नस्र ::
तसनीफ़ हैदर

Tasneef Haidar on ghazal
तसनीफ़ हैदर

ग़ज़ल के बारे में बात करते वक़्त सबसे ज़्यादा ज़रूरी ये है कि हम देखें कि ग़ज़ल का पाठ अपनी पूरी हैसियत में हमें क्या देता है। हम उस ज़माने से कुछ बाहर निकल आए हैं, जहाँ उस्ताद अपने शागिर्दों को दो सौ, पाँच सौ ग़ज़लें याद करने के लिए दिया करते थे। इन ग़ज़लों को याद करवाने का मक़सद ज़बान के साथ साथ ग़ज़ल के उसूलों को घोल कर शागिर्द के ज़हन-ओ-दिल में उतार देना होता था, मगर चंद शाइरों को छोड़कर ऐसे हज़ारों शाइर, जिनसे हमारे पुराने तज़किरे (तज़किरा एक तरह की डायरी हुआ करता था, जिसमें शाइर अपने समकालीन और पहले के ज़माने के शाइरों का कुछ हाल और पसंदीदा शे’र लिखा करते थे) भरे हुए हैं, किस काम के हैं?

मैं बहुत छोटी उम्र से देखता आ रहा हूँ कि उर्दू पत्रिकाओं में अफ़्सानों, नज़्मों, आलोचना वग़ैरा के साथ-साथ ग़ज़लें भी प्रकाशित होती हैं। इन छोटी-बड़ी ग़ज़लों से, जो कि हमारे शाइर लिखा करते हैं, आख़िर फ़ायदा क्या है, अच्छा, फ़ायदा थोड़ा गै़रज़रूरी-सा लफ़्ज़ है, ये पूछना चाहिए कि उनकी तुक क्या है? परंपरा के तौर पर हर चीज़ को मंज़ूर करना चाहिए, मगर ऐसी चीज़ों पर सवाल उठाते रहना और उनके बारे में सोचना ऐसा बुरा काम क्यों समझा जाए?

ग़ज़ल अपनी पूरी शक्ल में कोई चीज़ है ही नहीं, वो अपने-अलग अलग शे’रों से मिलकर तैयार होने वाली एक एंडी-बेंडी-सी कोई चीज़ है। हर शे’र की पहचान उसका ख़याल है, हर ख़याल की हद-बंदी उस के क़ाफ़िये और रदीफ़ की वजह से होती है। मुझे ज़ाती तौर पर तो यही महसूस हुआ है कि आज तक कोई ऐसी ग़ज़ल नहीं लिखी गई है, जो मुकम्मल तौर पर अच्छी या बुरी हो, उसमें अगर दस अश’आर लिखे गए हैं तो चार-पाँच अच्छे होंगे, पाँच लिखे गए हैं तो दो या ज़्यादा से ज़्यादा तीन। बाक़ी भर्ती के तौर पर लिखे जाने वाले ऐसे अशआर होते हैं जो बे-इरादा तौर पर शाइर को अशआर का ख़ालीपन भरने के लिए और ग़ज़ल की माला को पूरा पिरोने के लिए लिखे जाते हैं। इसलिए ये तो कहा जा सकता है कि इस ग़ज़ल के इतने शे’र अच्छे हैं और इतने बुरे, मगर चूँकि ग़ज़ल अपने साथ तारीफ़ और वाह-वाह का एक पारंपरिक ढोंग भी लपेटे चली आ रही है, इसलिए लोग हर शे’र पर कलेजा चीर कर रख देने वाली आह और वाह न्योछावर किए जाते हैं।

यहीं से शुरू होती है ग़ज़ल के ख़िलाफ़ एतराज़ की एक बरसात। ग़ज़ल क्या करती है और क्या करती आई है। मेरे ख़याल में ग़ज़ल पढ़ने और लिखने के कुछ ऐसे नुक़्सानात हैं, जिन पर नज़र डालना और उनके तअल्लुक़ से बात करना ज़रूरी है। पहली बात तो ये है कि शे’र की हैसियत किसी चुटकुले से ज़्यादा कुछ नहीं। दो मिसरों या लाइनों का एक शे’र, आपको ज़्यादा से ज़्यादा चौंका या गुदगुदा सकता है, इसमें फ़िक्र या सोच के लिहाज़ से फैलाव नहीं होता। गिने-चुने शब्दों में अपनी बात कहनी होती है, बात भी ऐसी जो सुनने वाले के दिमाग़ पर ऐसा असर करे, जिससे वो बस दिल पकड़ कर बैठ रहे या फिर किसी बात के ऐसे नए पहलू की तरफ़ इशारा कर दिया जाए जो सुनने वाले को चौंका दे। फिर इन बातों में भी आप पर पिछली तीन सौ बरसों की परंपरा का ऐसा असर है कि सनम, हिज्र, विसाल, दर्द, मजनूँ, सहरा ग़ज़ल से पूरी तरह कभी दूर नहीं किए जा सकते। उर्दू के एक बहुत ज़्यादा ग़ज़लें लिखने वाले शाइर से जब इस बात पर कभी जवाब माँगा गया था तो उन्होंने एक इस्लामी ख़लीफ़ा का क़ौल पेश कर दिया था कि ‘‘बातें अगर दुहराई ना जातीं तो ख़त्म हो जातीं।’’ मगर ग़ज़ल के तअल्लुक़ से समझना चाहिए कि ऐसी बातें जो हज़ारों बार दुहराई जाती रही हैं, उनके ख़त्म हो जाने में ही भलाई है।

