मार्गरेट एटवुड के उपन्यास ‘द हैंडमेड्स टेल’ का एक अंश ::
अनुवाद और प्रस्तुति : यादवेंद्र

वर्ष 1985 में पहली बार प्रकाशित कनाडा की सम्मानित लेखक मार्गरेट एटवुड की किताब ‘द हैंडमेड्स टेल’ भले ही उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति न मानी जाती हो, लेकिन गए 32 वर्षों से यह निरंतर चर्चा में है और स्त्री-विमर्श का अनिवार्य हिस्सा रही है. प्रतिष्ठित निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने न सिर्फ इस पर चर्चित फिल्म बनाई बल्कि ब्रॉडवे थिएटर ने इसकी नाट्य-प्रस्तुति की और आजकल अमेरिकी टी.वी. पर इसकी धारावाहिक प्रस्तुति ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्त्रीविषयक विचारों के संदर्भ में इस किताब को चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है. ऐसे कम ही उदाहरण मिलेंगे कि दशकों पहले छपी किताब समकालीन विमर्श के लिए कच्चा माल प्रस्तुत करे. यह तथ्य साहित्यिक कृतियों की कालजयी प्रासंगिकता और रचनाकार की सजग दूरदृष्टि को स्थापित करता है.

जब मार्गरेट एटवुड ने इस किताब को लिखना शुरू किया था, तब वह जर्मनी में रह रही थीं और अपने अनुदार और धार्मिक कट्टरपंथी विचारों के लिए जाने जाने वाले रोनाल्ड रीगन कुछ वर्ष पहले अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे. दूसरी तरफ स्त्रियों को पढ़ाई और नौकरियों में भरपूर स्थान देने वाला ईरान बिल्कुल विपरीत सोच वाले कट्टर इस्लामी मुल्लाओं की गिरफ्त में आ गया था. इन दो विश्व परिघटनाओं ने मार्गरेट एटवुड के मन पर गहरा असर छोड़ा और उन्होंने इन अतियों के बीच भविष्य में निर्मित होते समाज की कल्पना की जिसके केंद्र में स्त्रियों की आजादी और प्रजनन पर लगाई जा सकने पाबंदियां थीं… इसकी परिणति है उनका उपन्यास ‘द हैंडमेड्स टेल’.

इस उपन्यास में भविष्य में अमेरिका पर ईसाई कट्टरवादियों द्वारा कब्जा कर ओल्ड टेस्टामेंट के अनुसार चलने वाले धर्मप्रधान शासन लागू करने और उस दौरान स्त्रियों के साथ किए जाने वाले सलूक को कथानक बनाया गया है. पर्यावरण और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते संतानहीनता से ग्रसित समाज में स्वस्थ युवा स्त्रियों को चुन-चुनकर संतानहीन बड़े ओहदेदारों के साथ दो साल रहकर उनके बच्चे पैदा करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है— ऐसी स्त्रियों को हैंडमेड्स नाम दिया गया है.

प्रभावशाली ओहदेदारों की पत्नियों को बच्चे पैदा कर सकने के काबिल इन हैंडमेड्स स्त्रियों के साथ अपने पतियों को शारीरिक संबंध बनवाना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप जन्मे बच्चों की असली मां का नाम कभी नहीं जुड़ेगा. उनके अन्य सभी अधिकार छीन लिए गए हैं, यहां तक कि पढ़ने तक की उनको मनाही है. नए निजाम में स्त्रियों के अपने कोई नाम नहीं हैं, वे जिन पुरुषों के लिए संतान पैदा करेंगी उनके नाम के साथ जुड़ जाएंगी.

इन दिनों मार्गरेट एटवुड के इस उपन्यास पर इसी नाम से ब्रूस मिलर द्वारा निर्मित अमेरिकी टी.वी. धारावाहिक गंभीर चर्चा में है जिसके साथ लेखिका का नाम भी कन्सल्टिंग प्रोड्यूसर के तौर पर जुड़ा हुआ है. दुनिया के अनेक देशों में यह टी.वी. धारावाहिक दिखलाया जा रहा है.

ब्रूस मिलर का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप की विजय और धारावाहिक के प्रसारण के समय का संयोग दुनिया के लिए भले ही खौफनाक हो, पर मेरे लिए भाग्यशाली और महत्वपूर्ण है. धारावाहिक की निर्देशक रीड मोरानो कहती हैं कि मार्गरेट एटवुड अपनी किताब के जरिए यह बताती हैं कि युगांतरकारी बदलाव रात भर में संभव नहीं होते, बहुत धीमी गति से होते हैं और आपको उनके होने की भनक भी तब मिलती है जब चीजें बदल चुकी होती हैं. अनुदारवादी सत्ता की अमेरिकी स्त्रियों के प्रजनन संबंधी अधिकारों पर अंकुश (उदाहरण के लिए गर्भपात पर रोक) लगाने की कोशिशों के संदर्भ में इस सीरियल के माध्यम से समूचे मानवीय अधिकारों और आजादी की अवधारणा पर तीखी चर्चा शुरू हो गई है. किसी साहित्यिक कृति के सार्वजानिक विमर्श के केंद्र में इस तरह खड़े हो जाने का यह अद्वितीय उदाहरण हमारे सामने आया है.

