कविताएँ ::
संदीप रावत

संदीप रावत

एक

इंसान का चरित्र
एक पत्ते का चुपचाप अपने समय से सूखकर छूटना है
एक ऊँचे झरने का शून्यशिला पे गिरना—
सारे ऊँचे-नीचे चरित्रों को अपने नाद से बहरा करता
रंग और फुहारों से अंधा करता हुआ

धीमे धीमे और कभी अचानक
सारे चरित्र मुझे छोड़कर चले गए
चरित्रहीनता एक जीवंत शून्यता होती है जिसे
जाना नहीं जा सकता

सारा अस्तित्व चरित्रहीनता के कारण ही अस्तित्व में आया है

लोगों का दुःख बदलते चरित्र का दुख है चरित्रहीनता का नहीं

चरित्र से ख़ाली हृदय में सारे चरित्र निर्द्वंद्व बैठ जाते हैं

चरित्रहीनता हमेशा एक मृत्यु में से होकर गुजरती है

चरित्रहीनता एक अछूतापन है

चरित्रहीन इंसान सिर्फ़ दुनिया की ही नहीं सुनता
पहाड़ों समंदरों हवाओं और पंछियों की भी सुनता है
मेरे पास एक चरित्रहीनता के सिवाय और कुछ नहीं

मैं किसी चरित्रहीन स्त्री की चरित्ररहित नींद से
चरित्रहीन जन्मता हूँ और चरित्र दिखलाता हुआ
किसी चरित्रहीन स्त्री की जागृति में
चरित्रहीन मर जाता हूँ

प्रेम चरित्र का अभाव है इसलिए
इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता
सारे चरित्रों को ख़ुद से रिहाई केवल प्रेम से मिलती है
चरित्रहीनता स्त्री या पुरुष की नहीं होती
न सवाल होती है, न कोई जवाब
चरित्रहीनता एक कोरा दर्पण होता है
दर्पण किसी चरित्र को याद नहीं रखता

सारे चरित्र अतीत की कहानियों में क़ैद रहते हैं
चरित्र हमेशा चरित्रहीनता यानी अपनी नामौजूदगी को
काले शून्य की तरह देखता है और चरित्रहीनता
सारे चरित्रों को अपने भीतर
बनते-टूटते
सपनों-सा देखती है

वे जो कारण खोजते हैं उनसे मुझे अकारण कहना है कि क्षणभंगुरता चरित्रहीनता का एकमात्र कारण होती है जिसका कोई कारण नहीं और क्षणभंगुरता शून्य की सृजनात्मकता है

असीमित प्यार के बग़ैर कोई चरित्रहीन नहीं हो सकता

चरित्रहीन होने का कोई मार्ग, कोई कारण नहीं होता

चरित्रहीन इंसान जब आँखें उठाकर देखता है तो दुनिया को डर लगता है

चरित्रहीनता के चारों तरफ़ असंख्य चरित्र, गहरे अँधेरे में डूबे—
हँसते-रोते-झगड़ते-ऊबे रहते हैं

मेरी याद में
एक चरित्रहीन स्त्री है यानी
एक कोरापन है
एक सूरज है
चंद सीढ़ियाँ और
फूल की सी सरलता का अनजानापन है

इक चरित्रहीन स्त्री की याद से भर जाना
सब कुछ से भर जाना है जिसका
कोई अर्थ नहीं होता जैसे प्यार का

एक चरित्रहीन इंसान
अनंत में
बिजली की कौंध भरी
पानी की भारी बूँद की तरह गिरता है
मर्यादाओं के रुग्ण सूखे हाथों को जलाता हुआ
अनंत के शांत जीवंत हाथों में

इंसान हमेशा चरित्रहीनता के सामने खड़ा होता है
मैं आसमान देखते हुए स्वयं को चरित्रहीन पाता हूँ

चरित्रहीनता स्त्री के रूप में
न मर्दों से लिपटती है न भीड़ की मर्यादाओं से
वह स्वयं की रौशनी में खो जाती है क्योंकि
एक चरित्रहीन इंसान के भीतर से
भेड़ों की आवाज़ें नहीं आतीं

