कुछ उद्धरण, कुछ बातें ::
निशांत कौशिक

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निशांत कौशिक

“God is necessary and so must exist.”

“Well, that’s all right, then.”

“But I know He doesn’t and can’t.”

“That’s more likely.”

“Surely you must understand that a man with two such ideas can’t go on living?”

Fyodor Dostoevsky, The possessed, Ch. IV—A Busy Night.

एक

रस्कोलनिकोव सेंट पीटर्सबर्ग की सड़कों पर बदहवास फिर रहा एक नौजवान है। नायक का सड़क पर फिरना आधुनिक उपन्यास का केंद्रीय नहीं, लेकिन महत्त्वपूर्ण अंग है। फ़्रांत्स काफ़्का प्राग की सड़कों पर भटकते फिरते थे, ओरहान पामुक के उपन्यास A Strangeness in My Mind का नायक मीलाद इस्तांबुल की सड़कों पर बोज़ा-फ़रोश1बोज़ा बेचने वाला। बोज़ा एक फरमेंटेड (ख़मीरी) तुर्की पेय है। है। हारुकी मुराकामी के उपन्यासों में आधुनिक शहरों का जादुई संसार है जहाँ शिंतो श्राइन हैं, जोंक की बारिश हुआ करती है और बिल्लियाँ फिरा करती हैं। रस्कोलनिकोव इसी तरह पीटर्सबर्ग सड़कों पर बदहवास, ख़ब्तुलहवासी में फिर रहा है। वह ग़ैरज़रूरी नाम वाले पुलों के इर्द-गिर्द फिर रहा है। वह बदहाल है, माली हालत पस्त है, ख़ानदान परेशानी से गुज़र रहा है। शहर का मौसम गर्म है। उसका कमरा अस्त-व्यस्त है। तेईस साला रस्कोलनिकोव क़ानून का विद्यार्थी है। वह दलील और क़ानूनी पेचीदगी समझता है।

‘‘कायरता ही है जो आदमी के हाथ से सब कुछ फिसल जाने देती है।’’ फ़्योदोर दोस्तोयेवस्की के उपन्यास का नायक इस बात से वैयक्तिकता के पहलू में क़दम रखता है। मानव अपनी नियति का स्वयं नियंता है। अगर ईश्वर नहीं है तो सब वाजिब है।

दो

लेकिन ईश्वर कौन है? मर चुके नीत्शे ने किस ईश्वर की मृत्यु की घोषणा कर दी थी? क्या किया जाए अगर ईश्वर की मृत्यु हो चुकी है?

कौन से पवित्र-खेल ईजाद किए जाएँ।
इस अथाह-अनंतता को कैसे सहा जाए।
कहाँ है मुक्ति?
क्या ईश्वर हो जाना ही अंतिम विकल्प नहीं है?

ईश्वर की मृत्यु एक हज़म न हो सकने वाला सच है। विज्ञान और आधुनिकता ने ईश्वर की हत्या कर दी है। लेकिन उसकी मृत्यु का ख़ून मनुष्य के हाथों से साफ़ हुआ नहीं है।

लेडी मैकबेथ की तरह मानव चीख रहा है—‘‘Out, Damn spot !”

‘विश्वास-व्यवस्था’ के इस पतन ने एक रूखा ख़ालीपन पैदा कर दिया है।

जहाज़ से उड़कर अनंत की तलाश में उड़ी चिड़िया वापिस जहाज़ पर नहीं आ सकती।

तीन

‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ में किरदारों की भरमार है। वे सड़कों पर, शराबख़ाने में, भीड़ में हैं। वे कई शक्लों में दिखाई देते हैं और कई आवाज़ों में सुनाई देते हैं। वे बिल्कुल भी आदर्शवादी नहीं हैं। वे खूसट हैं, लूटख़ोर हैं, उनके पास राजनीतिक व्यवस्था से लेकर नैतिक पतन पर अनेकानेक बातें हैं। उनकी बातें और विचार व्यवस्थित नहीं हैं। उसमें जीवन की चोट, खीझ और चिढ़ का तत्त्व है।

दोस्तोयेवस्की ने जो किरदार रचे, वे दार्शनिक नहीं हैं। वे दुःख में डूबे हुए हैं। वे शराबी और जुआरी हैं। वे हताश हैं और पापी भी। वे अपराधबोध के बावजूद बने हुए अपराधी हैं। वे सब कुछ हैं। वे हम हैं।

