सूफ़ी कविता ::
सुमन मिश्र

sufi poet suman mishra
सुमन मिश्र | क्लिक : आलोक सोनी

सूफ़ियों का ख़याल जब ज़ेहन में आता है तो बड़ी सतरंगी करवटें बदलता है। एक सूफ़ी का पैदा होना बहुत अनोखी घटना है। वह शै जो सदा से थी, आज पैदा हो गई। सूफ़ी की मृत्यु भी बेहद अनूठी होती है… कुछ भी नहीं मरता। जैसे फूल मिट जाता है, ख़ुशबू बाक़ी रह जाती है।

सूफ़ियों में एक कहानी बड़ी प्रचलित है—एक छोटी-सी नदी कलकल बहती हुई रेगिस्तान पहुँचती है। रेगिस्तान की विशालता देखकर उसे बहुत निराशा होती है और उसके उदास मन में ख़याल आता है कि इस रेगिस्तान में प्रवेश करते ही उसका जीवन समाप्त हो जाएगा, तब आख़िर उसके जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या वह इसलिए पैदा हुई थी? नदी को उदास देखकर बूढ़ा रेगिस्तान मुस्कुरा पड़ता है। वह नदी से कहता है कि तुम हवा को इजाज़त दो कि वह तुम्हें उड़ाकर रेगिस्तान के पार ले जाए। नदी को बहुत फ़िक्र होती है। नदी बूढ़े रेगिस्तान से पूछती है कि लेकिन उस पार तो मेरा नाम ही बदल जाएगा। लोग मुझे किसी और नाम से पुकारेंगे। फिर मैं कहाँ रहूँगी? रेगिस्तान मुस्कुराकर जवाब देता है कि जब हवा तुम्हें उड़ाकर ले जाएगी तो वह तुम्हारे मूलतत्व को लेकर जाएगी। हाँ, तुम्हारा नाम और स्वरूप बदल जाएगा, लेकिन तुम्हें पता होगा कि वह तुम ही हो। नदी ने हिम्मत करके हवा से गुज़ारिश की कि वह उसे उस पार ले जाए। हवा ने सहर्ष उसकी बात मान ली और नदी रेगिस्तान के पार जाकर दूसरी तरफ़ बहने लगी। नदी ने सोचा कि यह विचार मेरे मन में क्यूँ नहीं आया। बूढ़ा रेगिस्तान फिर मुस्कुराया। उसने हँसकर कहा कि मैंने नदियों को उड़कर उस पार जाते हुए देखा है। सूफ़ीवाद में मुर्शिद का यही काम है। इस कहानी में सूफ़ियों की विभिन्न अवस्थाएँ यथा—हाल, मक़ाम, बक़ा, फ़ना और फ़ना होकर बक़ा रहने का वर्णन है। सिराज औरंगाबादी ने भी तो फ़रमाया है :

ख़बर-ए-तहय्युर-ए-इश्क़ सुन न जुनूँ रहा न परी रही
न तो तू रहा न तो मैं रहा जो रही सो बे-ख़बरी रही

यहाँ इस प्रस्तुति में बीनियाँ (सँपेरा) और धामन (साँप) के किरदारों के ज़रिए एक दुर्लभ और लयबद्ध कथा सामने है।