चरित्रहीनता चलने की पुरानी सीख को भूलना है
वह सीमाओं को नहीं बल्कि अनंत को लाँघती है

चरित्रहीनता ईश्वरहीन होती है सत्यहीन नहीं

चरित्रहीनता
जब इंसान के रूप में
कहीं अकेले बैठती है तब
अँधेरा सबसे अधिक गहराता है मगर कोई भी शब्द
उसे राह नहीं भटका पाता
तब ओस की एक बूँद से पूरी कायनात में
जीवंतता के कंपन उमड़ पड़ते हैं
तब तितलियों के साथ नृत्य की कामना उमड़ती है
आँसू भरी आँखें लिए हुए

चरित्रहीनता को चिड़ियों की तरह घने जंगल रास आते हैं
चरित्रहीन इंसान शब्द-अर्थहीन होता है
उसके आस-पास समय नहीं होता
ऊँचाइयाँ निचाइयाँ नहीं होतीं
बाक़ी सभी लोगों की तरह वह भी ‘कोई नहीं’ होता जैसे मैं

यूँ भी होता है कि समय यानी ख़ुद से छूटकर
चरित्र को अपनी चरित्रहीनता के दर्शन होते हैं जिससे
वे अंधे हो जाते हैं
चरित्रहीन हृदय से चरित्रहीन होने की महक तक नहीं आती
केवल आँधी की तरह एक शांत रस हृदय में उमड़ता रहता है

चरित्रहीन इंसान का शब्दकोश
कड़कती बिजलियों
गुलाबों
हवा
बाघ
बाँसुरी और उसकी आवाज़ों
गिद्धों और उनकी आँखों
हंसों
झीलों और उनमें डूबे पत्थरों से भरा होता है
ऐसे शब्दकोश को कवि और संगीतज्ञ जीवन भर खोजते फिरते हैं
उसका सपना देखा करते हैं

ऐसे शब्दकोश में खोजने से कुछ नहीं मिलता
बल्कि मिला हुआ खोता जाता है और
स्वतंत्रता की गहराई आब-ओ-हवा की तरह
हर तरफ़ गूँजती सुनाई देती है—झीं-झीं
हुम्म… हुम्म…

दो

कभी कभी एक विराट उथल-पुथल
मुझमें
ओस की बूँद की तरह ठहर जाती है

इक ख़ामोशी मेरे भीतर से निकलकर
कुओं शोलों और पंखों से जाकर मिलती है
अपने आपको खोदने पर कभी सिर्फ़ पानी निकलता है
कभी सिर्फ़ आग
कभी केवल पंख ही पंख
और कभी केवल ध्वनि

अलस्सुबह कोई बारीक हवा
मेरी त्वचा से
भीतर आई और
मैंने ज़ोरों से
बग़ैर अक्षरों के तुम्हारा नाम पढ़ा
क्या मैं कोई सपना पढ़ रहा था
या मैं ख़ुद किसी सपने की तहरीर हूँ

विसाल का वो पल
फिर कभी ख़त्म नहीं हुआ जिस पल
शब्दों ने पलटकर
निःशब्द को देखा और पहचान लिया
हर शब्द निःशब्द शब्द है

गर पानी ख़ुद में न बहेगा तो पत्थरों को कैसे बहाएगा
गर संसार आँसुओं में न डूबता तो हल्का कैसे होता
जीवन में भ्रम यूँ टूटे गोया कहीं कुछ न टूटा हो

मैं हर सुबह कुछ सवालों को
ओस की एक बूँद में छोड़ आता हूँ
तुमसे ‘सब कुछ’ नहीं कहा जा सकता इसलिए

मैं तुम्हारे साथ ‘सब कुछ’ से मिला अवकाश
जीना चाहता हूँ

कई अधूरे वाक्य
अधूरी रचनाएँ
यूँ स्पष्ट हुईं जैसे
किसी ने पानी को न छुआ हो
अब उन अधूरे वाक्यों पर
पूरे चाँद का
साफ़ प्रतिबिंब झलकता है।

