बातें ::
अनिल यादव
से
अविनाश मिश्र

अनिल यादव │ तस्वीर सौजन्य : गौरव नौरियाल

‘अनिश्चितता एक ग़ज़ब की चीज़ है’

कैसे कटेगा समय या फिर कुछ भी?

चूतियों से छुटकारा। आगे अकेलापन है या फिर मृत्यु…

इन दिनों दिन कैसे गुज़ार रहे हैं?

धुएँ, ट्रैफ़िक के शोर और लोगों की आवाजाही की आवाज़ों के न होने से सब कुछ नया हो गया है। आसमान का एक साफ़ टुकड़ा भी मनोहर लगने लगा है। बहुत से दुबक गए सपने फिर से नींद में वापस आ रहे हैं। समय न कटने से बचपन में जैसी उकताहट होती थी, फिर होने लगी है। एक तरह से स्मृति पर छाया प्रदूषण साफ़ हो रहा है। जैसे मैंने भूल जाने के बाद फिर से याद किया कि पंडुक की आवाज़ मेरा ट्रंकुलाइजर (प्रशांतक) हुआ करती थी।

क्या यह फिर से छूट गए को ऐसी शर्त पर पाना नहीं है, जो हमें हारनी है?

वह कभी छूटा नहीं था बल्कि नई दुश्चिंताओं के नीचे दुबक गया था। ज़रा-सा अवकाश पाकर उसका उभर आना भी बहुत है, क्योंकि कभी वह नष्ट नहीं होने वाला। सवाल यह है कि उन स्मृतियों का हम करते क्या हैं, अगर इसका जवाब हमारे पास है तो कभी हार नहीं हो सकती। इस बीच रेलें बंद होने से रास्ते में फँसे ग़रीबों के पिटने, स्वास्थ्य सेवाओं के चौपट होने और मज़दूरों के भूख से बिलबिलाने की ख़बरें आ रही हैं जिसमें हम ज़्यादा कुछ कर नहीं कर सकते। सरकार के ख़िलाफ़ जनमत बनाने में योगदान कर सकते हैं, लेकिन सरकार सबसे बड़ी मनगढ़ंत जनमत की निर्माता है। उसकी फ़ैक्ट्रियाँ (मीडिया, आईटी सेल और सरकारी प्रचार विभाग) ओवरटाइम काम कर रही हैं।

इस आपदा-नियंत्रण के बाद क्या दुनिया कुछ बदल जाएगी? हमारे देश में उत्तरजीवन कैसा होगा?

अस्ल मसला एक वैक्सीन खोजे जाने और उसे पहले पेटेंट कराने का है। एक बार वह हो जाए तो सरकारें सारी ज़िम्मेदारी नागरिक पर डाल देंगी कि ख़रीदो और मरने से बचो। नहीं ख़रीद सकते तो ख़रीदने की योग्यता पैदा करो। पैसों का इंतिज़ाम नहीं कर सकते तो मरने के लिए स्वतंत्र हो जैसा कि डेंगू, हैजा, चेचक, एड्स, दिमाग़ी बुख़ार के मामलों में अब भी हो रहा है और लोग मर रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि कुछ बदलने वाला है, क्योंकि दुनिया का भविष्य अब अरबों फूँक कर छवियों का प्रबंधन करने वाले और नए सपनों के निर्माता पूँजीपति और राजनेता तय करते हैं। लोग उन्हीं छवियों पर लहालोट होते हैं और उनके सपनों को अपना कहने लगते हैं।

हाँ, अगर बड़ी तादाद में लोग मरते हैं, हर गली से एक अर्थी निकले तब अवसाद होगा और सामाजिक सद्भाव की थोड़े दिनों के लिए वापसी होगी। वह भी कुछ पक्के तौर पर नहीं कह सकते, क्योंकि झूठ और अफ़वाहों की राजनीति करने वाले कारीगर लोगों के दिमाग़ को किस काल्पनिक शत्रु की ओर मोड़ देंगे कुछ कहा नहीं जा सकता।

क्या इस समय को इस सारे विलाप से अलग रचनाकारों का ‘रचनात्मक समय’ भी कह सकते हैं?

