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आर. चेतनक्रांति

आर. चेतनक्रांति │ क्लिक : सुमेर

शांति वार्ता

और अंत में हमने इंसानियत का हवाला दिया
हमें यक़ीन था कि अब वह निरुत्तर हो जाएगा
लेकिन वह ठठाकर हँसा
इंसानियत उसके लिए सबसे कमज़ोर तर्क था
सबसे हास्यास्पद।

हमने बहुत अरमान से उसे तानाशाह कहा
कि उसकी आँख नीची होगी
पर उसकी छाती और फूल गई
यह उसके लिए उपाधि थी।

हमने चिल्लाकर कहा हत्यारे हो तुम
वह गर्व से मुस्कुराया
जैसे कि हमने उसकी तारीफ़ की हो

हमने कहा
कि तुम वक़्त में पीछे की तरफ़ जा रहे हो
तुम्हारा मुँह उल्टी दिशा में है
तुम कहीं नहीं पहुँचोगे
उसने कहा मेरे साथ पूरा देश है
मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता।

व्यतीत वीर

जिन्हें इस वर्तमान में जगह नहीं मिली
वे अतीत की तरफ़ चले

चले वे कहते हुए
अरे कितना अन्याय हुआ
कितना अत्याचार
पाँच सौ साल पहले

श्मशानों-क़ब्रिस्तानों से होते हुए
पहुँचे वे स्मारकों तक
जो वर्तमान के पर्यटन स्थल थे
वर्तमान के बच्चे और प्रेमी जहाँ
भविष्य-भविष्य खेलते थे

वहाँ भी उन्होंने श्मशान बनाना चाहा
चाहा कि ख़ून-ख़ून खेलें यहाँ भी
जैसे खेला गया था पाँच सौ साल पहले
जैसा कि उन्होंने बताया कि उन्हें बताया गया।

वे पाँच सौ साल पुराने मस्तिष्क के साथ
प्राकृतिक किसी गड़बड़ी के चलते
वर्तमान की कोख में आ पड़े थे
दुर्घटनावश
और समझ नहीं पा रहे थे कि
अपने इस एक्सपायर्ड वुजूद का क्या करें

अपने भीतर खुदी पाँच सौ साल की खाई कूदकर
वे भविष्य में जा नहीं सकते थे
सो पाँच सौ साल पहले की तरफ़ चले
अपना वर्तमान ढूँढ़ने

पाँच सौ साल पुराने हथियार ढूँढ़े उन्होंने
पाँच सौ साल पुरानी वीरताएँ
पाँच सौ साल पुरानी नफ़रतें धो-पोंछ कर गले में डालीं
पाँच सौ साल पुरानी सार्थकताएँ
छातियों पर सजाईं
और त्योहारी झाँकियों की तरह निकले
वर्तमान के बाज़ारों से
जहाँ वर्तमान की कामनाएँ
भविष्य के नियॉन ख़्वाब बुनती थीं

वे हैरान हुए देखकर
कि मानव-मुंडों की मीनारें
नहीं हैं कहीं
कहीं भी नहीं हैं
अलग-अलग कटे हाथों-पैरों-घुटनों-टख़नों-जाँघों-बाँहों
और स्तनों के शोरूम

और वे मचल उठे कि करें
जैसा सुना था उन्होंने
कि होता था पाँच सौ साल पहले
उनके अपने समय में।

वर्तमान में वे
ख़ुद को फ़ालतू पाते थे
कि जैसे पूँछ निकल आई हो वापस
मनुष्य देह में
और समझ न पा रही हो
कि वर्तमान की वेशभूषा में
जहाँ हर अंग की जगह थी
वह कहाँ रहे

सो वे दुबारा नापने
दुबारा काटने
दुबारा सिलने के लिए बैठ गए
इतिहास का कोट
पत्थर की कैंची और पत्थर की सुई से।

उन्हें वर्तमान पर क्रोध आता
क्रोध से थरथराते-काँपते-बिलबिलाते
वे अपने प्राचीन वर्तमान में खड़े
अपने कवच-शिरस्त्राण-धनुष-बाण-तरकश-तलवारें
उठाते-रखते
युद्ध में डूबे रहते
कंकालों से लड़ते उन्हें पछाड़ते-जीतते।

कहते कि यहाँ के बाद जो हुआ होगा
हमें नहीं पता हमें नहीं जानना हमें मत बताओ
हमें नहीं चाहिए
हम यहीं से दुबारा चलेंगे
हमारा वर्तमान दूसरा होगा
जिसमें बस हम रहेंगे
और कोई नहीं।

विचित्र थे ये लोग
बहुत फबते होंगे
पाषाण और लौह वाले युगों में

लेकिन डिजिटल में काहे भसड़ पोत रहे बे!