तीन

तुमसे दूर
मेरा दिल
पानी की तरह
गहरा स्याह और भारी हो गया है
गहरा स्याह भारी पानी
किसी सपने-सा लगता है

तुम्हारे साथ
पानियों की मेरी स्मृति
मुझमें पूरी लौट आई है

पानी हृदय की आँख है

कभी कभी नींद जैसी टूटी हुई चीज़ों
के आस पास मैं
पानी की आवाज़ सुनता हूँ
हर जागृति काव्य का क्षण है

हवा पानी की छुअन
मन को
छोटे-छोटे पिंजरों से रिहा करती है
हर रिहाई एक प्रेम कविता होती है

रात हमने जो सूखे पत्ते
जलते अलाव में डाले थे
उन्हें मैंने
पानियों के ख़्वाब में
जड़ों-सा डूबा
मछलियों-सा तैरते देखा
उसी ख़्वाब के बहाव की
शीतलता से जागकर
मैंने तुम्हें चूमकर गले लगाया

किसी को चूमना
बर्फ़ और आग का ख़्वाब देखना है

हमारे सीनों के बीच
निःशब्दता की
सुनहरी लपटें आसमान छू रही हैं
सर्द रात आग तापते हुए
हम देखते हैं कि आग
आईना है

हमने क़रीब से देखा हम आग थे
और क़रीब आए तो पानी हो गए
पृथ्वी के साथ-साथ काँपते
आए और भी क़रीब तो देखा हम हो चुके थे सब कुछ
और कुछ नहीं

प्रेम के स्वप्नों में कोई मूरत नहीं थी
केवल मिट्टी थी
और हाथ थे अनछुए
जो हवा
आकाश
पानी और आग से बने थे
और निरंतर
स्वप्न को गहरा कर रहे थे
इसलिए स्वप्न के सिवाय यहाँ कुछ नहीं देखा जा सकता।

चार

हर एक चीज़ की प्रकृति में एक अलविदा है
अलविदाएँ कभी ख़त्म नहीं होतीं
शायद वे कभी शुरू नहीं हुईं
मैंने बरसों ख़ुद को बादल देखना सिखाया
उस सीख का रंग आसमानी है
धुँध में जलते चराग़
हवा में उड़ते हुबाब
और पानियों के किनारे
सिर्फ़ कुछ याद दिलाने
और अलविदा के लिए होते हैं

तुम्हारी आँखें
मेरी किताबों के सारे शब्दों को मिटा देती हैं
मैं जितना मिटता जाता हूँ तुम्हारी आँखें
उतनी गहराती जाती हैं

मुझमें एक ख़ामोशी तुम्हारे आँसुओं को
चंद्रमणि-सा धारण किए हुए है

मेरी कोई कहानी नहीं सिर्फ़ कभी न ख़त्म होने वाली एक कविता है जो हर बढ़ते शब्द के साथ सूक्ष्म होती जा रही है और मेरी हड्डियाँ हैं जिन्हें रात में अचानक मेरी माँ के जोड़ों का दर्द झकझोर देता है

बहुत गहरी ख़ामोशी के ख़ज़ाने से
रात एक कुत्ते की क़ीमती आवाज़
शीशे की तरह
चमकती है
बिखर जाती है…

मैं यहाँ इन ख़ामोशियों में
किन आवाज़ों का बोझ ढो रहा हूँ?

जबकि अलविदा हर आवाज़ का गुणधर्म है

पत्ते शाखों पे आकर यूँ मुस्काते हैं
जैसे पहले यहाँ कभी न आए हों

इक शाख रिक्तता से यूँ भर उठती है जैसे
पहली बार कोई स्त्री हामिला हुई हो

पतझर अपनी सारी ख़ाली टहनियों को
मेरे दिल को सौंप देता है और
हवा सूखे पत्तों को पूरी पृथ्वी सौंप जाती है

पत्तों पर चलते हुए एक राहविहीनता
एक अलविदा मुझे पकड़ लेती है और मैं
एक पुनर्मिलन से भर उठता हूँ

पत्तों भरी पृथ्वी अनकहे के एकांत का दर्पण है

मैंने बरसों ख़ुद को रात की आवाज़ सुनना सिखाया

उस सीख का कोई रंग नहीं!

