कविताएँ ::
सत्यपाल सहगल

सत्यपाल सहगल

आकाश से आकाश गिरता है पत्तों की तरह

एक

आकाश से आकाश गिरता है पत्तों की तरह
हवा के परदे हिलते हैं
कोई फिर उन्हें खींच देता है
सामने वही पुरानी दुनिया
एक शहर है सामने
जो एक शहर था
चंद रास्ते हैं जो चंद रास्ते थे
उन पर धूल उड़ती है अब तक

पत्तों के बीच से आकाश दिखता है
पतंग की तरह
पतंग की तरह ऊँचा उठता हुआ
उड़ता हुआ

दो

नहरें थीं वही हमारी नदियाँ थीं
सुनसान घास थी
उदास अनमने कीड़े
ख़ुश पंछी थे उसे न बाँटते हुए
झाड़ियों में सनसनाहट थी
वह गूँजती थी
वह आज भी गूँजती है

तीन

रात में हमारे हिस्से का आसमान था
उसको ओढ़ते थे
कभी नहीं भी ओढ़ते थे
कभी एक गीत उसको सुनाते थे
कभी सुनता था
कभी नहीं सुनता था

एक गीत अब भी बजता है
आकाश अब भी उसे सुनता है
कभी नहीं सुनता है

चार

एक दिन था जो हमें रात के ठौर पहुँचा देता था
दिन के ऊँट पर बिठा कर
फिर लौट जाता था
दिन के ऊँट को लेकर

एक दिन था
जो हमें रात तक छोड़ आता था
एक दिन है
हर दिन जो रात तक छोड़ आता है

पाँच

हवा में जाता सनसनाता तीर है हमारा जीवन
अँधेरे में पड़ी है हमारी चप्पल
यहीं कहीं होगी

कुछ है जो हिल रहा है
कुछ था जो हिलता रहता था

कुछ था चमकती चट्टान की तरह
रास्तों की बग़ल में
हमारे रास्तों की बग़ल में
कुछ है
शीशे की तरह चमकता
हमारे रास्तों की बग़ल में

छह

अंधकार घेरता है बाहर
भीतर उजाला
मैं बचा हूँ
उजाला कहता है
तुम बचे हो
अँधेरा कहता है

तुम मेरी वजह से बचे हो
अँधेरा कहता है

सात

रात टिकी है
कव्वे की तरह मुँडेर पर
रात उड़ रही है
कव्वों के झुंड की तरह
रात खूँटे से बँधी है

कभी तोड़ भी सकती है उसे

आठ

रेलगाड़ियों की तरह
अँधेरा गुज़रता है

यही निष्कर्ष है
और क्या हो सकता था
यही हो सकता था

अँधेरे के पीछे और आगे पटरियाँ हैं
यह सच है
मैंने इसे देखा है

नौ

प्रातः एक संभावना है
यह उसका हक़ है
एक आधा खुला दरवाज़ा है
नज़र आता है शहर

जिस शहर में हम रहते हैं

प्रातः एक खड्ग है
जादुई ढंग से हमारे हाथों में हर सुबह
हम लड़ते हैं
क्योंकि प्रातः एक खड्ग है
हमारे हाथों में हर सुबह
जादुई ढंग से

यही निष्कर्ष है
और क्या हो सकता था
ज़रा बताओ

दस

रात के रतजगे को झटकते
सुबह के श्वान
सुबह की सड़कों पर…

सुबह की सड़कें!
रात के थके तम्बू
औ’ क़नातें और दरियाँ

सुबह की सड़कें!
एक खुलता लिफ़ाफ़ा
सूँघते उसमें
ढूँढ़ते गुप्त एक संदेश

सुबह के श्वान

ग्यारह

कोई फेंक गया आसमान
चादर की तरह पछीटता उसे
कोई फेंक गया उसे
जैसे उसकी ज़रूरत नहीं थी

कोई उसे तोड़ कर चला गया
सूखी लकड़ियों को तोड़ कर चला गया
जैसे कोई

दूर जो एक लाली चिल्ला रही है
वहाँ सूखी लकड़ियों की तरह टूटा आसमान
जल रहा है

कोई अपनी सारी आग में उसे झोंक गया है

बारह

आकाश के जल में
मेरे स्वप्न की नाव बहती है

पत्तों पर बिछा मेरा पलंग
मेरे सभी रास्ते नदियों की बग़ल से जाते हैं
रात की स्याह क़मीज़ डाल कर
मैं दिन की गलियों में घूमता हूँ