बीनियाँ और धामन

देखो तो यह ज़िंदगी है इक रेगिस्तान।
सुख दुख के गिरिदाब में फँस बैठा इंसान।।

देखी है बस तीरगी अपने घर के बीच।
गर्भ से लेकर गर्भ तक रहे तीरगी सींच।।

गर्भ में रेगिस्तान के, अपने फन को काढ़।
धामन बैठा रेत पर, रेत रहा है झाड़।।

रेत का ये संसार है, लेता जीवन सोख।
ख़ुदा लगाए सोख़्ता, जैसे भरती कोख।।

रेत थलाँ पर बैठकर, अपना आप छिपाय।
कोई जीवन जल चला, अपनी राह बनाय।।

धामन चलता रेत पर, बनता जाए निशान।
चला ढूँढ़ता बीनियाँ, तहरीरें पहचान।।

जहाँ मिट गये, रेत के धारीदार निशान।
यहीं कहीं धामन छिपा, बोला चतुर सुजान।।

सब राहें जब ख़त्म हों, और बैठो थक हार।
वहीं से तुमको छाँटता, चुनता सिरजनहार।।

सबके भीतर है कोई, जिससे सब अनजान।
जिसका जैसा रास्ता, वैसी हो पहचान।।

कहे बीनियाँ मिल गया, रस्ते एक चिराग़।
और वह ढूँढ़न चल पड़ा, कहाँ है बैठी आग।।

सौत ए सरमद बैठकर, बिल के पास बजाय।
मुर्शिद आज मुरीद को, देखो रहा रिझाय।।

धामन अंदर बैठकर, सुनता अनहद राग।
दिल में फिर से जल पड़ी, ठंडी पड़ती आग।।

जैसे पत्ते डोलते, प्रेम शजर के बीच।
धामन झूमे सरापा, बीन की धुन पर रीझ।।

धीरे धीरे बीन का बढ़ने लगा प्रभाव।
भींज गया था प्रेम में, धामन ठाँव कुठाँव।।

बाहर आता देख कर, मुर्शिद हँस हँस जाय।
आय फँसोगे प्रेम में, जितना करो उपाय।।

दीवानापन देखिये, मुर्शिद बीन बजाय।
और मुरीद को झूमना, मुर्शिद रहा सिखाय।।

धामन वेगहि भागता, जैसे जलती लाट।
जो पाया सब दे दिया, लिया हाथ पर काट।।

हँसता हँसता बीनियाँ, रहा ज़हर को चूस।
प्रेम रखा विष दे दिया, बहुत बड़ा कंजूस।।

आगे बढ़ कर पीर ने, पकड़ा फन को हाथ।
छूटे से न छूटता, यह जन्मों का साथ।।

फन को पकड़ उखाड़ता, धामन के विषदंत।
जैसे पहले द्वेष को, वेगहि मारे संत।।

प्रेम पिटारी रख लिया, धामन को मुस्काय।
प्रेम पिटारी चल पड़ी, ऊपर देव सहाय।।

प्रेम पिटारी बैठ कर, धामन रहा कराह।
गाता जाय बीनियाँ, बड़ी कठिन है राह।।

शब बीती जैसे कई जनम गये हों बीत।
ख़ुद में कोई और है, ऐसा हो परतीत।।

सहर हुई तब पीर ने, दिया पिटारा खोल।
फिर से धामन ने सुने, वही बीन के बोल।।

धीरे धीरे मिट चले, झूठे सभी निशान।
धीरे धीरे हो चली, मुर्शिद से पहचान।।

दूध कटोरी पास में, गया बीनियाँ छोड़।
धामन बैठा पी रहा, कीट पतंगें छोड़।।

दिल की भाषा एक है, दो दिल लेते जान।
हो जाती बिन कहे, जन्मों की पहचान।।

मुर्शिद बैठा रात भर, गाता धुनी रमाय।
धामन में भी रात भर, कोई जाय समाय।।

धुन लागी तब जानिये, बाक़ी जग वीरान।
बीन की धुन में बस गई, जा धामन की जान।।

कहे बीनियाँ एक ही ग़लती करे जहान।
दूजों को पहचान ले, ख़ुद से हो अनजान।।

ख़ुद को ही जब न पता, तुझमें तेरा कौन।
दूजों में फिर कौन है, पहचानेगा कौन।।

जब धुन अंदर फूटती, तब आता है ज्ञान।
अंतर धुन को सुन ज़रा, कर अपनी पहचान।।

कहे बीनियाँ सुन धामना! यह तन सुंदर साज।
अनहद फूटे हर घड़ी, बाज सके तो बाज।।

धामन की पीड़ा बढ़ी, ख़ुद तड़पे ख़ुद रोय।
ख़ुद से ही अनजान है, ख़ुद में बैठा सोय।।

ख़ुद को खो कर पा लिया, मुर्शिद दिल में ठाँव।
धामन को आवाज़ दे, अब अनहद का गाँव।।

मुर्शिद आलीशान ने लिया मामला जान।
मुँह से कहे न बीनियाँ, बैठा चतुर सुजान।।

एक पिया संसार का, सोई सिरजनहार।
एक समंदर सौ नदी, अनगिन उसकी धार।।

मुर्शिद तीरंदाज़ है, बीन धनुष और बाण।
धामन फल है शाख़ का, जिस विध सब सामान।।

जैसे मछली जल बिना, पल भर जी न पाय।
धामन सच्चा संत वह, जिसकी आस ख़ुदाय।।

बीन पिया के हाथ में, झूम रहा संसार।
एक पिया संसार का, धामन कहे पुकार।।

जब अनहद की बात हो, मनवा दे मुस्काय।
चुप रहिये चुप साधिए, दूजा नहीं उपाय।।

सब सुनने की बात है, कुछ कहने की नाहिं।
जो कहिये बेमोल है, दिन ढलता दिन माँहि।।

कहे बीनियाँ धामना! काटे फ़सल किसान।
सुख दुख जब झड़ने लगें, फ़सल पकी तब जान।।

भटका फिरता सब जहाँ, दिल मे तेरे ख़ुदाय।
धामन शजर का सब्र देख, खड़ा खड़ा सब पाय।।

दिल दरिया दरियाव है, गौहर रखे छुपाय।
धामन बाहर कुछ नहीं, भीतर सभी उपाय।।

मन के राखे ज़िंदगी, मन के राखे मौत।
धामन जब मन में पिया, सुख दुख दोनों सौत।।

धामन इस संसार का सीधा एक निचोड़।
जितनी छोटी चाहतें, उतनी लंबी दौड़।।

धामन दुखिया ये जहाँ, सुख की आस लगाय।
सुख दुख खूँटी टाँग दे, सबसे सरल उपाय।।

मन की शाख़ फुलाय के, बिड़वा गयी चबाय।
धामन आस निरास है, ख़ुद बोवे ख़ुद खाय।।

कहे बीनियाँ धामना! खेल परम का खेल।
ख़ुद को जाय छुपाय दे, फिर साहेब का मेल।।

धामन को लेकर चला, मुर्शिद रेगिस्तान।
छोड़ के वापस आ गया, जगह सही पहचान।।

रेत थलाँ से आ रही, कहीं एक आवाज़।
मरी रेत पर देखिये, जीवन नाचे आज।।

हर शै में था बीनियाँ, देखे धामन आज।
रेत थलाँ से आ रही, अनहद की आवाज़।।

किसी रूहानी कण ने भेजा, मुर्शिद को संदेश।
नाच रहा कोई यहाँ, धरकर तेरा भेस।।

मुशिर्द आया लौटकर, अबके ख़ाली हाथ।
अनहद धुन पर झूमते, इक दूजे के साथ।।

***

सूफ़ीवाद के अध्येता-कवि सुमन मिश्र रेख़्ता फ़ाउंडेशन के उपक्रम सूफ़ीनामा से संबद्ध हैं। वह ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश में रहते हैं। उनसे sumansohrawardi@gmail.com पर बात की जा सकती है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 21वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

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