पाँच

मैं एक दिल की दिशाहीन निःशब्दता हूँ

रात
सियारों
कुत्तों
झींगुरों और सब कुछ की तह में बैठी अनजानी आवाज़ें
मेरे गिर्द फैली
किसी सोच याद चाह की धुँध को
पार करती हुई
चली जाती हैं
और तब
मेरे फेफड़ों में हवा की तरह
आवाज़ें भर जाती हैं

यहाँ
मैं
कभी पानियों की तरफ़ से आता हूँ
कभी क़ब्रों की तरफ़ से
कभी फूल कभी राख और
कभी कोयलों में से निकलता हूँ
कभी-कभी मुझे बुझाकर
यहाँ
धुएँ की एक लकीर उठती है

मैं अपनी आँधियों संग
क्षण भर का सब्र लेकर चलता हूँ
ठीक इसी तरह कायनात ख़ुद को रचती है

एक तूफ़ान मुझसे पूछता है कि कौन है वो जो यहाँ
ख़ामोशी से तुम्हारे साथ हो सकता है?
क्या तुम्हारे पास
मुझ-सी कोई जीवंत ख़ामोश मौजूदगी है?

तुम्हारे ख़याल के धुँधलाने के बाद मुझमें
एक पहाड़ उभरता है
एक शब्द
एक हिमालयी पंछी की आँखें
शाम के रंग और
सब कुछ को अकेला करती हुई
एक पगडंडी जो
मुझे कहीं नहीं ले जाती

प्रेम मेरे अनदेखे में उगी हरियाली है
दिल एक ऐसी रौशनी है जिसमें
खोजने को कुछ नहीं
प्रकाश अ-रूप की अबोधता है

तुम्हारी क़ुर्बत में
मेरे भीतर
सदा के लिये कहीं खो जाने के ख़्वाब
दाख़िल होते हैं
और उनके साथ
पतझर की टहनियों की
बरहन गतिहीनता और
एक दिशाहीन
निःशब्दता…

छह

केवल तुम्हारी याद है
जो मुझमें
बहुत धीमे और बहुत
अचानक से
आती है
धुँधलाती है
कभी-कभी जब तुम्हारी याद
मुझे भीतर बाहर कहीं नहीं पाती होगी
तो वह ख़ुद को नहीं पहचान पाती होगी
मेरी अनुपस्थिति एक काव्यात्मक उपस्थिति है
जिसकी कोई स्थिति नहीं बताई जा सकती

सपने नहीं जानते
और कल्पनाएँ भी नहीं जानतीं कि
जो कहा नहीं जा सकता
उसमें डूबा हुआ दिल
कैसा नज़र आता है
कैसा?
जो कहा नहीं जा सकता वैसा
कैसा?
जैसे कहीं कुछ न हो और जिसे देखने के लिए
आँखों को चाहिए अनकहे का प्रकाश

स्पष्टता और धुँध में एक आकस्मिकता होती है जैसे सब कुछ में
कोई भी जगह
विचार
इच्छा
पीड़ा कभी भी धुँधला सकती है
धुँधलाहट कभी भी कुछ भी हो सकती है—
पीड़ा शब्द इच्छा जगह विचार
लोहे-सी कठोर और ठंडी कहीं चाबुक-सी लचीली कहीं कालिख-सी काली और कहीं
रेशमी गुलाबी भीगी धुँधलाहट से लोग
एक दूसरे से अपनी अपनी सुरक्षा करते हैं

लोग एक दूसरे का अस्पष्ट इंतज़ार करते हैं
एक दूसरे से अस्पष्ट प्यार करते हैं
और धुँधली नफ़रत भी
देश और समाज हमेशा एक धुँध में
क़ानून लागू करते हैं
सीमाएं खींचते हैं
सिर्फ़ एक धुँध के आने-जाने के सिवाय
जीवन में
समाजों में
कभी कुछ और हुआ है क्या?

