा उदास होता है। इस मुलाज़िम को ही पता हैं, मेरे और तुम्हारे सारे राज़। ख़ुदा हमारे राज़दार को हमारी उम्र से भी लंबी उम्र बख़्शे।

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सिर्फ़ नाम

बहुत कुछ कह पाने के लिए
बहुत कुछ न कह पाने की जगह ढूँढ़नी थी
उस जगह में बैठा था
‘सिर्फ़ नाम’

कभी-कभी हम उस जगह को भी नहीं छू पाते
पास जाकर छूते-छूते रह जाते हैं
जो कभी छू लेते हैं
तो देर तक गूँजते हैं
सिर्फ़ नाम

ये उम्र कितनी छोटी है
एक अदद नाम पुकारने को

गंगा की रेत को सात बार अँजुरी में भरना और सात बार उलीचना है
तुम्हें पुकारना

तुम हज़ारों मील दूर
नीली दीवार पर टँगी घड़ी की टिक-टिक सुनते हो

टिक-टिक-टिक-टिक

नीले समंदर में एक मछली तड़प-तड़प कर जी उठी है।

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बिल्ली की आत्मा

तुमने तय किया कि आत्मा माँगती है शरीर और यह भी तय कर लिया कि तुम्हारा शरीर आत्मा का घर है

तुम इन बनी-बनाई तयशुदा बातों से इतना ग्रस्त हो कि तुम आत्मा के चुटकुले नहीं सुन पाए

वे चुटकुले जो वह तुम्हारे ही खोपड़े और खोपड़े के अंदर क़ैद दिमाग़ जैसी चीज़ पर कह-कह कर तुम्हें शताब्दियों से हँसाने की कोशिश कर रही है

तुम जो बेहद तय हो अपने अस्तित्व में एक चुटकुला तक नहीं सुन सकते

तुम्हारे विकृत कानों को देख आत्मा गुमसुम है

हे महापुरुष, तुम्हारी लपलपाती जिह्वा जीवन के प्रति इतने तय शब्द क्यूँ और कैसे कहती है

मेरी जिज्ञासा को शांत करो हे महामानव!

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अनुपस्थिति

कुछ चीज़ें हमेशा अपने न होने में बहुत गहरे और अमिट रूप से उपस्थित रहीं। अनुपस्थिति का संसार। यहाँ अनुपस्थिति से ही उपस्थिति है।

जैसे सालों पहले लिखी हुई कोई नज़्म जो अब ग़ुम है और इस वक़्त मेरे सामने हर्फ़ दर हर्फ़ ज़िंदा है। जैसे शायद ही कोई सावन बीता हो जिसमें छत पे बारिश में न नहाया हो पर इस दफ़े न जाने हर बार जब भी बारिश आई मैं झरोखों तक ही पहुँच पाई और इस तरह से बारिश में तरबतर भीगा किए।

जैसे हम उम्र भर कुछ जगहों पर जाने और कुछ लोगों से मिलने की सोचते रहे और उन जगहों पर कभी न पहुँचते और उन लोगों से कभी न मिलते हुए उनके साये से हर क्षण ढँके रहे। ये एक क़िस्म का झूठ का सच है जो कि सच होने की माँग भी नहीं करता।

मुझे लगता है कि नब्बे प्रतिशत जीवन न होकर होने वाली चीज़ों से ही चल रहा है। बाक़ी के दस प्रतिशत में जो भी है वह दिन की रौशनी में नींद में चलना है या फिर और सादा कहूँ तो ज़िंदगी!

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जैसे गिरती है अंतरिक्ष से कोई मन्नत

दस्ताने पहन लेने से जो बच जाती त्वचा तपती धूप में जलने से तो उस जलन से कैसे बच पाती जो गुनगुने आँसुओं के गिरने भर से जल जाती है

मेरे बाएँ हाथ की कलाई पर टिका एक तिल ही है
इस तन्हा दुपहरी में मेरा साथी
देह पर तिलों का काम सुंदरता को बढ़ाना नहीं बल्कि सिर्फ़ दूसरे का ध्यान भंग करना है

तिल से उठती है बात, अधरों तक जाती है
अटकती है मुस्कुराहटों में और मुस्कुराहटें?
वे कहाँ जाती हैं?

मुस्कुराहटें… देखो मधुबन में
वहाँ जाकर खिल रही हैं
पेड़ों की शाखों पर

कितनी ही मुस्कुराहटें हैं
हरी, पीली, हल्की पीली, भूरी, सुनहरी
मद्धम-मद्धम झूम रही हैं

वह देखो गिरी एक मुस्कुराहट तुम्हारे क़दमों में
जैसे गिरती है अंतरिक्ष से कोई मन्नत।

***

गार्गी मिश्र इस रचना समय में एक विवेकमय और सहृदय व्यक्तित्व हैं। उनकी यहाँ प्रस्तुत कविताएँ सतत जारी कविताओं के पतझड़ में नए रंग लिए हुए हैं। वह बनारस में रहती हैं। उनसे gargigautam07@gmail.com पर बात की जा सकती है। इस प्रस्तुति से पूर्व उन्होंने ‘सदानीरा’ के 18वें अंक के लिए स्वीडिश कवयित्री आन येदरलुंड की कविताओं का अनुवाद किया था :

मैं एक पत्ती को देखती हूँ और उससे अपनी आस जोड़ लेती हूँ

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