कविताएँ ::
विजय राही

विजय राही

पीड़ाएँ

मेरे जीवन में पीड़ाएँ आईं
ठीक तुम्हारी तरह
जब मैं ख़ुशियों में डूबकर
बर्बाद हो चुका था

तुम भी ऐसे समय आईं
जैसे किसी मृतक की चिता को
आख़िरी लकड़ी देकर
भारी मन से लौट रहे हों प्रियजन—
उसे स्मृतियों में याद करते हुए,
सिर झुकाए हुए
और अचानक कोई आ जाए
अंत्येष्टि में शामिल होने

मैंने भी तुम्हें स्वीकारा
सिर झुकाया
जीवन में कुछ लोग
हमें ऐसे समय मिलते हैं
कि उनके मिलने पर न ख़ुशी होती है
और न मिलने पर न मलाल।

शर्मिंदगी

कोई तो है
जो अँधेरी रात की ओट लेकर
घर के आस-पास घूम रहा है

कोई तो है
जो फ़िराक़ में है कि
कब घर के लोग सोएँ
कब वह घर में घुसे

कोई तो है
जो अँधेरी रात के बावजूद
देख रहा है साफ़-साफ़
किसी तेज़-तर्रार उल्लू की तरह
कि मैं कहाँ सोया हूँ
मेरी पत्नी कहाँ सोई है
मेरी माँ कहाँ सोई है
और कहाँ सोई है मेरी विधवा बहिन

ढेले की आवाज़ आती है मेरे कानों में
जैसे आश्वस्त हो रहा है कोई चोर
डाका डालने से पहले
कि हम अभी सो चुके हैं या नहीं

ये आवाज़ें मेरे कान खड़े करती हैं
पर मैं ठहर जाता हूँ
एक चालाक सिपाही की तरह
कि आज रँगे हाथों पकड़ूँगा उसे
ख़ुद को सही साबित करूँगा

सो झूट-मूट सोने का नाटक करता हूँ

ऐसा लगता है कि वह आ गया है
खड़ा है चौक में सो रही विधवा बहिन के पास
दोनों की खुसर-पुसर से ग़ुस्सा आता है मुझे
लगता है दोनों को मिलन की बेहद ख़ुशी है
ख़ुशी जो मेरे नथुने फड़फड़ा रही है

मैं बग़ल में पड़ी लाठी उठाता हूँ
बहिन की खाट पर ज़ोर से तानता हूँ
देखता हूँ कि बहिन सरणाटे से सो रही है
हालाँकि उसके कपड़े बेतरतीब हो रखे हैं
मैं उसे कम्बल ओढ़ाता हूँ

बहिन नींद में ज़ोर से हँसती है
मैं ज़मीन में धँस जाता हूँ शर्म से
झुँझलाकर कोने में लाठी पटकता हूँ
और आ पड़ता हूँ अपनी खाट पर।

एक कविता यह भी

मेरे पास भी लिखने को बहुत कुछ है
उसने चहकते हुए कहा

तो फिर लिखती क्यों नहीं हो?
लिक्खो ना !
इससे सुंदर भला और क्या होगा!
मैंने ख़ुश होकर कहा

उसने लिखा भी, मुझे पढ़ाया भी
और कुछ-कुछ सुनाया भी
मैंने थोड़ा पढ़ा और कम सुना
लेकिन छपवाने का वायदा किया

फिर एक दिन ‘स्त्री-विमर्श’ पर
अनबन हो गई हमारी
उसने मेरी अनुपस्थिति में
अपना सारा लिखा हुआ जला दिया

और धुआँ-धुआँ होते हुए कहा :
‘‘मैं सब कुछ खो सकती हूँ
पर तुम्हें नहीं खो सकती!’’

माँ-बहिन-पत्नी और बेटी

जब भी चोट लगती
माँ दौड़कर आती
हरी रूँखडी बाँटकर लगाती
रोता तो डाँटती
रोवे मत! बेगो ठीक हो जावेगो!

कभी पैर में काँटा धँसा
धूप में ही बैठ जाती माँ
छाँह करके मेरे ऊपर
लूगड़ी के पल्लू से।

मेरी एड़ी रखती अपने गोड़े पर
और काँटा निकालती हुई कहती
बेटा! नीम की तरफ़ देखते रहो
और बोलते रहो :
‘‘नीम-नीम थारो पत्तो झड़े
म्हारो काँटों कडे़!’’

बीमार हुआ जब कभी तो
बहिन चौबीस घंटे लगी रहती
मेरी दवा-दारू और ख़ातिरदारी में।

जब ब्याह हुआ तो
माँ और बहिन की जगह धर्मपत्नी ने ले ली
हालाँकि वह कभी-कभी यह ज़रूर कह देती
कि आपके छोटे से दु:ख का पेकणा हो जाता है।

अब मेरी बेटी रखती है मेरा ख़याल
बिल्कुल अपनी माँ की ही तरह
और मैं एक बार फिर छोटा बच्चा बन गया हूँ।

शीर्षकहीन

भतीजे की शादी में गई थी
रामप्रताप की माँ
दो साल के अपने पोते के साथ

बुआ ने जाकर छाबड़ी उतारी
भतीजे को खिलाए पान-बताशे
भरी विनायक की भी अंजलि
तेल चढ़े दूल्हे के साथ पोते के भी
लगाई गयी मेहँदी
उसने भी बिन्दौरा खाया दूल्हे के साथ
बारात में दूल्हे का पकड़े रहा हाथ

दुल्हन आई
रास्ता रोकने में लग गई बुआ
नेक में देरी तो होती ही है
नाच होता है, गान भी होता है
कांकड़ डोरे खुलते हैं

बुआ बहू-भतीजे को ढुका रही है
गाँव के देवता

बच्चों के साथ खेलता-कूदता
कुएँ पर चला गया पोता
शाम को कुएँ के पानी में दिखी फूली लाश

एक सैंडिल कुएँ में तैर रहा
आधा डूबा गिलास पानी में चमक रहा
पैंदे में बैठ गई आधी रोटी साबुन की तरह

दादी घर लौटी पछाड़े खाती
पोते की लाश के साथ
माँ तो सुनकर ही बेहोश हो गई
पत्थर हो गया रामप्रताप

दूसरे दिन बहू को होश आया
बहू ने दादी को सँभाला
कि भाग्य यही को मंजूर था
पर बेटे ने बोलना बंद कर दिया माँ से

पोते की मौत का सदमा झेल गई बुढ़िया
सहा नहीं गया बुढ़िया को यह दु:ख
छठे दिन घर से दूसरी अर्थी उठी

रामप्रताप अब माँ-बेटे को साथ-साथ रोता है।

विजय राही हिंदी की नई नस्ल से संबद्ध कवि हैं। वह कविताओं के साथ ग़ज़लें भी लिखते हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

2 Comments

  1. योगेश ध्यानी जनवरी 25, 2021 at 2:19 अपराह्न

    विजय जी की कविताएँ निजी अहसासों को बखूबी व्यक्त करती हैं।उनकी कविताओं में बीच मे आने वाले स्थानीय शब्द कविता को सुंदर बनाते हैं। हार्दिक बधाई विजय जी आपको ।

    Reply
  2. अवनीश कुमार जनवरी 31, 2021 at 8:02 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छी कविताएँ।

    Reply

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