ग़ज़ल पर दूसरा एतराज़ ये है कि इसका सामाजिक तब्दीलियों, इंसान के दिमाग़ की प्रगति और दुर्गति से कोई ख़ास रिश्ता नहीं है। वो लकीर की फ़क़ीर है, इसके सब मामलात अचल और अटल हैं। इसलिए दूसरी अस्नाफ़ (शाइरी की फ़ॉर्म्ज़) के मुक़ाबले में जब आप ग़ज़ल का अनुवाद किसी दूसरी ज़बान में करते हैं तो उसके शे’रों की क़लई खुल जाती है। अनुवाद तो दूर की बात है, आप ज़रा कभी ग़ज़ल के अच्छे से अच्छे शे’र को सरल शब्दों में बयान करके देखिए, मालूम होगा कि बस यूँ ही-सी कोई बात है, जिस पर इतना शोर मचाया गया है। मेरी राय में ग़ज़ल में जो बड़ी से बड़ी सोच विचार की गुंजाइश थी, ग़ालिब उसका भरपूर फ़ायदा उठा चुके हैं। इसलिए मीर की दो हज़ार ग़ज़लों के मुक़ाबले में ग़ालिब के मुतदाविल (आमतौर पर प्रकाशित) दीवान की ढाई सौ ग़ज़लें इस लिहाज़ से से ज़्यादा काम की मालूम होती हैं।

अब आप सवाल पूछ सकते हैं कि अगर ग़ज़ल ऐसी ही सस्ती और ओछी चीज़ है तो उसे इतनी शोहरत क्यों हासिल हुई है। इसकी वजह है कि हमारे दिमाग़ का चीज़ों को आसानी के तौर पर ज़्यादा स्वीकार करना। आमतौर पर हमारा मस्तिष्क उन बातों को जल्दी क़ुबूल करता और पसंद फ़रमाता है, जिनको समझने और जानने के लिए ज़्यादा मेहनत न करनी पड़े। बात सामने की हो और फिर अगर उसको दो बराबर की बाटों के बीच रख कर और सजा-बना कर पेश किया जाए तो वो और स्वीकार-योग्य हो जाती है।

क्या आप अख़बार पढ़ते हैं? अख़बारों में लिखने वाले ऐसे बहुत से सस्ते राइटर आपको मिल जाएँगे जो बहुत छोटी-छोटी कहानियाँ लिखा करते हैं। इन कहानियों में किसी भी बात को बस घुमा-फिरा कर एक चुटकुले की शक्ल में ढाल दिया जाता है, अख़बार में उनके लिए एक छोटी-सी जगह रखी गई होती है, आप देखेंगे कि इन कहानियों को बड़ी दिलचस्पी और शौक़ के साथ पढ़ा जाता है, मगर ये कहानियाँ रोज़ पैदा होती हैं और रोज़ दम तोड़ देती हैं। इनकी कोई साहित्यिक अहमियत और पहचान नहीं होती है, न इन्हें याद रखा जा सकता है, ऐसी कहानियाँ सामाजिक ना-इंसाफ़ियों पर फब्तियाँ कसती हैं, सियासतदानों का मज़ाक़ उड़ाती हैं, चौंकाती हैं , हँसाती हैं और ज़रा-सी देर को आपकी नज़र का दामन घसीटने में कामयाब हो जाती हैं। मगर उनमें कोई गहराई नहीं होती, आमतौर पर इस क़िस्म की कहानियाँ लिखने वाले पढ़ने की आदत से भी दूर ही रहा करते हैं, उनके लिए कामयाब लंबी कहानियाँ, जिनमें फैलाव हो या किसी समाज के सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व का पोटेंशियल हो, लिखना और पढ़ना दोनों ही मुश्किल हो जाता है। ये छोटी और मुख़्तसर कहानियाँ उन्हें काहिल और नाकारा बना देती हैं, और ठीक यही बात ऐसी कहानियों के पाठकों के साथ भी पेश आती है। बात वही है कि चुटकुले गढ़ने या पढ़ने वाले लोगों से नॉविलों के पढ़ने और गहरी रचना दोनों की अपेक्षा रखना संभव नहीं है, उनका दिमाग़ सतही चीज़ों में उलझ कर रह जाता है। ठीक यही मुआमला हमारे यहाँ ग़ज़ल के शाइर और पाठक दोनों के साथ पेश आया है।