जब हम नहीं देख पाते कि हम एक दूजे के आईने हैं तो दूर-दूर तक धुँध पसर जाती है
बहुत साल पहले मेरे जीवन में ऐसी ही धुँध थी और
एक स्त्री मुझसे बात करती थी
हम एक दूजे के दिल की धुँध में झाँकने से डरते थे
मैं
काँपती रोती हुई उसकी आवाज़ का बंधक था
और संरक्षक भी
उन्ही दिनों सर्द कोहरे में डूबे पेड़ों को गले लगाकर
मैं बहुत रोया भी और मेरा दिल धीरे-धीरे एक
अभयारण्य में बदल गया

जुस्तुजू के रंग
अपनी आवाज़ों को धीमे से धीमा करते हुए
एक नीरवता के अँधेरे में तब्दील हो जाते हैं
उजालों में देखी गई दूरियाँ अँधेरों में
गहराइयाँ बन जाती हैं
एक इंसान कभी धुँधलाहट को नहीं देखता
धुँधलाहट की बदनाम धारणाओं को देखता है

दुख बार-बार धुँधलाहट को सिर्फ़ उजागर करता है उसे निर्मित नहीं करता
प्रेम में पुरानी धारणाओं का धुँधलाना एक सवाल है जो जवाब नहीं ढूँढ़ता बल्कि उस दिल को ढूँढ़ता है जो लड़खड़ाती भटकती धुँधलाहट को सँभाल सके

कभी-कभी अचानक एक अस्पष्टता
जिसके होने की मुझे कोई उम्मीद ही नहीं थी
आकर मुझे घेर लेती है ताकि मुझे समझ न आए कि मैं क्या करता-बोलता-लिखता-सोचता हूँ

अक्सर यूँ भी होता है कि सबसे धुँधले लम्हों में हम बेहद शांत होकर किसी कविता की एक पंक्ति पढ़ते हैं और बहुत स्पष्ट महसूस करते हैं कि जो चीज़ बदलती बहती रहती है सिर्फ़ वह ही चीज़ हमारी है

रंग-ध्वनि-आकृति किसी के लिए नहीं धुँधलाती
उनकी धुँधलाहट एक खोए हुए दिल के सिवाय भला और किस के लिए हो सकती है

इंसान को हमेशा इंसान की तरह धुँध को नहीं देखना चाहिए
कभी किसी चिड़िया की तरह भी देखना चाहिए
कभी किसी दरख़्त की तरह उससे लिपट जाना चाहिए
किसी जवाब का इंतज़ार नहीं बल्कि धुँध के छँटने का इंतज़ार करना चाहिए
दुनिया सिर्फ़ ‘धुँध में’ नुमायाँ होती है वरना कहीं कोई दुनिया नहीं

मेरे पास निश्चित और स्पष्ट से ज़्यादा अनिश्चित और अस्पष्ट जवाब हैं
जंगल की एक अनजान पगडंडी ने रास्तों की मेरी समझ और धारणा को न जाने कहाँ गुम कर दिया
यह कहना बहुत मुश्किल है कि दुनिया के पैरों तले कोई ज़मीन है या गहरा परतदार धुँधलका

हम एक दूजे की केवल स्पष्ट आवाज़ें ही नहीं सुनते बल्कि धुँधली टूटी बुदबुदाती अव्यक्त आवाज़ें भी सुनते हैं जो हमें साफ व्यक्त आवाज़ों से अधिक घेरे हुए रहती हैं और ज़्यादा गहरे छूती हैं

