कविताएँ ::
केशव तिवारी

केशव तिवारी

पूरी रात

एक

होटल के कमरे की खिड़की से
सुबह-सुबह
झाँकते संगिनी बोली :
पूरी रात गरजता रहा समुद्र
कुछ बोलना चाहता था

मैंने सोचा :
शंख भी,
सीपियाँ, केकड़े या अन्य समुद्री जीव भी
कुछ बोलना चाह रहे होंगे

क्या समुद्र इन सबकी सामूहिक आवाज़ है
या फिर
सामूहिक अभिव्यक्ति का अपहरण

दो

एक आवाज़ और भी है
देश और देश से बाहर ख़ूब सुन रहा हूँ इन दिनों
उसमें क्या मेरी भी आवाज़ है
जैसे समुद्र की दहाड़ में समुद्र की आवाज़ नहीं सुनी जा सकती
यही शायद मेरी भी आवाज़ का हाल है

घोंघे के प्रसव की कराह
और वह विराट मौन जिसे सुनता आ रहा है आकाश
और कुछ आवाज़ें जो इसके तल ही में खो गई होंगी
कुछ दिनों बाद खामोश हो गई होंगी

पुकार

यह पुकार की बेकली थी
कि पत्तों के पुल से ही
पार कर आया मैं

अब सोच रहा हूँ
क्या छूट गया उस पार
कि बूड़ा नहीं मैं

आवाज़ दो

आवाज़ दो—
कोई न कोई तो बोलेगा ही
कोई न बोला तो
टूट रही शहतीरें बोलेंगी
चूल्हे में बची राख बोलेगी
दीवार पर उधध हो रहे
चित्र बोलेंगे…
कि कभी यहाँ गूँजी थी ढोलक
ज़रूरी सामान रखते वक़्त
छोड़ दी गई
बच्चे की मिट्टी की गाड़ी बोलेगी
घर छोड़ते हुए
दरवाज़ों पर
वह मजबूरी भरा स्पर्श बोलेगा
आवाज़ दो—

विदा

जिसने भी विदा ली
फिर आने को कह गया
दुख भी
इसी वादे के साथ विदा हुआ

वह तमाम सुंदरताओं और वनस्पतियों के विलुप्त होने का वक़्त था
और हमारी वादामाफ़ गवाही का

हम अपने-अपने दरवाज़ों के घुन थे
हम ललकार में छिपी यातना के स्वर थे
हम खेत में खड़े धोखार थे
हम गोठिल हो चुकी हँसिया की धार थे

हम जो नहीं थे
उसी का भ्रम थे

***

केशव तिवारी के कवि का जन्म उन दिनों का है, जब आवारा पूँजी ने अपना अ लिखा था और क़स्बों ने नगर और नगरों ने महानगर होना शुरू कर दिया था। गाँव इस चाल की भयावह चपेट में थे। उनका यथार्थ लोक का जाल रचने वाले कवियों की समझ से बाहर चला गया था। इस समकालीनता में अपने सरोकार और संघर्ष की वजह से केशव सरीखे कवियों की लड़ाई दुतरफ़ा हो गई। उनके लिए कविता उतनी आसान नहीं थी जितनी केदारनाथ सिंह के रास्ते पर चलने से नवें दशक के तमाम कवि-कवयित्रियों की हो गई। केशव ने यह रास्ता कभी नहीं लिया, क्योंकि यह रास्ता लेते ही आप सबसे पहले ‘घर का रास्ता’ भूल जाते हैं। केशव के अब तक तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी यहाँ प्रस्तुत कविताएँ जिन आवाज़ों और पुकारों से भरी हुई हैं, उन्हें पढ़ने के बाद कवि के रास्ते का विश्लेषण इनके स्वर को सुनकर भी अनसुना करने जैसा होगा… इसलिए यहाँ इससे यह सोचकर बचा जा रहा है कि प्रभाव व्यवहार में बदल जाए बेहतर कविताएँ इस सदिच्छा से संचालित होती हैं। केशव तिवारी बाँदा, उत्तर प्रदेश में रहते हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

5 Comments

  1. रामकिशोर उपाध्याय अक्टूबर 18, 2018 at 9:42 पूर्वाह्न

    बहुत ही सुंदर कवितायें

    Reply
  2. सोनी पाण्डेय अक्टूबर 30, 2018 at 5:27 पूर्वाह्न

    केशव की कविताएं हमारे अन्दर की उधेड़-बुन का ताना बना हैं।कवि समुद्र के ध्वंस और निर्माण पर सोचता है,घोघे के प्रसव की चित्कार सुनता है।पुरातन से गहन प्रेम की सुन्दर झलक है इन कविताओं में,वह ढ़ोलक की थाप से लेकर निर्माण के अदृश्य स्पर्श तक को जानता ,सुनता है।
    बहुत सुन्दर कविताएं..

    Reply
    1. केशव तिवारी फ़रवरी 15, 2020 at 2:49 पूर्वाह्न

      शुक्रिया

      Reply
  3. Udgar अप्रैल 14, 2019 at 7:02 पूर्वाह्न

    अत्यंत शुभकामनाओं सहित यह कहना है की केशव तिवारी जी ने जिन संवेदनाओं को या संसृति के दिन संवेदी चित्रों को वैद्युत शब्द दिए हैं व समकालीन लेखकों के लिए मानदंड सहित हैं!

    इनको चंद समय पढ़ना ही मन को गंभीर भावना के प्रभाव से शिथिल कर दिया!

    योग्य साहित्यकारों को पढ़ने एवं खोज करने के अभियान में मैं “उद्गार” साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठन का एक प्रतिनिधि वाराणसी से हूँ और केशव तिवारी जी को इस उत्कृष्ट लेखन की कोटिशः बधाई देता हूं।

    Reply
    1. Keshav जून 3, 2019 at 12:15 अपराह्न

      Aabhar aap ka aaj hi dekh saka.

      Reply

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