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उत्कर्ष

Utkarsh hindi poet
उत्कर्ष

प्रतीक्षा

टेसू और गुलमोहर के बीच मीलों की दूरी और उसे पाटती
घाट की प्रतीक्षारत सीढ़ियां
शहर में सन्नाटा
तुम्हारे नहीं होने का व्यस्ततम एकालाप है.

हम दोनों अकेले में
एक-दूसरे से मूक प्रेम करते जाते हैं
और देखते रहते हैं
प्रवासी विहगों का बिछोह.

एकात्म

हम कैसे जान पाते
बगुलों का युगल-गान
एकांत में घोलता है अगाध प्रेम.

हम कैसे जान पाते
पूरी प्रक्रिया
पतझड़
वसंत
बरसात
भटकना
और फरवरी.

अप्रैल हर साल पूरे बीते साल का संधि-बिंदु होता है.

हम
यात्रा में
हठयोग में
इस तरह
रहते हैं निरंतर
मिलन तक.

कोकिल तत्सम में मूक
तद्भव में मीठी तान गा रही है
तीसरे पहर के आखिरी आलाप में.

तुम्हारे देस में

मीठा है झील का पानी
जैसे अभी निकला हो
तुम्हारी मुस्कुराहट की थाप से छूट कर
संगीत के पहले स्वर-सा

मैं पहुंचा हूं
तुम्हारे देस में
रास्ते भर के जीवन से होकर
रास्ते भर छूट गया मुझसे
हर शाम का सूरज
हर सुबह की इबादत
छिटक गई

यहां तुम्हारे देस में
यहां तो हर दुआ अज़ान है
बच्चों की हर मुस्कुराहट
प्रार्थना की स्वरांजलि

तुम्हारा यह देस
दुनिया और आसमान के बीच की जगह है
असमतल और असमान सतह से ऊपर
रंगरेजों की तल्लीन कामगारी
यारबाजी के परिंदों का आसमान
अहं की चौखट से नीचे

तुम्हारे देस में महुआ है
अमलतास बीघे की आड़ पर
तोंत की चटक डाल दुपहरी के कांधे चढ़ी है
मैं कुछ गुलमोहर समेटता हूं
और शाम अपनी चादर मुझे सौंपे जाती है

तुम्हारे देस में
मैं सभी उपमानों से मुक्त होकर रचता हूं
सभी मोह से विरक्त
तुम्हारे देस के प्रेम में डूबे-डूबे
शांति के गीतों में डूब
उस पार बैरागी बन निकलता हूं
तुम्हारे देस के बैरागी मेरे जैसे होते होंगे पहले
निपट मूर्ख और भोले
जो भ्रम और भेद में अंतर नहीं खोज पाते
जैसे सांझ का होना और पाना
जैसे हमारा होना और भटकना

तुम्हारे देस में
भाषा तितली हो जाती है
मैं भागता हूं
उसके पराग-पथ को पहचानते

तुम्हारे देस में
सूरज कभी पूरा नहीं डूबता
शाम एक झपकी पर उठ जाती है
सुबह गिलहरियों का उत्सव है
तुम्हारे देस में
मैं मनुष्य के सबसे स्वच्छ वस्त्र धारण करता हूं
तुम्हारे देस में
रोटियों में चांद चखता है भूख का स्वाद
मैं लोरियों की मनलहरी

तुम्हारे देस में
मैं अपनी कुहनी के तकिये में गोते अपना सर
देखता हूं तुम्हें
मुझे अपलक निहारते
पूरी पूर्णिमा के चांद तक.

तुम्हारे देस में
मैं संपूर्ण यायावर होता हूं!

लौटा करूंगा

मैं देख रहा हूं
इस शताब्दी के सारे दुखों को जलते हुए
सांत्वना के अलाव में
धू-धूकर.

अबके जाड़े बोरसी का ताप कम था
क्या यह उसका विलाप था?

पता नहीं
कितने और हाथ
और कितनी हथेलियां
जली हुई हैं
या डूबी हैं जले के निशां सरे पानी में.

फिर भी चाहिए संवेदना.
संबल.
वक्त की हर टूटती दीवार को.

मेरे हाथों में हैं जले के निशान.
वैसे तो जाड़ा सोखता है जलने के दुख.
लेकिन आजकल कम.