धुँध वहाँ भी है जहाँ नफ़रत है
धुँध वहाँ भी है जहाँ प्रेम है
केवल धुँध पर ही पाँव रखकर तुम्हारे क़रीब तुमसे दूर और परे जाया जा सकता है
ख़ुद को या किसी दूसरे को प्रेम आँसू हँसी और ख़ामोशी की वजहें बताना आंखों में धूल झोंकने जैसा है वजहें और मक़सद देखना जीवन की बहुत धुँधली तस्वीर देखना है

भीतर बहुत कुछ
केवल इतना ही दिखाई देता है जैसे शहर की दीवारों और अख़बारों पे एक स्पष्ट ब्योरे के साथ छपी गुमशुदा लोगों की धुँधली तस्वीरें
रंग : गेहुँआ/साँवला/गोरा
उम्र : 45/15/7 के आस-पास
बाल : भूरे/सफ़ेद/घुँघराले
कितने ही लोग होंगे जिन्हें मैं इतना ही दिखाई देता हूँगा

कई बार किसी आवाज़ का धुँधलाना
मन को साफ़ कर जाता है
गर दिल में तुम्हारी अस्पष्ट सूरत न होती
तो दिल को कभी कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आता

धुँध सिर्फ़ ख़ुद को महसूस करती है और जानती भी नहीं कि वह किसी के दिल में है
आवाज़ें इसलिए धुँधलाती हैं क्योंकि उनका ध्यान किसी रास्ते और मंज़िल पर नहीं होता और कोई भी रास्ता धुँधलाहटों की आँखों से कभी ओझल नहीं होता

एक दर्द जो हर मौहूम आवाज़ की तरफ़
बहना चाहता है उन्हीं आवाज़ों-सा
अस्पष्ट हो गया है
मुझ पर तहलील होती हुई सदाओं की संगति का
गहरा असर है
ये धुँधलाहट न जाने किस साज़ की आवाज़ है

एक धुँधली ख़ामोशी हमेशा घर टटोलती रहती है
एक धुँधली ख़ामोशी हमेशा एक क़ंदील थामे रहती है
एक प्रतीक्षा
एक मुलाक़ात
इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि कोई भी क्षण
कभी उतना सूक्ष्म नहीं हो सकता

कुछ कमी-सी महसूस करता हुआ मैं
किसी गहरी धुँधलाहट को जी रहा हूँ जो कभी
एक तीर
कभी नदी
कभी किसी अज़ीम क़िले-सी दिखाई देती है
एक धुँधलाहट
कभी बुद्ध-सी बैठ जाती है
कभी सतह से उठते आदमी-सा उठती है
कभी मीरा-सा गाती है

कभी मुजरिम तो कभी गवाह की तरह
कठघरे में खड़ी हो जाती है
और कहीं मकड़ी-सा जाल बुनती है जिसमें
सारे स्पष्ट शब्द फँस जाते हैं

जिस जगह हम मिलते हैं उस जगह
एक धुँध पहुँचने में कभी भी देर नहीं करती
और तब तक मौजूद रहती है जब तक
हम अपने चेहरे नहीं भूल जाते
गर तुम सारे शब्द भूल चुके हो
तो तुम यक़ीनन
मुझे पहचान लोगे।

सात

एक शब्द
जो मैंने कागज़ पर लिखा
उसे ही अपनी त्वचा-हड्डी-रगों पे लिखा
वहाँ भी लिखा जहाँ शब्द लिखते-लिखते मिट रहा था
अपनी बैचेनी और शांति पे लिखा
जहाँ सारे शब्द खो रहे थे वहाँ लिखा
दरवाज़े-रास्ते-बर्तन-रोटी और लिबास पे लिखा
उसी एक शब्द को
अपने हर सुख-दुख-इच्छा-घृणा-अहंकार और भय पे लिखा
हर टूटती-बनती-बिगड़ती चीज़ पे लिखा
तुम्हारे मिलने पे और बिछड़ने पे लिखा
अपनी मृत्यु पे लिखा
अपने जन्म पे लिखा
इतना लिखा कि बाक़ी सारे शब्द भूल गया

देखा तो बादल-पत्ते-फूल-तारे पहले से ही
उस शब्द का आकार ले चुके थे
सुना तो पेड़-नदी-पहाड़-हवा
उजाले-अँधेरे
सदियों से उस शब्द का उच्चारण कर रहे थे
चलने लगा तो मालूम हुआ
एक शब्द के भीतर
अनंत में घूम रहा हूँ!