चार

रस्कोलनिकोव की समस्या की जड़ दुनियावी है। वह बुढ़िया जिसके पास वह सामान गिरवी रख पैसे लेता है, वह निर्मम है और ख़ब्ती। जो बुरा है, उसे ख़त्म किया जाना चाहिए। रस्कोलनिकोव स्वयं के भीतर उठते तरह-तरह के ख़याली उबाल को समझता है और उसके उत्स भी; उसके परिणाम भी। बुढ़िया का ख़ात्मा रस्कोलनिकोव की आर्थिक विपन्नता को समाप्त कर सकता है। रस्कोलनिकोव तय करता है। वह भीतरी बेचैनी को छूता है और बुढ़िया की हत्या कर देता है। वह उस स्त्री की भी हत्या कर देता है जो इत्तिफ़ाक़न वहाँ मौजूद थी।

पाँच

सभी महान रूसी उपन्यासों में ईसाइयत एक मलहम की तरह अंत में आती है। रस्कोलनिकोव की बेचैनियों में आधुनिक मानव की आस्था के चीथड़े उड़ रहे हैं। वह हममें से कोई भी है—विपन्न, ऊर्जावान, प्रबुद्ध और तरह-तरह के विचारों की गिरफ़्त में—अपनी नियति का नियंता, ओजस्वी, मानवीय दुखों के प्रति सहानुभूति रखने वाला; लेकिन निजी दुखों से हताश।

हत्या के बाद उसे एहसास होता है कि वह स्वयं को भी नहीं जानता। वह एक विचार की गिरफ़्त में था, जहाँ नैतिकता को मनचाहा रूप दिया जा सकता है। जहाँ कायरता ही वह रोड़ा है, जो कोई भी क़दम उठाने से रोकती है। अपनी बसाई दुनिया में चार क़दम चले रस्कोलनिकोव को इसका बोझ स्वयं नहीं सहा जाता।

रस्कोलनिकोव हत्या के बाद वह रस्कोलनिकोव नहीं रह गया है, जिसकी उसने कल्पना की थी। हत्या के बाद जिस चीज़ से उसने सबसे पहले छुटकारा पाया वह धन था, जवाहरात थे। वह गिरफ़्तार होने के लिए बेसब्र है। दर्द भोगना ही दंड है। सारी सज़ाएँ भीतरी हैं। धार्मिक पाखंड और जीवन की निरर्थकता के बीच एक सँकरी रेखा है, जहाँ जीवन का पावित्र्य है। यह सँकरी रेखा ही है जिसके दोनों ओर दोस्तोयेवस्की का नायक जा-जाकर लौटता है। जिसके एक ओर गर्व है, बौद्धिक उन्माद है, तर्क एवं विवेक से व्याख्यायित हुआ एक सुथरा-सा संसार है। एक ओर जीवन की निरर्थकता है, उदासी और निहिलिज़्म है। रस्कोलनिकोव जीवन के इस पावित्र्य को खोकर एक स्वयंभू नीति-नियंता हो गया है।

छह

कवि केदारनाथ सिंह अपनी कविता ‘माँझी का पुल’ की आख़िरी पंक्तियों में पूछते हैं :

…मैं ख़ुद पूछता हूँ
कौन बड़ा है
वह जो नदी पर खड़ा है माँझी का पुल
या वह जो टँगा है लोगों के अंदर?

आख़िर मांझी का पुल क्या है?
क्या उसका कोई दैवी महत्त्व है?
जर्ज़र हो चुके ज़ंगी पुल की कोई रहस्यमय अर्थवत्ता है?
क्या ध्वस्त नहीं किया जा सकता उस पुल को एक सामान्य भौतिक वस्तु की तरह जिसकी प्राचीनता भी संदेह में है और गुणवत्ता भी?

सात

दोस्तोयेवस्की ने हालाँकि रस्कोलनिकोव के बहाने उस यूरोपीय बयार को प्रस्तुत किया है, जो तत्कालीन रूस में प्रवेश कर चुकी थी; जहाँ वैयक्तिकता एवं इच्छाशक्ति ही सब कुछ है और नैतिकता को दरकिनार कर मानव अपनी नियति के लिए मनचाहा निर्णय ले सकता है। रस्कोलनिकोव अपने गुनाह को सोन्या के सामने क़ुबूल करता है। सोन्या आर्थिक संकट के चलते वेश्या है, बदहाल है; लेकिन उसमें जीवन का पावित्र्य मौजूद है। वह बुद्धिमान रस्कोलनिकोव के सामने खड़ी पारंपरिक रूसी ईसाइयत की प्रतिनिधि है जो रस्कोलनिकोव को बताती है कि मुक्ति मात्र पीड़ा भोगने से ही संभव है।

‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ से ख़ालिस धार्मिक-तत्त्व अलग भी कर दिए जाएँ तो दोस्तोयेवस्की रस्कोलनिकोव के ज़रिए जटिल मनोवैज्ञानिक संसार रचते हैं, जहाँ धर्म, परंपरा या विश्वास का सपाट पक्ष-पोषण नहीं है। रस्कोलनिकोव का गुनाह एक सुनियोजित प्रक्रिया का नतीजा है। वह एक मूर्ख या मासूम हत्यारा नहीं है, बल्कि वह एक विचार के नियंत्रण में है।