लाख बरस पहले मैं ज़मीन में रोंप दिया गया था
यह जंगल मैं ही हूँ
तारे मेरे रिश्तेदार
चाँद ने मेरे लिए आटा पीसा
रोटी खिलाई
घर में रखा

जब सिर्फ़ सच था
मैं घास की तरह उगा था हर कहीं
लाख बरस तक साँस लेता रहा
वायुमंडल में रहा

मनुष्य तो मैं
बहुत बाद में बना

तेरह

मुझे ले लो दोने की तरह
मेरा उपयोग करो

रूमाल की तरह रख लो
अपनी जेब में
मैं तुम्हारे दरवाज़े की सिटकनी हो सकता हूँ
तुम्हारी शर्ट का बटन
तुम्हारी गली में नीम का पेड़
मैं तुम्हारी पुकार हो सकता हूँ
स्वप्न के बीच
वह खिड़की जहाँ से हवा
तुम्हारे घर आती है

मुझे ले लो मुझे बिना बताए
मैं नहीं जानना चाहता
कब ले लिया गया मुझको
कब बना मैं तुम्हारी डाक का डिब्बा
तुम्हारी हल्दी और नमक
तुम्हारा परदा तुम्हारे सात परदों में एक
तुम्हारा सुई-तागा

इस सर्दी
मैं तुम्हारा कोट हो सकता हूँ
धुला और तहा कर रखा
पहनने के लिए तैयार

ले लो मुझे जैसा भी मन हो

चौदह

जुनून का पौधा रात के बारह बजे उगता है
कभी जुनून झरने की तरह गिरता है
हमारी आत्माओं पर
कभी आँगन में आकर गिरे बम्ब की तरह

दीवारें दोस्त बन जाती हैं जुनून की कई बार
वह उनसे बातें करता
रात के सरोवर में ऊँचे से छलाँग लगाता है
जुनून को मैंने रात के अँधेरों में तैरते देखा है

बहुत क़रीब से हमारे सन्न से
गुज़र जाता है उसका तीर
ढोल बजते-बजते फट जाता है
आँखें चुधियाँ जाती हैं उसकी रोशनी में
भूखे शेर की तरह दहाड़ती है उसकी दहाड़
जंगल काँपता है
कभी मैंने उसे भागते देखा है चीते की तरह
किसी के पीछे

जुनून पत्थरों की शक्ल में भी हो सकता है
ध्यान से ग़ुज़रो उनकी बग़ल से

पंद्रह

दरवाज़े के बाहर ही खड़ी होती है
कविता की पहली पंक्ति
किसी जादुई आवेश में
खुल जाता है दरवाज़ा
पंक्ति वह गले से लिपट जाती है मेरे
मेरे बिस्तर तक आ जाती है

एक दूसरी पंक्ति शीशे की खिड़की पर
गिलहरी की तरह घूमती है
नहीं, फुदकती है
तीसरी पंक्ति सामने आकाश में उड़ती है
मेरी आँखों के सामने
और अब आँखों से दूर
गगन में ग़ोते खाती

इस बीच उसमें शामिल हो जाता है राहगीर
सड़क पर सामने शीर्षक की तरह चला आता
उसे अभी प्रतीक्षा करनी होगी
शीर्षक सबसे आख़िर में दिया जाएगा

इधर देखिए न जाने कितनी पंक्तियाँ
घर की बेतरतीबी में से झाँक रही हैं
उसके गर्द-ओ-ग़ुबार
और रसोई की महक में
ऊपर जाती सीढ़ी के तीसरे पायदान पर
अटकी धूप में

यही है कविता
जिसके बारे में इतना शोर मचा रहता है

सोलह

मेरे छोटे से आँगन में
क्यूँकर गिरते हो
रात के इत्ते बड़े झरने
तेरी आवाज़ से उचट जाती है मेरी नींद
तेरा पानी मेरा बिस्तर भिगो देता है
पूरा घर डोलने लगता है
बाढ़ में फँसी नाव की तरह

ओ रात के अजीब से झरने
जाके बरस कहीं ओर कभी

दिन में मैंने कुछ कमाई
कुछ चुराई
धूप की सतरें रंग-बिरंगी
क्या उसे बहाने आया है तू
बोल,
और कोई काम नहीं तुझे

ओ रात की ख़ुशबूदार स्याही
क्या लिखूँ मैं तुझसे
मैंने तो वही एक हर्फ़ लिखना है
वही एक हर्फ़
दिन!

