निकानोर पार्रा पर कुछ नोट्स और उनकी तीन कविताएं ::
उदय शंकर

[एक] 

कितने लोग अलेखान्द्रो जोदरोवस्की को जानते हैं, पता नहीं! स्पेनिश का अद्भुत अफसानानिगार रॉबर्तो बोलान्यो उसका शागिर्द होना चाहता था. लेकिन उसके अनुशासन और छड़ी की पिटाई के डर से भाग खड़ा हुआ था. उसी अलेखान्द्रो जोदरोवस्की की कविताई का गुरु निकानोर पार्रा था. उसने अपनी ऑटोबायोग्रोफिकल फिल्म Endless Poetry (2016) के संदर्भ में निकानोर पार्रा को कुछ इस तरह याद किया है :

नेरुदा एक कवि के रूप में स्थापित हो चुके थे और मेधा से लैस भी थे, तभी उन्हें भान हुआ कि पाठक-श्रोता के रूप में उन्हें एक बड़ी जनता मिल सकती है, इसलिए वह कम्युनिस्ट हो गए. कम्युनिस्ट तो वह हो गए, लेकिन उनसे कविता छूट गई, इसके बावजूद वह देश-दुनिया में लोकप्रिय हो उठे. उन्होंने वही किया, जो वह चाहते थे. लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि बाज मक्खियों से नहीं लड़ता है. अपनी प्रसिद्धि के चरम पर जब बाज मक्खियों के साथ नाचना शुरू कर दे तो वह विदूषक बन जाता है. वह स्पीलबर्ग जैसे बड़े व्यापारी बन गए! सिनेमा के एक व्यक्तित्व के रूप में स्पीलबर्ग बड़े ही प्रतिभावान आदमी थे, लेकिन क्या हुआ? बहुत, बहुत बड़ा व्यापार! अब वह एक ऐसा बाज है जो मक्खियों के साथ नाचता है.

निकानोर पार्रा मेरा मास्टर है. जब नेरुदा एक बड़े कवि और एक रोमांटिक कम्युनिस्ट थे, तब वह एक अकवि (एंटी पोएट) था. लोगों को उसने सच्ची कविताओं से वाबस्ता कराया, वह सचमुच में एक मजेदार आदमी था. वह मेरा मास्टर था, मैं उसे एक कवि की तरह प्यार देता था. जब मैं ‘एंडलेस पोएट्री’ शूट कर रहा था, तब वह सौ साल के हो चुके थे. मैं उनसे मिलने गया, वह सौ साल के हैं, सौ साल के. प्रखर मेधा से लैस आज भी वह जिंदा हैं, और हमेशा की तरह कुछ कठिनाइयों के बीच अपना काम कर रहे हैं. वह एक इंसान हैं, निपट इंसान, जिनसे मैंने बात की है. अपनी फिल्म में मैंने खुद भी सौ साल के एक बूढ़े की भूमिका की है. मैं उन्हें देखने गया और कहा, ‘‘एक सौ साल का आदमी मुझसे क्या कहना चाहेगा?’’ वह बोले, ‘‘बूढ़ा होना कोई अपमान नहीं हैं. तुम अपने पैसे खोते हो, अपनी यौवन-महिमा के गुणगान से नजात पाते हो, धन-यौन-लिप्सा से मुक्त हो जाते हो. इस तरह तुम सब कुछ खोकर एक फतिंगे में तब्दील हो जाते हो.

[दो]

निकानोर पार्रा ने, संभवतः, सबसे ज्यादा दिन तक जीवित रहने वाले कवि का कीर्तिमान बनाया है.

[तीन]

हिंदी के एक वरिष्ठ कथाकार-संपादक ने कभी बहुत क्षोभ से यह स्वीकारा था कि हिंदी में मरण का बड़ा महात्म्य है.

103 बरस जी कर 23 जनवरी 2018 को इस दुनिया से गुजरने वाले निकानोर पार्रा एक-दो दिन तक हिंदी के सबसे बड़े कवि बने रहे और फिर मर गए.

[चार]

मृत्यु के उपरांत ‘पहले आत्मा की शांति हो’ जैसे यज्ञनुमा माहौल के निर्माण में हिंदी साहित्यिक समाज जुट जाता है. कुछ ऐसी आपाधापी मचती है कि किसका स्त्रोत जल्दी से जल्दी लिपिक चित्रगुप्त के पास चला जाए और उनका नाम स्वर्ण-अंकित हो जाए. इसके बाद लावा-पैसा-लूट. निकानोर पार्रा की बमुश्किल दस कविताएं हिंदी में उपलब्ध होंगी, लेकिन पार्रा की मृत्यु ने उनकी कविता के कई तुरंता अनुवादक हिंदी के मरणप्रिय संसार में जन दिए. जिन्होंने पार्रा का P तक नहीं पढ़ा, वे भी पार्रा-सी पुण्यात्मा की शांति के लिए लावा-पैसा-लूट में शामिल हो गए. कुछ तो ‘पोएम हंटर’ से तत्काल अनुवाद करने लगे. जबकि मूल स्थिति यह है कि नेरुदा और पार्रा से ही आधुनिक हिंदी कविता की शुरुआत मानने वाले महानुभावों से निकानोर पार्रा पर एक मौलिक स्मृति-आलेख तक नहीं लिखा गया. वे सब के सब कभी जवानी के जोश और गलतियों में किए गए गलत-सलत अनुवाद हिंदी की एक आभासी दीवार चिपकाते चले गए.

