कविताएँ ::
प्रदीप्त प्रीत

प्रदीप्त प्रीत

शीत-प्रेम

दोनों आमने-सामने हैं
शांत और संकुचित
जैसे प्रलय के बाद
बच गए लोग होते हैं सामने

पुरानी पहचान में
जानना बाक़ी रह गया था
वीरानियों और ख़ामोशियों के बीच
शुरू हो गया है
शीत-प्रेम

अब सामने आते ही
अधिकार के साथ कह देना चाहते हैं
वह सब कुछ
जो दबा रह गया था
हृदय के किसी कोने में

अपनी कमज़ोरियों को ढाल बनाकर
दोनों खोजने लगते हैं
एक-दूसरे की महत्ता
पहुँचना चाहते हैं एक स्पर्श-बिंदु पर

दूरियों में बन जाते हैं जासूस
जान लेना चाहते हैं हर हवा को
जो उनके आस-पास से गुज़री हो

परस्पर खोजने लगे हैं
एक-दूसरे में
अपना वजूद
सब स्वीकार होते हुए भी
एक झिझक के साथ चलता रहता है
शीत-प्रेम।

उदासी

एक दिन कहा सबसे अच्छे दोस्त ने :
‘उदास मत होना’
जवाब चाहिए आख़िर क्यों?
उदास होना भी है एक क्रिया
वैसे ही जैसे यह कहकर जाना :
‘उदास मत होना’

ध्यान देना सितंबर में उदास मत होना
बुद्धजीवियों ने किया है शोध
सितंबर का गुण है उदास होना
ठीक वैसे ही जैसे
अगस्त में बच्चों का मरना
सीखो उदास होना क्योंकि
दुनिया के तमाम विज्ञापन जल्द बदलेंगे
उदासी के विज्ञापनों में
इसका कारण है
‘सेप्टेंबर ब्लैंक’ का पूरा एक महीना
‘लव वीक’ का बस हफ़्ते भर होना

गिनती के मसख़रों ने
किया सबके साथ मज़ाक़
भरी खाप पंचायत में किया गया उदासी को बदनाम
वरना उदासी के अपने मज़े हैं
अनुभव में जुड़ जाते हैं
उजाड़ दिन और निचाट रातें

उदास होना पर निराश नहीं
चुपचाप देखना :
मकड़ी का गिरना और चढ़ना
बच्चों का पहली बार पतंगें उड़ाना
याद करना जब पहली बार
तुमने ख़ुद से पकाई थीं रोटियाँ।

दुनियाएँ

कितनी सारी दुनियाएँ हैं
इस दुनिया में
ख़ूबसूरत
रोमांचकारी
भयावह
जीवन बीत जाता है
ग़लत जगहों पर रहते हुए

मेरे सामने दो दुनियाएँ हैं
एक
जहाँ मैं रहता हूँ
मेरा कमरा
धूल खाती किताबें
उदास कहानियों के शब्द
तुम्हारी यादें

दूसरा
जहाँ मैं जाना चाहता हूँ
तुम
तुम्हारी डायरी
तुम्हारे आँसुओं पर तैरती
उम्मीदें
नावें
जहाँ मेरा कोई नामोनिशाँ नहीं है

एक तीसरी दुनिया भी है
जिसका आहार है जीवन
आत्माओं की दुनिया
वहाँ जाने के लिए मरना होता है

मैं मर जाता हूँ
ताकि मैं तुम्हारे लिए जीवित रह सकूँ।

पत्थर, गुलाब, नीम और नींद

वह बहुत दूर है
इसलिए मैं हर जगह होना चाहता हूँ

वह बहुत कठोर है—पत्थरों जैसी
इसलिए मैं कोमल बनना चाहता हूँ
ताकि वह मुझे कुचल सके

वे जो आपके दिल का सुकून हैं
उन्हें सुकून में देखना कितना सुखद है

मैंने उसके लिए सुकून चाहा
इसलिए मैंने उसे सोते हुए देखना चाहा

बेमतलब की हँसी के ओढ़ने से
वह कुछ तो छिपाना चाहती है
पास रहने से सब पता चल जाता है
सो तितली की तरह दूर निकल जाती है

पहले वह मुझे ‘गुलाब’ बताती
कोमल और सुकुमार
और ख़ुद को ‘नीम’ बताने का प्रयत्न करती
मैं मुस्कुराने लगता
अब वह दूसरों से मुझे ‘नीम’ बताती है—
कड़वा और बेकार
ख़ुद क्या बन रही है, पता नहीं
मैं अब भी मुस्कुरा रहा हूँ

इन दिनों नींद
एक छोटी उम्र की बच्ची हो गई है
दिन में सो जाती है
रात को जगाती है!

प्रेम, त्याग, मैं और तुम

प्रेम
दिन-ब-दिन बढ़ रहा है
मेरे लिए,
तुम्हारा प्रेम
जैसे दिन और दिन—
रंग-बिरंगे वसंत के

बढ़ रहा है मेरे सपनों का आकार
वैसे ही बढ़ती जा रही है
हँसते हुए चेहरों को देखने की अभिलाषा
दूर कहीं दूर
सुनाई देती हैं सिसकियाँ
ऐसे ही वे भी रो रहे थे,
एक दिन
जब छीना जा रहा था
उनके जीने का एकमात्र मक़सद।

त्याग
चलो त्याग करते हैं
अपने सपनों का त्याग
जैसे मुस्कुराते हुए छोड़ देते हैं
गुब्बारे बेचते मासूम हाथों में छुट्टे।

