कविताएँ ::
नरेन सहाय

नरेन सहाय

मैंने तुम्हें सुना और एक पेड़ हो गया

उस दिन
प्रेम रोपा था
जामुन के नीचे

उस दिन
साथ चलना था
आगे की यात्रा पर

उस दिन
तुम्हें ख़ाली होना था
अंदर के शब्दों से

उस दिन
मैंने तुम्हें सुना
और एक पेड़ हो गया

(दूर सुनसान अकेले में खड़ा एक पेड़)

उसकी नाभि से फूट रहा था एक पेड़

मैंने तीन चित्रों का एक वृत्त बनाया—

पहला
उसकी गीली पीठ का
दूसरा
उसकी आँखों के भीतर तैरते नद का
तीसरा
उसकी नाभि से फूटते पेड़ का

(जैसे बरगद फूट जाता है अपनी जड़ के संपर्क में आने से)

आत्मा पर
प्रेम फूटा था

दो अर्ध-वृत्तों
के आकार का पत्ता

देह में खड़ा पेड़

जाने दिया
चले जाने के लिए
हर बार रोक लेता था
रुक जाने के लिए?

जाने के बाद
झरता रहा
कई मौसम
कमरे में

(सूखे पेड़ जैसा)

देह में खड़ा पेड़
आत्मा से उसका रंग पूछ रहा था…

नरेन सहाय का बचपन टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश) के खेतों, बग़ीचों, जंगलों में गुज़रा है। वह राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की योजनाओं में फ़ोटोग्राफी, वीडियो आर्ट, सिनेमा और प्रोडक्शन्स से जुड़े रहे हैं। वह फ़िलहाल शिमला में रहते हुए अपने उपन्यास को अंतिम रूप देने में लगे हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

2 Comments

  1. प्रमोद अप्रैल 28, 2020 at 10:30 पूर्वाह्न

    सुन्‍दर कव‍िताएंं हैं ।

    Reply
  2. Naresh vankudoth अप्रैल 28, 2020 at 7:42 अपराह्न

    Simple, straight yet beautiful.
    “Usidin maine thumhara poem suna
    Aur Maine sturd hogaya”.

    Keep rocking man, nature is full of beauty what needed is a heart to feel it, and you have one.

    All the best.

    Reply

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