‘उदास नस्लें’ जैसे नामी नॉविल के लेखक अब्दुल्लाह हुसैन ने अपने एक ख़त में प्रसिद्ध शाइर साक़ी फ़ारूक़ी को गाली देते हुए लिखा था कि उर्दू का शाइर लंबी रचनाएँ न लिख सकता है, न पढ़ सकता है, वो बीच में ही हाँफ जाता है। ये एक ऐसा जुमला है जो ग़ज़ल और उसकी ‘तहज़ीब’ पर एक ज़बरदस्त चोट की हैसियत रखता है, बात सोचने-समझने वालों के लिए काफ़ी है। इस बात का गहरा एहसास उस वक़्त होता है जब आप किसी बड़े और बेहतर नॉविल पर बनी हुई फ़िल्म देखते हैं। मेरे साथ ऐसा हादसा मार्कस ज़ूज़क के नॉविल ‘दि बुक थीफ’ को पढ़ कर उस पर बनी हुई फ़िल्म देखकर पेश आया, जितना किताब ने देशभक्ति के नाम पर फैलाए जाने वाले ख़ौफ़ और लोगों में पैदा होने वाली बे-हिसी को उजागर किया है, जिसके एक-एक मंज़र में आपको गौरव और फ़ख्र की पैदा की गई भयानक तसावीर दिखाई पड़ती हैं। लीज़ल मेमिंगर, रूडी, हांस होबरमेन, उसकी पत्नी, यहूदी किरदार मैक्स वेंडनबर्ग और मेयर की पत्नी जैसे किरदार, उनके जज़्बाती और ज़हनी मामलात बारीकी से देखने और जानने का मौक़ा मिलता है, किसी समाज में नफ़रत के रुझान के पैदा होने, पनपने के नुक़्सान का अंदाज़ा होता है, वो सब के सब फ़िल्म देखते समय एक अजीब से बेहूदा मज़ाक़ में बदल जाते हैं, वजह यही है कि ऐसे लंबे-चौड़े नॉविल को दो या डेढ़ घंटों के छोटे से लोटे में क़ैद कर पाना तक़रीबन ना-मुम्किन है।

ग़ज़ल पर दो और गंभीर आरोप लगाए जा सकते हैं। पहला तो ये है कि ग़ज़ल ने तरकीबों में उलझी हुई एक नक़ली तरह की ज़बान को इतना प्रोमोट किया है कि इस तेज़-रफ़्तार ज़माने में भी पारंपरिक क़िस्म की ग़ज़लें लिखने वालों की गर्दन और पीठ हमेशा झुकी हुई-सी दिखाई पड़ती है। दूसरा एतराज़ ये है कि ग़ज़ल ने उर्दू नस्र (गद्य) लिखने वालों को भी अच्छा-ख़ासा मौलवी बना रक्खा है और वो भी इतना भोंडा कि उनकी ज़बान ग़ज़ल के एक ऐसे चापलूस आशिक़ या किसी दरगाह के घिघियाते हुए मुजाविर के रूप में ढल जाती है,जिसको कोई बात लिखते वक़्त यही अंदाज़ा नहीं होता कि अच्छी और ‘शुस्ता शाइस्ता’ उर्दू लिखने के चक्कर में वो सामने वाले का अच्छा-ख़ासा मज़ाक़ बना चुका है, जिस पर अपनी क़लम को घिसने की मेहनत कर रहा है। ऐसा एक जुमला मुझे हाल ही में जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के ही उर्दू डिपार्टमेंट के एक शरारती छात्र ने दिखाया। एक साहब ने उर्दू के अच्छे-ख़ासे तंदरुस्त प्रोफ़ेसर के बारे में ग़ज़ल वाली उर्दू में चने चबाते हुए जो कुछ लिखा, उसकी शुरुआत यहाँ से होती है—‘‘प्रोफ़ेसर फ़लाँ फ़लाँ साहिब उर्दू दुनिया की एक नई अलिफ़ लैलवी शख़्सियत हैं और उन्हें वाक़ई अजूबा-ए-रोज़गार कहा जा सकता है।’’

