कविताएँ ::
अभिशान्त

अभिशान्त

रात

रात एक लिफ़ाफ़ा है
सुबह की चिट्ठी छुपाए हुए
और समय डाकिया
जो छोड़ता है इसे
दुनिया के हर दरवाज़े पर।

झरते फूल

एक

नृत्य करती देह से झरता है
नृत्य का पवित्र पसीना

हम नृत्यरत धरती की देह
फूल बनकर झर रहा
धरती पर हमारा पसीना

हम ऊँचे फूलदार पेड़
कचनार, कृष्णचूड़ा के।

दो

मुम्बई में इन दिनों मनुष्य से
अधिक दिख रहे हैं फूल

हवा में आदमी से ज़्यादा
तैर रही गंध फूल की

सड़क पर यातायात से अधिक सघन है
पदचाप फूलों की

नहीं लौटे हुए लोग
गर्दी (भीड़) कहीं नहीं

पेड़ से कान सटाने पर
सुनाई देती है
फूलों की बातचीत—
धीमी-धीमी…

तीन

टूटकर गिरना लगती है क्रिया नई

टूटने और गिरने की त्वरा के विपरीत
एक फूल झरता है इत्मीनान से

हवा में होते दाएँ-बाएँ
उतरते हुए एक-एक सोपान यात्रा का
इतने धैर्य से गिरता है एक फूल
इतनी आत्मीयता से
कि धरती बच जाती है
एक तयशुदा चोट से।

अभिशान्त की कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

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