[पांच]

नेरुदा और पार्रा से ही हिंदी कविता की शुरुआत मानने वाले महानुभावों द्वारा हिंदी की अंधेरी दुनिया में किए गए निकानोर पार्रा की कविताओं की दुनिया कैसी है, इसे नीचे दिए गए दो स्क्रीन-शॉट्स से समझा जा सकता है. जहां करने और सराहने वाले दोनों ही निरुत्तर हैं :

*

[छह]

इस दरमियान यह वाक्य भी बार-बार पढ़ने में आया कि ‘नेरूदा के बाद चीले के सबसे बड़े कवि निकानोर पार्रा’ जबकि पार्रा नेरुदा के बाद के नहीं, बल्कि उसके तोड़ के हैं. वह नेरुदा का दुश्मन कवि/विलोम था. नेरुदा एक ‘कम्युनिस्ट रोमांटिक’ कवि बन गए और इससे उत्पन्न शून्य को निकानोर पार्रा ने भरा. निकानोर को कवि के रूप में पढने की सलाहियत यह नहीं है कि वह नेरुदा के बाद के कवि हैं, बल्कि यह है कि वे नेरुदा के प्रतिपक्ष के कवि हैं.

नेरुदा और पार्रा के संदर्भ में सामंजस्य की ऐसी कोई जमीन नहीं है कि आप वहां जगह बना सकते हैं. स्पैनिश जगत के लिए नेरुदा एक सरकारी कवि हैं, दूतावास के कवि हैं, जैसे अपने यहां हिंदी में अशोक वाजपेयी हैं, जो खूब प्रेम-कविताएं लिखते हैं. नेरुदा की भावुक काव्य-सिम्तों से लस-पस स्पैनिश काव्य-संसार से चिढ़कर ही निकानोर पार्रा ने खुद को अकवि कहना और अपनी कविताओं को अकविता कहना शुरू किया और लोगों ने उसे नेरुदा का हस्तांतरण माना.

*

निकानोर पार्रा की तीन कविताएं :

प्रश्नपत्र

अकवि क्या है :
वह, जो ताबूत और अस्थि-कलश की दलाली करता है?
एक जनरल जो खुद के बारे में ही निश्चित नहीं है?
एक पादरी जिसे किसी चीज पर आस्था नहीं है?
एक सैलानी जिसके लिए हर चीज अजीब है, वृद्धावस्था और मृत्यु भी?
एक वक्ता जिस पर आप विश्वास नहीं कर सकते?
खड़ी-चट्टान की कोर पर खड़ी एक नर्तकी?
एक आत्ममुग्ध जो हर किसी से प्यार करता है?
एक जोकर जो गाल बजाता है
और बेवजह यूं ही बुरा बनता है?
एक कवि जो कुर्सी पर सोता है?
आधुनिक समय का एक कीमियागर?
एक आरामतलब क्रांतिकारी?
एक पेटी-बुर्जुआ?
एक जालसाज?
एक ईश्वर?
एक मासूम?
सैंटियागो, चिली का एक किसान?
सही उत्तर को रेखांकित करें.

अकविता क्या है :
चाय की प्याली में एक तूफान?
चट्टान पर बर्फ का एक धब्बा?
मानव-मल से ऊपर तक भरा एक पतीला,
जैसा कि फादर साल्वेतियेरा मानता है?
एक आईना जो झूठ नहीं बोलता?
लेखक-संगठन के अध्यक्ष के गाल पर पड़ा एक तमाचा?
(ईश्वर उनकी आत्मा की रक्षा करे!)
युवा कवियों को एक चेतावनी?
जेट-चालित एक ताबूत?
एक ताबूत जो वायुमंडलीय दायरे से बाहर परिक्रमा करता है?
एक ताबूत जो कि केरोसिन से चलता है?
एक शवदाह-गृह जहां कोई शव नहीं है?
सही उत्तर के सामने X चिन्हित करें.

*

चेतावनी

अगले आदेश तक
आग लगने पर
लिफ्ट का नहीं
सीढ़ियों का इस्तेमाल करें
अगले आदेश तक
ट्रेन में धूम्रपान न करें
गंदगी न फैलाएं
शौच न करें
रेडियो न सुनें
अगले आदेश तक
हर उपयोग के बाद
टॉयलेट को फ्लश करें
ट्रेन जब प्लेटफॉर्म पर हो
तब शौच न करें
बगल के सहयात्री से लेकर
धार्मिक सैनिकों तक के प्रति अपनी राय रखें
जैसे, दुनिया के मजदूरों एक हो,
हमारे पास खोने को कुछ नहीं है (धत्)
हमारा जीवन तो परम पिता परमेश्वर, ईसा मसीह
और पवित्र आत्मा का महिमागान है आदि
अगले आदेश तक
इंसान एक रचयिता की संपन्न कृति है (धत्)
इंसानों के कुछ अपरिहार्य अधिकार हैं
उनमें से कुछ इस प्रकार हैं :
जीने की आजादी और खुश रहने के तरीके की खोज
वैसे ही जैसे दो जोड़ दो चार होता है
यह अंतिम है लेकिन कम नहीं
इन सच्चाइयों को वैसे भी
हम हमेशा से स्वयंसिद्ध मानते आए हैं

*

युवा कवियों के लिए

जैसे मर्जी वैसे लिखो
जो शैली पसंद आए उसी में लिखो
एक ही रास्ता, एक ही रास्ता की रट के कारण
पुल तले अथाह रक्त प्रवाहित हुआ है

कविता एक खुली खेती है
शर्त सिर्फ इतनी है कि
अपने बकवास से पन्ने को सुधारते रहो

***

[ उदय शंकर द्वारा अनूदित ये कवितायें क्रमशः टी विग्नेसन और मिलर विलियम्स के अंग्रेजी अनुवाद पर आधृत हैं.]

1 Comment

  1. Sanjay singh February 3, 2018 at 1:40 pm

    आखिरी कविता की आखिरी तीन पंक्तियों मे आपसे भी झोल हो गया है।

    Reply

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