समय अविराम दौड़ है दोस्त.
मैं भी.
जब बोरसी काफी नहीं होगी
रात के सबसे भारी पहर.
जब मेरी देह का भार
मेरे धैर्य से संभाले न संभलेगा.
जब मेरे ठंडे हाथों को चाहिए होगा आश्रय.
अविलंब.
मैं लौटा करूंगा
तुम्हारे गर्म हाथों की ओर.
हर बार.

कि टुकड़ों में है दुनिया

बिसेसर आदमी जात का है
और इतनी ही है उसकी दुनिया
कि हर फसल पकने पर
उसकी नियति कर लेती है आत्महत्या
टुकड़ों में बंटी दुनिया में से
मिला उसे खाली उजाड़ खेत
जो हर साल बरसात में माथे भर जल में
डूब जाता है भीतर तक

दुनिया उसके दुख का उपाय न ढूंढ़ सकी
ऐसा न हो सका कि मुआवजे की जगह
बारह जने रातों-रात उछाह आएं
उसके खेत से सारा पानी या भर दें इतनी मिट्टी
कि उसे समतल जमीन मिल जाए

उस दुनिया में मिट्टी की कमी न थी
कमी न थी न ही कोड़नेवाले की
और दृश्य अभी तक वहीं है स्थित
निचली सतह थोड़ी और है नीचे
ऊपरी सतह पिछली बरसात में
थोड़ी और ऊंची कर दी गई है
दुनिया अब भी पसरी हुई है
छोटे-छोटे इतने टुकड़ों में…
समतल भूमि एक स्थापित भ्रम है

बिसेसर के घर चलें हम पांच-सात
उसके घर जीम लें समय का अदहन
उतार लें हलक में साग-भात
उसकी टूटी छत को मढ़ आएं पुआल से
देख आएं उसकी मुस्कान से फूटती उजास को
जान आएं आदमी की जात
सब जात का भ्रम अलाव में फूंक-ताप कर
बिसेसर रोज फांकता है चना-गुड़
चबाता है नए धान का चूड़ा
कभी चलें हम इकठ्ठे जने पांच-सात
थोड़ा-थोड़ा आदमी हों आएं.

उसके गांव में हर जाड़े गाती है सरसों
हर साल खुशहाल फसल का गीत
उसके गांव से कई कोस दूर शहर में है नदी
जिसमें शहर छोड़ देता है अपनी मलिनता
हर दिन बिना नागा किए
गांव की नहर में अभी तक मलिन नहीं दीखता है चेहरा
हर साल गांव में चूता है महुआ पेड़ से
हर साल बिसेसर बीनता है कुछ महुआ
जो सड़क पर गिरा
कुछ जो किनारे निचले बाहे की गोद में

भाई बिसेसर! तुम ले आते हो मुझे
उस बड़े से बड़ के पेड़ के पास
हर बार
और हर बार
मैं जड़ों से पूछता हूं सवाल
कि दुनिया अभी तक
इतनी उखड़ी-बिखरी क्यों है
क्या नहीं हैं इस दुनिया में और
बहुत और मेहनतकश कंधे जो
हर दिन बना दें दुनिया को थोड़ा बराबर कल से
थोड़ा जुड़ जाए अधिक कल से
दुनिया का छिटका हुआ छोटा-छोटा हिस्सा.

हम क्या हो पाए
अगर थोड़ा आदमी न हो पाए
कि जब कल वक्त पूछे हमसे ये सवाल
कि क्या हम थे उस वारदात के वक्त
हम स्वतः न चले जाएं मूक मुद्रा में
कह सके कि आदमी जब आदमी न था
मूकदर्शक भी न थे आदमी के खोल में!
कह सकें हम सो रहे थे
हम जाग रहे थे
रात-दिन की मर्यादा भूल कर.

***

 उत्कर्ष पटना विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक हैं. हिंदी और उसमें कविता की दुनिया और उसमें पटना जैसे शहर इन दिनों जिन नए चेहरों की वजह से आकर्षक और महत्वपूर्ण लग रहे हैं, उनमें से उत्कर्ष एक हैं. वह अपने व्यास को सतत विस्तृत और वैविध्यपूर्ण करने की आकांक्षा से संचालित हैं. यह कहने की जरूरत नहीं है कि इससे ही व्यक्तित्व और रचना बेहतर होते हैं. उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है.

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