कविताएँ और तस्वीरें ::
शैलेंद्र साहू

Shailendra Sahu poems and art WORK
शैलेंद्र साहू

पाप, साँप और मैं

घाव से खुरच कर उतारे हुए दिन में
पैरों के पास से हो कर गुज़र जाती है
सरसराती
चमकती पीठ पर पीले चकत्ते लिए

बहुत दूर के किसी शहर में
अभी रात होगी
मैं तुम्हारी माँग चूमता हूँ
बहुत-सी रातों के गुच्छे
एक एक कर झड़ते हैं

मैं खड़ा भौंचक
परछाईं, पीठ और पैर देखता हूँ।

कविता मुस्कुराती है

किसी के कान में
फुसफुसा कर कहे गए शब्द हों
या अधूरी नींद की बुदबुदाहट
भीड़ में टहलती चुप्पियाँ हों
या दीवारों पर सिर पटकते अवसाद
कटे-फिटे
थके-हारे
ख़ून और मवाद में लिथड़े शब्द ही क्यूँ न हों
कविता सबको पनाह देती है

और अगर आख़िरी बार का रोना याद हो
तो ये दिन इतने भी बुरे नहीं
—कह कर
कविता मुस्कुराती है।

SS (21) a

हँसी-ख़ुशी

एक

इतनी ख़ुशी थी
कि होंठ मुस्कुरा कर फैलते हुए
चेहरे से बाहर नहीं निकल जाते थे
बस यही ग़नीमत।

दो

हँसते-हँसते
गुब्बारे का दम फूल गया
इतनी ख़ुशी थी
कि फूलते-फूलते
गुब्बारा फट पड़ा।

तीन

जंगल तो बस अब कहने भर को था
फिर भी
जब भी कहीं कोई नया अंकुर फूटता
तब पूरा जंगल
हर हर हर करके हरहराता था
इतनी ख़ुशी थी।

SS (27) b

कविता कहते हुए

मै कुछ नहीं सोचते हुए
किसी हरे जंगल को घोंट कर
पी जाना चाहता हूँ
जैसे वॉन गॉग कभी-कभी
ताज़ा घोल कर रखे हुए रंग गटक जाता था

समूचे आसमान को निचोड़ कर
इकठ्ठा हुए नीले रंग से
कुल्ला, शौच और नहाने जैसे
ज़रूरी
(या ग़ैरज़रूरी)
काम निपटाना चाहता हूँ
कि सुथरा लगूँ

और चूँकि कहने को मेरे पास कुछ भी नहीं है
इस मारे ही अपनी सभी चुप्पियों को चुन कर
एक चीख़ की तरह कुछ बुनता हूँ
और उसे कविता कहते हुए
सूरजमुखी लिखता हूँ।

आदमी

एक

उस आदमी के पेट में
मछलियाँ तैरती थीं
और दिल में
गौरैय्या चिड़ियों का झुंड
और दिमाग़ में
सिर्फ़ ज़हरीले साँपों का गुच्छा
भला कब तक जीता ऐसे
मर गया बेचारा
या मार दिया गया हो
पता नहीं
आशंका तो आत्महत्या जैसी भी है।

दो

छोटे शहर या शायद किसी गाँव से आया आदमी था
बड़े शहर में आकर
और छोटा हो गया आदमी
इतना छोटा
कि चींटियों ने
शक्कर के दाने की तरह कुतर कर चट्ट कर लिया।

तीन

आदमियों जैसी कोई आदमियत न थी उसमें
इस तरह का आदमी
कि सारे आदमियों की राय में
अच्छा आदमी
इतना
कि सब कहते
अच्छा आदमी है
इसे मर जाना चाहिए
वरना मार दिया जाएगा
ऐसा आदमी।

***

शैलेंद्र साहू कविता, कला और सिनेमा के संसार से संबद्ध हैं। उनकी अस्मिता अपने मन का काम अपने मन से अपने मन के वक़्त पर करने की वजह से बन रही है या बनने की ओर है। उनकी तालीम जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, दिल्ली से हुई है। इन दिनों वह मुंबई में रह रहे हैं। उनसे sahu.shailendra1@gmail.com पर बात की जा सकती है।

1 Comment

  1. Www.sloarc.com February 15, 2019 at 12:56 am

    Dies sind wirklich wirklich wunderbaren Ideen in Bezug auf Blogging.
    Punkte hier Sie haben einigee berührt. Jede Art undd Weise halten Wrinting.

    Reply

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