सत्रह

दूर कहीं शोर है
पास एक ठहराव है पुल की तरह
जिस पर मैं खड़ा हूँ
नीचे एक नदी है लोरी के गीत की तरह

न जाने कब से हूँ पुल पर
शायद बरसात होगी
कहीं दूर पेड़ चिरने की आवाज़ है
कहीं पास कोई सड़क बन रही है
उसके बनने का संगीत है

पुल पर हूँ
आर या पार जाने की जल्दी में नहीं हूँ
नदी में तैरती हैं डालियाँ
झाँकती है घास
झाँकती रोशनी है चोर पैरों से
घरों की छायाएँ
थके मुसाफ़िरों की तरह नदी में बैठी हैं

पुल पर हूँ
जैसे पुल के प्यार में हूँ

नदी में पुल की छाया भी है
नदी ने तमाम छायाओं को माँ की तरह
गोद में समेटा हुआ है

अठारह

वह मेरा पुल है
जो अकेला-सा वहाँ दिख रहा है
धुँध में फँसा
धूप से चमक रहा है

जिसके किनारे को ज़ोर से पकड़ा था किसी ने
और रुका था
साँस ली थी
जिसके ऊपर से गुज़र कर जा रहा है
पंछियों का झुंड
जिसके नीचे बहती नदी
सदा ख़ामोशी में बहती है
जिसके ऊपर से गुज़र कर जाएगा
स्कूली बच्चों का दल
बजेगी जब घंटी

जो सारी यादें झाड़ कर
इस समय मुस्करा रहा है
जिसके भीतर का लोहा
अपने को नहीं भूला है

वह मेरा पुल है
उसे तुम ले लो

उन्नीस

यहाँ कुछ ख़ून दिखता है बहा हुआ
यहीं हुई होगी मुठभेड़
यहीं टूटे हैं कुछ पौधे
एक फटा थैला
जूतों की बिखरी एक जोड़ी
यहाँ कुछ बारूद की गंध
कुछ पसीना
कुछ तस्वीरें फटी
कुछ कराहें अब भी तैरती-सी हवा में
यही है वह निर्जन
कँटीली झाड़ियाँ वहीं
यही हुई होगी मुठभेड़
मेरे वीरों की

अभी उसकी तपिश यहाँ गूँज रही है
संदूक़ में भरा जा सकता है
यहाँ का सन्नाटा अभी
समेटे जा सकते हैं टूटे तीर
कुछ पुराने चुंबनों की किरचें टूटे काँच जैसी
अभी चमकती हैं यहाँ
अभी प्रतीक्षा की जा सकती है
आएगी माँ अपनी लाठी टेकती
बहन अपनी हाय छिपाती
ख़ौफ़ के इस जंगल में टूटे पत्ते
गिरते और उड़ते रहेंगे

बीस

चलो गाएँ धूप से सने गीत
तोड़ें भीत
हवा से अनायास जुड़ जाएँ

चलो उठाएँ घोष
निकालें रोष संदूक़ों से
जल की ओर जाएँ
उठाएँ लहर, लहर पर लहर
सजाएँ माथा अपना
किनारों की दूबों से
नाव उतारें अपनी बीच धार

चलो नदियों के मुहाने
भटके जहाँ मिल जाएँ गीत पुराने
उन्हें लिवा लाएँ गाँव घर
चलो, थक गए पैर रुके-रुके
झुक गई और रास्ते की डालियाँ
उदास हुई धूल
चलो पेड़ों से नींद चुराएँ
चलते-चलते

चलो हटाएँ परदे
देखें कितनी सुबह हुई
बुझ गए दीये उठाएँ

सत्यपाल सहगल सुपरिचित हिंदी कवि-लेखक और अनुवादक हैं। उनकी दस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

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