रस्कोलनिकोव की भोगी हुई पीड़ा उसे पवित्र और मुक्त करती है। वह हमें चेताता है कि ‘माँझी का पुल’ सिर्फ़ ईंट-सीमेंट से बना पुराना पुल नहीं है, वह सबके भीतर है और उसे यूँ ही ध्वस्त कर देना महापाप है।

उद्धरण

‘कहाँ पढ़ा था’ रस्कोलनिकोव ने सोचना शुरू किया ‘‘मैंने कहीं पढ़ा था कि जब किसी को सज़ा-ए-मौत दी जाती है, तो मौत से घंटे भर पहले वह यह सोचता है कि अगर उसे किसी ऊँची चट्टान, सँकरी-सी कगार पर भी रहना पड़े, जहाँ खड़े रहने की फ़क़त बित्ता भर जगह हो, चारों तरफ़ गहरा सागर हो, घनघोर अंधकार हो, नितांत अकेलापन हो, अंतहीन तूफ़ान हो, गज़ भर की ज़मीन में सारा जीवन, सदहज़ार सालों, अनंत काल तक भी रहना पड़े, तब भी फ़ौरन मर जाने से इस तरह जिए जाना कहीं बेहतर है। जीते जाना, जिए जाना और बस जिए जाना।

[ भाग-2, अध्याय-6 ]

{ उपरोक्त कथन की प्रासंगिकता इस तथ्य में भी है कि दोस्तोयेवस्की को बेलिंस्की के प्रतिबंधित साहित्य पढ़ने और विद्रोही होने की बदगुमानी में सज़ा-ए-मौत सुनाई गई थी। मौत को अपने सामने देख रहे दोस्तोयेवस्की की मौत की सज़ा ऐन वक़्त पर माफ़ हो गई और उन्हें साइबेरिया भेज दिया गया। }

‘‘शुरू में, दरअसल बहुत पहले से, एक सवाल उसे हैरान करता था; क्यों सारे अपराध इतनी फूहड़ता से छुपाए जाते हैं कि उनकी शिनाख़्त आसानी से हो जाती है, और क्यों आख़िरकार सारे अपराधी सबसे आसान सुराग़ छोड़ जाते हैं? धीरे-धीरे वह कई अलग-अलग, लेकिन विचित्र नतीजों पर पहुँचा था। उसकी नज़र में इसकी ख़ास वज़ह गुनाह छुपाने में रह गई कोई कमी या दुश्वारी नहीं, बल्कि अपराधी के भीतर मौजूद है।’’

[ भाग-1, अध्याय-6 ]

‘‘एक जान लेकर हज़ारों को बर्बाद होने और बोसीदगी से बचाया जा सकेगा। तुम्हारी क्या राय है? क्या हज़ारों नेक कामों से यह अदना-सा गुनाह धुल नहीं जाएगा?

[ भाग-1, अध्याय- 6 ]

‘‘…रजुमीखिन, सबसे ज़्यादा नापसंदीदा बात यह नहीं कि वे झूठ बोलते हैं। झूठ बोलने को माफ़ किया जा सकता है, झूठ बोलना अच्छी बात है कि उसके सहारे हम सच्चाई तक पहुँच सकते हैं। तकलीफ़देह बात यह है कि वे झूठ बोलते हैं, उसे सराहते हैं और उसकी पूजा करते हैं।’’

[ भाग-2, अध्याय-4 ]

हज़ारों शक-ओ-शुबहा मिलकर सुबूत नहीं हो जाते।

[ भाग-6, अध्याय-2 ]

इस प्रस्तुति में प्रयुक्त फ़्योदोर दोस्तोयेवस्की कृत उद्धरण उनके उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ के कॉन्सटांस गार्नेट द्वारा किए गए अँग्रेज़ी अनुवाद से चुने गए हैं, उनके हिंदी अनुवाद इस अनुवाद पर ही आधृत हैं। निशांत कौशिक हिंदी कवि-अनुवादक हैं। वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया से तुर्की भाषा में स्नातक हैं। तुर्की से उनके अनुवाद में अदीब जानसेवेर, जमाल सुरैया, तुर्गुत उयार और बेजान मातुर की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर समय-समय पर शाया होती रही हैं। वह इन दिनों बेंगलुरु में रह रहे हैं। उनसे kaushiknishant2@gmail.com पर बात की जा सकती है। इस प्रस्तुति की फ़ीचर्ड इमेज़ : yenisafak.com

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