अगर एक आत्मकेंद्रित रचनाकार की हृदयहीनता की खोज कर रहे हो तो निराश होओगे। ख़ाली समय और एकांत किसी रचनाकार के सक्रिय होने और कुछ रचे जाने की गारंटी नहीं है, वरना ज़्यादातर चरवाहे संगीतज्ञ और आलसी लोग दार्शनिक होते। ये बहुत में से दो सहायक कारक भर हैं। किसी भी तरह की रचना का कोई मुहूर्त या पावन बेला नहीं होती। कोई बड़ा विचार कहीं भी, कभी भी मन में स्फुरण की तरह आता है। उसे जतन से विकसित करना और दूसरों तक संप्रेषित हो सकने लायक़ रूप में अभिव्यक्त करना पड़ता है।

हाँ, रचना के लिए यह समय इसलिए ख़ास है कि दुनिया सांस्कृतिक और साभ्यतिक रुप से पीछे की ओर जा रही है। धर्म, नस्ल, जाति के मतभेदों को हवा देकर सत्ता की सवारी गाँठने वाले मक्कार नेताओं की बन आई है जो मानव समेत हर तरह के प्राकृतिक संसाधनों के लूट की खुली छूट पूँजीपतियों को दिए हुए हैं। अपने यहाँ बहुत कुछ समाज को निर्णायक रूप से बदल देने वाला हृदयविदारक घटित हो रहा है। ये अनुभव निश्चित तौर पर भविष्य में कुछ नया रचने के काम आएँगे। ख़ासतौर से कुछ ऐसा जिसकी आत्मा व्यंग्य और विडंबना होगी।

घर में रहना कितना मुश्किल है? या घर में कैसे रहें?

वाक़ई बहुत कठिन है। घर कहने से भीतर जो तस्वीर बनती है, उसे नॉस्टेल्जिया में लपेटकर बहुत सारा झूठ कहने-सुनने की हम लोगों को पुरानी आदत है। घर पाखंड के सर्वकालिक लोकप्रिय रूपकों में से एक है। अब घरों में ज़्यादातर लोग एक दूसरे से बनावटी व्यवहार करते हैं और इसे जानते हुए बेचैन रहते हैं। वहाँ भी सत्ता का विपक्ष सतत तनाव रहता है जो इन दिनों और सघन हो गया होगा। अब परिवार एक स्वार्थी संस्था का नाम है जो अपने दायरे से बाहर के लोगों के बारे में सोचने और कुछ करने से रोकता है। लोग स्वेच्छा से घर में रहते तो और बात होती, लेकिन यहाँ तो मृत्यु के डर से उन्हें बिठाया गया है। जिनके घर नहीं हैं और बाहर भटक रहे हैं, ज़रूर उनके संबंधों में मेरी ज़्यादा दिलचस्पी है। मैं कभी घर में टिका नहीं, क्या बताऊँ कि कैसे रहें!

इस समय में हिंदी की दुनिया जिसका अधिकांश अब फ़ेसबुक पर है और जिसकी गतिविधियाँ आपसे छुपी हुई नहीं हैं, उसके व्यवहार को इस संकट में कैसे देखते हैं?

कुछ भी बड़ा घटित होते ही ख़ुद को उससे सुरक्षित दूरी पर रखते हुए प्रतिक्रियाएँ, टिप्पणियाँ, कविता, दोहे, कुंडलियाँ, नैतिक प्रवचन पेलने और गाली-गलौज की बहार आ जाती है। ख़ुद को ज़्यादा सही और नैतिक साबित करने की अव्यावहारिक, चमकदार, झूठी प्रतिस्पर्धा शुरू होती है; जिसमें कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता जबकि कथनी और करनी की खाई चौड़ी होती जाती है। इस परिदृश्य में नया रंग आर.एस.एस. की सत्ता ने डाला है, जिसके भाड़े के साइबर योद्धा इस मौखिक विरोध को भी गालियों और धमकियों से एकदम शांत करा देना चाहते हैं। वही अब भी हो रहा है। एक अहंकारी, परपीड़क और अयोग्य साबित हो चुके आदमी ने अपनी झक में एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों के जीवन को अभूतपूर्व संकट में झोंक दिया है। जैसे नोटबंदी और जीएसटी के शेख़चिल्लीपने के समय औचित्य और अनौचित्य की इंद्रधनुषी चखचख थी, आगे भी चलती रहेगी।

हिंदी की दुनिया बहुत नई और नक़ली है, उसमें कोई आंतरिक शक्ति अभी बनी नहीं है। अगर भाषा या बोली से ही पहचानना हो तो कहना चाहिए पहले भोजपुरी, मगही, निमाड़ी, तमिल, असमिया, बांग्ला और पंजाबी में कुछ बदलेगा। हिंदीवाले उसका अनुवाद अपनी भाषा में करके वाहवाही की प्रतीक्षा में आँखे फैलाएँगे।

इस घड़ी में शराब को सरकार ने मुख्य ज़रूरत नहीं गिना है, क्या वजह हो सकती है?