यहां प्रस्तुत हैं इस उपन्यास के बारे में मार्गरेट एटवुड के कुछ उद्धरण और इसका एक अंश :

  • मैं देख रही थी कि बहुत सारी बातें जो मैंने तब सोची थीं अब हकीकत के रूप में सामने आने लगी हैं, बल्कि हकीकत बनकर हमारे सामने खड़ी हैं.
  • दरअसल, यह ‘वैकल्पिक वास्तविकता’ कम और इस बात की चेतावनी ज्यादा है कि यदि बराबरी की लड़ाई लड़ने वाले लोग थोड़े भी शिथिल हुए तो यह बिल्कुल हो सकता है.
  • मुझे उम्मीद है कि यह टी.वी. शो ट्रंप के अमेरिका के खतरों के बारे में लोगों को ज्यादा जागरूक बनाएगा.
  • इस किताब में जितनी बातें उठाई गई हैं, उनमें से एक-एक बात की मिसाल इतिहास में मौजूद है. मैं इस बारे में बेहद सतर्क रही हूं कि कोई ऐसी बात न लिखूं जो कहीं न कहीं किसी न किसी ने किया न हो. आप इस तरह की किताब लिखते ही इसलिए हो कि ये बातें वास्तविकता में बदलने न पाएं.
margaret atwood book handmaids-tale
तस्वीर सौजन्य : ब्रीफटेक

कुछ लोगों का एक झुंड हमारी तरफ आ रहा है, देखकर ऐसा लगता है जैसे वे सैलानी हों. शक्ल-सूरत से जापानी लग रहे हैं— शायद कोई व्यापार प्रति‍निधि मंडल है जो हमारे देश की ऐतिहासिक चीजों को देखने निकला है, या यह भी हो सकता है कि वे स्थानीय लोगों को निकट से देखना चाहते हों. कद-काठी में वे छोटे हैं, पर अच्छी‍ तरह सजे-धजे हैं. हर किसी के चेहरे पर चाहे वह पुरुष हो या स्त्री मुस्कान है और कंधे पर कैमरा. बड़ी जिज्ञासापूर्ण निगाहों से आंखें फाड़-फाड़कर वे चारों ओर निहार रहे हैं. उनकी प्रफुल्लता इतनी आक्रामक है कि मैं उन पर से अपनी नजरें हटा नहीं पा रही हूं. कितने दिन हो गए मैंने इतने छोटे स्कर्ट पहने हुए किसी स्त्री को नहीं देखा. स्कर्ट घुटनों तक हैं और उनके नीचे बारीक स्टॉकिंग्स में टांगें लगभग नंगी दिख रही हैं. उन्होंने ऊंची हील की जूतियां पहनी हुई हैं और उनके तस्मे पैरों के चारों ओर इस तरह लपेटे हुए हैं, जैसे यंत्रणा देने के नाजुक यंत्र हों. स्त्रियां असंतुलित होकर इधर-उधर लचकती हुई चल रही हैं जिससे उनकी पीठ कमान की तरह मुड़ी हुई दिखाई दे रही है और नितंब बाहर को उभरे हुए. उन सबके सिर नंगे हैं और केश लहरा रहे हैं— काले और मादकता से सराबोर. उन सबने गाढ़े लाल रंग की लिपस्टिक लगा रखी है जो पुराने समय के वॉशरूम की दीवारों पर चिपक गए धब्बों की तरह लग रही है.

मैं चलते-चलते ठहर जाती हूं, ऑफ्लेन भी मेरे साथ ठहर जाती है और मुझे मालूम है मेरी तरह ही उसकी नजरें भी इन स्त्रियों पर चिपकी हुई हैं. हम दोनों मंत्रमुग्ध होकर इन स्त्रियों को देख रहे थे, पर साथ ही साथ हमारे मुंह का स्वाद भी कुछ कसैला हो रहा था. हमें लग रहा था जैसे उन्होंने कोई कपड़े पहने ही न हों, बिल्कुल निर्वस्त्र हों. हमारे मनोभावों में यह तब्दीली पलक झपकते हो गई थी. यह मामला ही ऐसा था.

तभी मेरी स्मृति में यह बात कौंधी कि पहले मैं भी ऐसे ही कपड़े पहना करती थी. वह आजादी थी. मुझे देखकर वे कहते थे : पश्चिमी रंग-ढंग.

जापानी सैलानी सीधे चलते हुए हमारी ओर आ रहे थे, आपस में बातचीत करते हुए. हमने अपना मुंह मुश्किल से उधर से हटाया. हमारे चेहरे उनके सामने बेपर्दा हो चुके थे. नीले रंग का सूट और लाल रंग की नमूनेदार टाई पहने उनके साथ एक दुभाषिया था. वह उनके बीच से निकलकर आगे आया और लगभग हमारा रास्ता रोकते हुए बीच में खड़ा हो गया. साथ के सभी सैलानी उसके पीछे खड़े रहे. उनमें से एक ने अपना कैमरा ऊपर उठा लिया.