तुम और मैं
हम
बनाएँगे नई दुनिया
जहाँ सपने साकार होंगे
आज़ाद होगा बचपन,
तुम सिखाना
मासूमों को चमकने की कला इस क़दर
कि आकाश भी आए माँगने
इन चमकते सितारों को,
अपने कम होते जुगुनुओं के बदले,
मैं सितारों के बीच में
अपने चाँद को देखते हुए बनाऊँगा
इनके लिए रोटियाँ।

लंबी छुट्टियाँ

एक

मैं इंतज़ार में हूँ
उन आधा दर्जन छुट्टियों के
जो आती हैं साल में दो बार

हाँ, मैं मानता हूँ
एक ही साल में दो को चार में बदलता हूँ
उपयोग करता हूँ इंटर के गणित का
ख़ैर, मैं इंतजार में हूँ

जब मैं आऊँगा तुम्हारे पास
मैं और तुम घूमेंगे अपने संसार में
जहाँ रहती हैं तितलियाँ
धान की बालियाँ
अरबी के पत्ते पर गिरी ओस की बूँदें
और हवा में बेलौस उड़ते कुछ सफ़ेद फूल

घास और कीचड़ से सनी पगडंडियों पे
दो जोड़ी पैर छोड़ेंगे निशाँ
उधर नहर की मोरी पे बैठेते ही
नज़रें झुकाए
तुम उन पायलों को चमकाने लगोगी
जो धूमिल और मंद हैं
कीचड़ के संपर्क में आने से

फिर तुम्हारी नेमत बरसेगी
तुम्हारे पावों और तुम्हारे पैरहन पर
मैं निठल्ला अपलक देखता रहूँगा
तुम्हें और तुम्हारी तल्लीनता को।

दो

मैं इंतज़ार में हूँ
उन दिनों के
जिनकी रातें मशहूर हैं
पूस की रात के नाम से

ये दिन लाते हैं
अकेले अंक का तापमान
अपनी रातों जैसी लंबी छुट्टियाँ
सेठ के कोड़ों से छिल चुकी पीठ के लिए
शानदार पुवाल के बिस्तर

दो-चार सवारी गाड़ियों को छोड़ते-पकड़ते
हरे-पीले हो चुके खेतों को निहारते
मैं फिर आऊँगा अपने गाँव
उन्हीं पगडंडियों पे तुमसे मिलने
जहाँ हर बार बदलते हैं हम टिफ़िन
और घर वाले खोजते रह जाते हैं
मेरे पैदल आने का कारण

इन दिनों हमारी मुलाक़ातें
कम और छोटी हो जाएँगी
सूरज की बढ़ती-घटती रोशनी के साथ ही
इक्का-दुक्का लोग चले आएँगे वहाँ—
जहाँ तुम मुझे बैठा देती हो
शिकायतों के ढेर पर

ऊन में लिपटी सलाइयों की व्यस्तता में
तुम सुनना चाहोगी
कोई वाजिब जवाब
मैं स्तब्ध अपने पैर के अंगूठे से
पृथ्वी को कुरेदता रहूँगा।

प्रदीप्त प्रीत की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में परास्नातक के छात्र हैं। उनके शिक्षक और सुपरिचित रंग-आलोचक अमितेश कुमार के मुताबिक़ : ”प्रदीप्त अक्सर हमारे साथ रहता है, लेकिन बताता नहीं है कि कविताएँ लिखता है।” प्रदीप्त से [email protected] पर बात की जा सकती है।

6 Comments

  1. अंजली फ़रवरी 12, 2021 at 7:37 पूर्वाह्न

    सारी कवितायें वास्तव में वो अर्थ रखती हैं जिसे कह सकते हैं जीवन का सच और उन अनुभवों को इस बारीकी से शब्दों में पिरोना उस बात की सार्थकता की गवाही है जिसे साहित्यिक शब्दों में कवि कहा जाता है

    सारी कवितायें बहुत ही अच्छी लगीं

    और एक लाइन ‘उदासी’ कविता की
    “सीखो उदास होना क्योंकि”
    बहुत ही अच्छी लगी ।

    Reply
    1. प्रदीप्त प्रीत फ़रवरी 17, 2021 at 5:38 पूर्वाह्न

      प्रिय, आपकी टिप्पड़ी मिला।
      अपने लिखे हुए का महत्व पता चला। आपके शब्द हमारे लिए ऊर्जा प्रदान करेंगे। बहुत बहुत शुक्रिया।

      Reply
  2. अंजली फ़रवरी 12, 2021 at 7:40 पूर्वाह्न

    जीवन का सच और उन अनुभवों को इस बारीकी से शब्दों में पिरोना उस बात की सार्थकता की गवाही है जिसे साहित्यिक शब्दों में कवि कहा जाता है

    सारी कवितायें बहुत ही अच्छी लगीं

    और एक लाइन ‘उदासी’ कविता की
    “सीखो उदास होना क्योंकि”
    बहुत ही अच्छी लगी ।

    Reply
  3. manoj फ़रवरी 14, 2021 at 9:44 पूर्वाह्न

    खूबसूरत कविताएं

    Reply
    1. Rajesh Kumar yadav फ़रवरी 15, 2021 at 2:29 अपराह्न

      बहुत अच्छा भाई 👍

      Reply
  4. राहुल यादव फ़रवरी 18, 2021 at 2:32 अपराह्न

    जीवन के उस वास्तविकता को बहुत ही कम शब्दों के गुच्छे में पिरो देना लेखन की महानता होती हैं और यह सब आपने अपनी कविता के माध्यम से सिद्ध किया.
    सभी कविताएं (दुनियाएं) बहुत ही अच्छी लगी ऐसे ही लिखते रहे ।

    Reply

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