शराब आवश्यक वस्तु है, लेकिन लुच्चे और कुंठित लोगों का आत्मविश्वास और ऐंठन दोनों बहुत बढ़ा देती है जिससे वे उत्पात करने लगते हैं। घरों में शराब तनाव का एक बड़ा अखिलभारतीय कारण है। अगर शराब खुलेआम मिलती तो लॉकडाउन को तोड़ने का पुरुषार्थ करने और दोस्ती-दुश्मनी के मंचन के मौक़े बनते जिनके लिए एक मीटर से कम दूरी का होना ज़रूरी है। भाँग और गाँजा से निभाना परंपरा से जानते हैं, लेकिन अभी हम शराब को अपना नहीं पाए हैं। औपनिवेशिक हैंगओवर ऐसा है कि हम भारत में बनी शराब को भी अँग्रेज़ी शराब कहते हैं। आत्मनिर्भर देश बनने के बाद भी किसी ने इसे बदलने के लिए पहल नहीं की है। हमारे यहाँ अँग्रेज़ी पीने वालों को अभी पीना नहीं आया है। जो सचमुच पीना जानते हैं (जैसे आदिवासी) अपनी शराब ख़ुद बनाते हैं।

क्या अधूरा कुछ पूरा हुआ?

मेरी त्रासदी और लीला देखने की, या कहें कि असाधारण परिस्थितियों में मानव का व्यवहार देखने की भूख कभी ख़त्म नहीं होती। इस नज़रिए से कुछ अधूरापन भर रहा है, लेकिन बहुत ख़ाली है।

क्या कुछ नया शुरू हुआ?

अभी नहीं।

इसमें लिखना कैसे हो?

चाहे जैसे लिखो, वरना सब बकबक में बह जाएगा। फिर कभी लिखेंगे की सोचने में ताज़गी, आयाम और नए विचार की उत्तेजना जो खेल करती है—text के साथ—वह सब चला जाता है। भीतर हताशा और पुराने क़ीमती विचारों का मकड़जाल इतना सघन हो जाता है कि कुछ भी लिखना, यहाँ तक कि दस्तख़त तक करने में भी ग्लानि होने लगती है कि ये साला किस अधिकार से साइन मार रहा है, जब कुछ लिखता ही नहीं।

अगर आप इस समय किसी यात्रा में फँसे होते, तब कैसे निभाते? दिल्ली-यूपी सीमा(ओं) पर जो मज़दूर और विस्थापित आबादी का हिला देने वाला मंज़र नज़र आया, उसे ज़ेहन में रखते हुए जवाब दें।

अच्छा होता। जो लोग सड़कों पर पुलिस के डंडे खाते, ख़ाली पेट सैकड़ों किलोमीटर जाने का हौसला लिए भटक रहे हैं, उनकी ज़िंदगियों में गहरे जाने का मौक़ा मिलता। जीवन में अनिश्चितता एक ग़ज़ब की चीज़ है, वह अक्सर वहाँ पहुँचाती है, जहाँ आप प्रयास और योजना के भरोसे नहीं जा सकते। आपको अपने भीतर की उस शक्ति का पता चलता है जो सुरक्षित माहौल में ऊबकर सोई रहती है।

अनिल यादव हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार, पत्रकार और यायावर हैं। इस वर्ष वह अपनी कथा-रचना ‘गौसेवक’ के पुस्तकाकार प्रकाशन को लेकर चर्चा और विमर्श के केंद्र में हैं। उनसे यह बातचीत ई-मेल और फ़ेसबुक मैसेंजर के माध्यम से गए कुछ दिनों के दरमियान संभव हुई है। अनिल यादव से और परिचय के लिए यहाँ देखें : निराशा के कर्तव्य

5 Comments

  1. alpesh अप्रैल 3, 2020 at 11:36 पूर्वाह्न

    sach me. Bahut chhota interview tha.

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  2. Ravi Ranjan Singh अप्रैल 3, 2020 at 4:15 अपराह्न

    बहुत कम ‘ बातें ‘ ऐसी पढ़ी हैं जिनमें प्रश्नों का फलक इतना खुरदुरा हो वहीं जवाब का फलक इतना तैलीय… शुक्रिया

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  3. शशि कुमार अप्रैल 5, 2020 at 12:27 अपराह्न

    ‘अनिश्चितता एक ग़ज़ब की चीज़ है’ पर यही आपको काबिल बनाती
    है की आप ख़ुद को उस पंक्ति में खड़ा कर पायें जहाँ से आप ख़ुद के लिए बेहतर चुनाव कर सकते है। चुनाव सेवा करने वाली वस्तुओ की उपलब्धता सुनिश्चित करने की हो या संसाधनों की यही मानवता का संघर्ष है जो खाली समय को ख़ुद को बेहतर करने में संघर्ष करता है वो संगीतज्ञ बन जाता है या उपरी पायदान की ओर अग्रसर होता है और जो इसे बस इस खाली समय को पार कर लेने की जुगत करता है चरवाहा का चरवाहा हीं रह जाता है। https://www.sadaneera.com/a-conversation-with-hindi-writer-anil-yadav-by-avinash-mishra/ via @sadaneera

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