वे हार जाएँगे

वे झूठ बोलेंगे
वे चीख़कर झूठ बोलेंगे
वे लगातार चीख़कर लगातार झूठ बोलेंगे

तुम सच कहने के लिए हकलाओगे
बेबस महसूस करोगे
और हैरान होकर चुप हो जाओगे

तुम समझ नहीं पाओगे
कि इस तरह लगातार
चीख़-चीख़कर कोई झूठ कैसे बोल सकता है

पर तुम हारोगे नहीं।

वे हार जाएँगे
क्योंकि उनका सब झूठ है
उनका चीख़ना भी झूठ है
अपने झूठ पर उनका भरोसा भी झूठ है

अपने झूठ को सच साबित करने के लिए
वे बंदूक़ चलाएँगे
लेकिन फिर भी हारेंगे

वे झूठे नारे लगाएँगे
और सच्चे सैनिकों का खोखला अभिनय करते हुए
सच के दुर्बल वीरों पर लोहे की लाठियाँ लेकर टूट पड़ेंगे
लेकिन फिर भी हारेंगे

वे अपनी आनुवंशिक कुंठाओं का मुकुट
सिर में खोंसकर
हाथ में शिश्न का चाक़ू थामकर
सच की वीरांगनाओं के पवित्र कोनों को
नेस्तनाबूद कर देंगे
लेकिन फिर भी हारेंगे

वे नक़ाब पहनकर आएँगे
और खुले आसमान तले
निहत्थे खड़े सच की तरफ़
अपनी गली हुई आत्मा के बदबूदार चिथड़े फेंकेंगे
पेट्रोल में भिगोकर
माचिस की तीली दिखाकर
लेकिन फिर भी हारेंगे

वे सब तरफ़ फैला देंगे
कि वे जीत गए
लेकिन फिर भी हारेंगे

जीतेंगे हम ही
क्योंकि हम सच हैं
हमारी बेबसी भी सच है
हमारी हैरानी भी सच है
हमारा छटपटाकर चुप हो जाना भी सच है
हमारी चोट से फूटा आर्तनाद भी सच है
हमारे घाव से निकला लहू भी सच है
हमारी आँख से टपका आँसू भी सच है
हमारे माथे से निकली लपट भी सच है
हमारा हार जाना भी सच है
और हारकर जीतने के लिए
वापस खड़े होना भी सच है।

भक्ति की शक्ति

ज्ञान की आग मुझे जला नहीं सकती
प्यार की बारिश मुझे गला नहीं सकती
तर्क की तलवार मुझे काट नहीं सकती

सच मुझे छू नहीं सकता
बुद्धि मुझे पकड़ नहीं सकती

इंसानियत मुझे झुका नहीं सकती
किताब मुझे कुछ सिखा नहीं सकती
विज्ञान मुझे बदल नहीं सकता
नया कुछ भी हो
सामने मेरे चल नहीं सकता

मैं झूठ की मीनार हूँ
उन्माद का तूफ़ान हूँ
अफ़वाहों पर पलता हूँ
नशे में चलता हूँ

मैं न पहले कभी था
न आगे कभी हूँगा
तुम जो चाहे कर लो
मैं जो हूँ वही रहूँगा

संशयहीन हूँ
सशक्त हूँ
ज्यादा मत सोचिए
मैं भक्त हूँ।

आर. चेतनक्रांति (जन्म : 1968) हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि हैं। उनके दो कविता-संग्रह ‘शोकनाच’ और ‘वीरता पर विचलित’ शीर्षक से प्रकाशित होकर कविता-विमर्श के केंद्र में रहे हैं। वह दिल्ली में रहते हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

2 Comments

  1. shahnaz imrani मार्च 17, 2020 at 9:26 पूर्वाह्न

    बेहतरीन कविताएं चेतन क्रांति जी की, “वे हार जाएँगे” कविता उम्मीद को जगाती है। 

    Reply
  2. स्वाति मेलकानी मार्च 18, 2020 at 8:52 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छू कविताएँ।
    वर्तमान में सार्थक और भविष्य तक गूंजती हुई।

    Reply

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