आप देखिए, जब कोई आदमी ग़ज़ल में नए टॉपिक्स को भरने की कोशिश करेगा तो अव्वल तो उसके चेहरे को ही लक़वा मार जाता है, दूसरे हमारे ऐसे ग़ज़ल लिखने वाले शाइर शोर मचाने लगते हैं, जिनको ग़ज़ल में किसी भी तरह के एक्सपेरिमेंट से सख़्त चिढ़ है। वो समझते हैं कि ग़ज़ल को उसकी पुरानी शक्ल में महफ़ूज़ रखा जाए। मालूम हुआ कि ग़ज़ल न हुई, अच्छा-ख़ासा इस्लाम हो गया कि जितना भी ज़माना गुज़र जाए, उसके क़ानून में कोई बदलाव संभव ही नहीं है। इसके पीछे भी जो साइकोलॉजी काम करती है, उसमें नई शाइरी के स्वीकार होते ही तरकीबों वाले शाइरों को नज़र-अंदाज़ कर दिए जाने का एक भय छुपा होता है। फिर बहुत से ऐसे आलोचक और ज़बान जानने वाले हैं, जिनकी रोज़ी-रोटी मीर के शे’रों का मतलब बताते हुए गुज़र रही या गुज़र गई है। उनकी पूरी ज़िंदगी में ले-दे कर बस एक यही कमाल रह गया है कि वो मीर से लेकर दाग़ तक की ज़बान और उनके अलफ़ाज़ के अलग-अलग मतलब बयान करते फिरें। ये सारे कमाल सर-आँखों पर, मगर उनका हमारी सोच की प्रगति या उन्नति से दूर का भी वास्ता नहीं। ऐसे लोग समाज में सोच-विचार की संस्कृति को पनपने से रोकते हैं बल्कि ग़ज़ल की पुरानी और जमी-जमाई शक्लों की हिमायत ही इसलिए करते हैं ताकि उनको जिसकी वजह से क़ाबिल और दाना समझा जा रहा है, उस विषय की पवित्रता पर कोई छींट न उछाली जा सके।

ग़ज़ल का मुआमला किसी टट-पुनजिया शाइर के इस शे’र की सच्ची तशरीह (व्याख्या) से ज़्यादा और कुछ नहीं :

‘‘ज़माना है कि आगे बढ़ रहा है
तू चौदह सौ बरस पीछे पलट जा’’

हिंदुस्तान में इन दिनों शाइरी का बड़ा ज़ोर है। जिसे देखिए ग़ज़ल कहने की कोशिश में लगा हुआ है। मुझे आए दिन ऐसे लड़के-लड़कियों के संदेश भी मिलते हैं, जिनमें ये सवाल पूछे जाते हैं कि आख़िर ग़ज़ल कैसे लिखी जाए, बह्र-वह्र कैसे सीखी जाए? ज़ाहिर है कि इन सवालों के पीछे शोहरत की वो हसीन चाँदनी है, जिसे ग़ज़ल पढ़ने वालों से ज़्यादा ग़ज़ल सुनने वालों ने बढ़ावा दिया है। मुशायरे के दो सदियों पर फैले इतिहास ने वाह-वाह की ऐसी बूँदें पिलाई हैं कि अच्छे-ख़ासे समझदार लोग ख़राब किस्म के शे’र कह कर वाहवाही बटोरने की लालच मैं ख़ुद को भोंडा और बेवक़ूफ़ बनाने पर तुले हुए हैं। यहीं पिछले दो सालों में एक अजीब बात ये नज़र आई कि कोई साहब या साहिबा एक मुशायरा करवाते हैं, जिसमें ये शर्त होती है कि सभी शाइर शेरवानी पहन कर अपना कलाम सुनाएँगे। भई सवाल ग़ज़ल की परंपरा की हिफ़ाज़त का है, अब चाहे उस हिफ़ाज़त में हमारी सोच और पढ़ने लिखने की आदत का कितना ही नुक़्सान क्यों न हो रहा हो, दो-चार बार पहले भी कह चुका हूँ और अब भी कहूँगा कि इसी वजह से अब उर्दू में बिलकुल नए लिखने वाले अच्छी कहानियाँ नहीं लिख पा रहे हैं। यक़ीन न हो तो ऐसे नामों की तलाश आज से ही शुरू कर दीजिए, जवाब ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जाएगा।

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तसनीफ़ हैदर उर्दू की नई नस्ल से वाबस्ता कवि-लेखक हैं। ‘सदानीरा’ पर इससे पूर्व प्रकाशित उनके काम और परिचय के लिए यहाँ देखें :

मैंने मंटो से क्या सीखा

लेखक की तस्वीर : बेवजह 

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