आठ

प्रेम या एकांत जितना राहविहीन और क्या हो सकता है
जीवन को राहविहीनता की परवाज़ लिए जाती है

जब कोई किसी से नहीं पूछता कि दुख का क्या करूँ तो
पत्तों और पत्थरों की आकृतियाँ
दिल के इतने क़रीब आ जाती हैं
कि लगता है ‘क़रीबी’ सबसे सूक्ष्म शब्द है
एक रहस्य है जो किसी ‘के लिए’ नहीं होता

मैं जिसे पत्ता या नीला कहता हूँ उसे
पत्ता और नीला कहकर भी अनजान हूँ
इतना अनजान कि उसे
कुछ भी कह-पुकार सकता हूँ

मेरे पास जो कुछ भी है वह
टूटने-बिखरने-मिटने-खोने वाला है
मेरा मेरे बारे में जो ख़याल है वही ख़याल
हर चीज़ के बारे में ख़याल बनाता है
ख़याल बनाना दूरी बनाना होता है

दूरी का भाव ही तय करता है
चीज़ों ‘को’ कैसे और क्या देखना है
चीजों ‘में’ क्या देखना है

एक शाम
तुम्हारे सारे ख़याल
मुझे हर जगह छोड़कर चले गए
यहीं कहीं मैं यूँ था जैसे सांध्य रंग
यूँ था जैसे एक संयोग
एक शुरुआत
यहीं कहीं मैं यूँ था जैसे
अंत

कितना कुछ है जो सिर्फ़
ध्वनियों से बदलता-ठहरता-टूटता-बहता
और निर्मित होता है।
कितना कुछ बदलता-ठहरता-टूटता-बहता-निर्मित होता है
और
कोई
ध्वनि
नहीं
होती

आँसुओं और पुकारों का संबंध
सांध्य-रंगों से कहीं टूट न जाए
इसलिए तुम गाते रहो
ओ! प्रेम के एकांत

अचानक जाने कैसे सागर की याद आती है कि मैं
भूल जाता हूँ कहाँ से आया था
कहाँ जाना है
इतनी-सी भूल मुझे
नदी में तब्दील कर देती है

शाम कमरे में लौट आता हूँ मगर दिमाग़ में
एक अकेला घोड़ा है नदी पार करता हुआ
एक बादल की आकृति है और
नदी
घोड़े
बादल की स्वतंत्रता का
अटूट एकांत है
एकांत
जिसे मैं
किसी अर्थ से नहीं बाँधता

मेरे पैरों तले
पुराने कपड़ों से बुनी दरी बिछी है जिसने
पृथ्वी को
हाथों की कशीदाकारी से भर दिया है
कुछ दोस्त मुझसे मिलने आते हैं और
उनके चले जाने के बाद
मेरा कुत्ता
दरी की गिरहों को
बारीकी से सूँघता है…

संदीप रावत की कविताओं के प्रमुखता से कहीं प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान की पढ़ाई की है। वह प्रकाशनाभिलाषा से मुक्त एक वक़्त से कविताएँ लिख रहे हैं। यहाँ प्रस्तुत कविताओं को प्रकाशित करते समय ‘सदानीरा’ इस तथ्य को रेखांकित करना चाहती है कि इन कविताओं में हमारे उस कविता-समय के निषेध को लक्ष्य किया जा सकता है जो इधर लगभग एक दशक से सक्रिय है। ये कविताएँ समादृत और सम्मानित काव्य-रूढ़ियों से परे जाकर संभव हुई हैं। इनमें एक नवीन नज़र और अपूर्व अन्वेषण है। संदीप से [email protected] पर बात की जा सकती है।

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