‘‘माफ करिएगा’’, दुभाषिया हम दोनों की तरफ मुखातिब होकर भरपूर अदब के साथ बोला, ‘‘वे पूछ रहे हैं क्या आपकी फोटो ले लें?’’ मैंने अपनी निगाहें किनारे कर लीं और सिर हिलाकर इंकार कर दिया. सोचा, उनकी फोटो में आएगा भी क्या— सफेद चुनरी (विंग्स), नाम भर का चेहरा, मेरी ठुड्डी और थोड़ा-सा मुंह, आंख तो बिल्कुल ही नहीं. मुझे दुभाषिए से ज्यादा इस बारे में मालूम था. आमतौर पर दुभाषिए आंख होते हैं या उनको कहा यही जाता है. मुझे यह भी अच्छी तरह मालूम है कि ‘हां’ कहने से बेहतर क्या हो सकता है. लीडिया आंटी कहा करती हैं कि लज्जा दरअसल दृश्य से तुम्हें अनुपस्थित कर देती है, यह तुम लोगों को नहीं भूलना चाहिए. निहारे जाने का मतलब उपभोग किया जाना है, कांपती हुई आवाज में उन्होंने बताया था, ”तुम लोगों को अपना उपभोग नहीं होने देना है, लड़की.” लीडिया आंटी हमें लड़की कहकर ही पुकारा करती हैं.

मेरे साथ-साथ ऑफ्लेन भी चुप्पी साधे रहती है. उसने लाल दस्ताने वाले अपने हाथ अंदर छुपा रखे थे. दुभाषिया पीछे पलटकर सैलानियों से बात करता है, जाने किस भाषा में जो मुझे बिल्कुल समझ नहीं आई. पर मुझे पूरी तरह एहसास था कि वह बोल क्या रहा होगा. वह उनसे बोल रहा होगा कि यहां की स्त्रियों के रीति-रिवाज बिल्कुल अलग हैं. उनको कैमरे के लेंस के पीछे से निहारना एक तरह की घुसपैठ है, अनचाहा हस्तक्षेप है. मेरी निगाहें अब भी नीचे थीं. स्त्रियों के पैरों का जादू मुझे अब भी बांधे हुए था, उनमें से एक ने ऐसा सैंडल पहना हुआ था जिससे उसके अंगूठे बाहर निकले हुए थे और अंगूठे के नाखून गुलाबी रंग से रंगे हुए थे.

अचानक मेरी स्मृति में नेल पॉलिश की गंध उभर आई. मुझे ध्यान आया यदि नेल पॉलिश बहुत जल्दी-जल्दी एक के ऊपर दुबारा लगा दी जाए तो कैसे उसमें झुर्रियां पड़ जाती हैं और बाहर निकले हुए अंगूठे शरीर के वजन से कैसे और बाहर फिसलने लगते हैं.

लाल नाखूनों वाली स्त्री अपना वजन अदल-बदलकर अपनी टांगें आगे बढ़ा रही थी, उसे देखकर मुझे महसूस हुआ जैसे सैंडल उसने नहीं मैंने अपने पैरों में पहनी हुई है. दूर खड़े होने के बावजूद नेल पॉलिश की तीखी गंध मुझ तक पहुंच रही थी और मेरी भूख निरंतर बढ़ती जा रही थी.

‘‘माफ कीजिएगा’’, दुभाषिए ने हमारी और मुखातिब होकर फिर से कहा.

मुझे उन सबके मनों में उठ रही उत्सुकता का आभास हो रहा था : क्या ये औरतें सुखी हैं? इन हालातों में कोई सुखी कैसे रह सकता है?

मुझे उन सबकी काली आंखें घूरती हुई लगीं. आगे की ओर झुककर वे हमारा जवाब सुनने को आतुर थे— खासतौर पर स्त्रियां, पर आतुरता पुरुषों में भी कम नहीं थी. हमारी दुनिया रहस्यों से भरी है, पहुंच से परे और वर्जित है. हमें देखकर वे आपा खोने लगते हैं.

ऑफ्लेन चुप्पी साधे रहती है, कुछ नहीं बोलती. पर चुप्पी साधे रहना कई बार खतरे को आमंत्रित भी करता है.

‘‘हां, हम बहुत खुश हैं’’, मैं लगभग फुसफुसाते हुए कहती हूं. आखिर कुछ जवाब तो देना ही था. उनके सवालों का आखिर और क्या जवाब हो सकता था?

***

यादवेंद्र सुपरिचित अनुवादक हैं. मुंबई में रहते हैं. उनसे yapandey@gmail.com पर बात की जा सकती है.

1 Comment

  1. SUSHMA NAITHANI April 10, 2018 at 5:30 am

    The title could have been “लज्जा दरअसल दृश्य से तुम्हें अनुपस्थित कर देती है”

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