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पंकज चतुर्वेदी

hindi poet PANKAJ CHATURVEDI 1972019
पंकज चतुर्वेदी

गोपालदास ‘नीरज’ का न रहना हिंदी के एक अप्रतिम गीतकार की विदाई है, शायद अंतिम बड़े गीतकार की विदाई। उनके गीतों से हमने जाना कि प्यार कितना मुश्किल है, फिर भी जीवन और समाज के लिए कितना अनिवार्य :

गीत जब मर जाएँगे, फिर क्या यहाँ रह जाएगा
इक सिसकता आँसुओं का कारवाँ रह जाएगा।

प्यार की महिमा पर एक सात्त्विक हठ की मानिंद वह बराबर इसरार करते रहे। संताप और नफ़रत के प्रतिकार के लिए वह प्यार और संवेदना को एक ज़रूरी कार्रवाई मानते थे। किसी के प्रेम में सर्वस्व का बलिदान उनके लिए धर्म-कर्म और अध्यात्म से बढ़कर रहा। यह एक ऐसी अनुभूति है, जिसकी बदौलत दुनिया में कोई भी हमारे लिए पराया नहीं रह जाता :

दुख से सब बस्ती कराहती, लपटों में हर फूल झुलसता
करुणा ने जाकर नफ़रत का आँगन गर न बुहारा होता।
*
चाहे बरसे जेठ अँगारे
या पतझर हर फूल उतारे,
अगर हवा में प्यार घुला है
हर मौसम सुख का मौसम है!
*
तुम्हें देख क्या लिया कि कोई
सूरत दिखती नहीं पराई
तुमने क्या छू दिया, बन गई 
महाकाव्य गीली चौपाई
कौन करे अब मठ में पूजा, कौन फिराए हाथ सुमिरनी
जीना हमें भजन लगता है, मरना हमें हवन लगता है।

लोग धन से प्रेम करते हैं, कोई सोना-चाँदी से, कोई हीरा-मोती से, तो कोई बाहरी शृंगार और प्रसाधन से; मगर सच पूछा जाए, तो आत्मा का आभूषण प्रेम ही है :

धनियों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो!
कोई पहने माणिक-माला
कोई लाल जड़ावे,
कोई रचे महावर मेंहदी
मुतियन माँग भरावे,
सोने वाले, चाँदी वाले
पानी वाले, पत्थर वाले
तन के तो लाखों सिंगार हैं
मन के आभूषण बस तुम हो!

इन्हीं सब वजहों से नीरज का निश्चित मंतव्य रहा कि स्वर्ग वहाँ नहीं है, जहाँ उसकी कल्पना की गई है; बल्कि वह इस धरती पर ही है, बशर्ते कि इंसान, इंसान से प्यार कर सके। इसलिए प्यार को चाहे मानव-सभ्यता में गुनाह ही क्यों न माना जाए, वह इसके लिए हर सज़ा सहने को प्रस्तुत रहे। ‘पहचान’ फ़िल्म के लिए लिखे गए उनके एक मशहूर गीत का यह अंतरा द्रष्टव्य है :

बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ।
मैं बसाना चाहता हूँ स्वर्ग धरती पर
आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर
उस नगर की हर गली तैयार करता हूँ
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ।

शोक और शृंगार का एक ही समय में संश्लिष्ट एहसास कराने वाले वह अनूठे रचनाकार थे। जीवन कितना नश्वर है और इसीलिए प्यार कितना अमूल्य, इसकी कशिश उनकी रचना के महत्त्व को कभी धूमिल नहीं होने देगी। नीरज के गीतों से एक सीख जो बार-बार मिलती है; वह यह है कि मृत्यु का सामना ही नहीं, बल्कि उस पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रकृति ने इंसान को प्यार का उपहार दिया है और इसे न समझ पाना उसकी सबसे बड़ी, आत्मघाती भूल होगी। प्रसंगवश, ‘शर्मीली’ फ़िल्म के उनके गीत का यह अंतरा स्मरणीय है :

खिलते हैं गुल यहाँ, खिलके बिखरने को
मिलते हैं दिल यहाँ, मिलके बिछड़ने को
कल रहे न रहे, मौसम ये प्यार का
कल रुके न रुके, डोला बहार का
चार पल मिले जो आज, प्यार में गुज़ार दे!

इसमें उन्हें महारत हासिल थी कि जीवन के इस बेहद मार्मिक पहलू को वह अत्यंत सहज, विनोदप्रिय और रोमानी ढंग से भी संप्रेषित कर सकते थे और बहुत भाव-भीने, दार्शनिक एवं कलात्मक अंदाज़ में भी। उपनिषदों में ब्रह्म को ही पूर्ण माना गया है; लेकिन नीरज ने उनके बरअक्स प्यार को पूर्णत्व, यानी ईश्वरत्व का दर्जा दिया। वह सृजन को भी अधूरा महसूस करते हैं, मगर साथ ही यह आश्वस्ति हमें सौंपते हैं कि प्यार के बल पर पूर्णता पाई जा सकती है। शायद यह उनकी कविता की सर्वातिशयी उपलब्धि है। प्यार है तो जीवन है, अन्यथा अनस्तित्व का सुनसान है :

बिना तेल-बाती जले उम्र का दिया,
बीच धार छोड़ गया निर्दयी पिया,
आँख बनी बदली बरसात की।
ज़िंदगी दुल्हन है एक रात की॥
*
क्या सोचूँ क्या खोया-पाया ?
किसने ठुकराया-अपनाया ?
हानि-लाभ सब एक बने जब डोला उठा सफ़र का।
मेरा मन दिवला सूने घर का॥
*
कौन शृंगार पूरा यहाँ कर सका?
सेज जो भी सजी सो अधूरी सजी,
हार जो भी गुँथा सो अधूरा गुँथा,
बीन जो भी बजी सो अधूरी बजी,

हम अधूरे, अधूरा हमारा सृजन,
पूर्ण तो एक बस प्रेम ही है यहाँ,
काँच से ही न नज़रें मिलाती रहो,
बिम्ब को मूक प्रतिबिम्ब छल जाएगा।

देखती ही न दर्पण रहो प्राण! तुम
प्यार का यह मुहूरत निकल जाएगा।

नीरज के निकट प्यार ज़िंदगी की एक सुंदर संस्कृति, श्रेष्ठतम मानवीय मूल्यों के प्रति आत्मिक समर्पण और मनुष्य से अविचलित प्रतिबद्धता का दूसरा नाम है। प्यार उनके यहाँ अनन्यता और अमरता की अग्नि में तपकर स्वर्ण के समान पवित्र, अनुपम और कांतिमान् हो जाता है :

कोशिश भी की किंतु हो सका
मुझसे यह न कभी जीवन में,
इसका साथी बनूँ जेठ में
उससे प्यार करूँ सावन में,

जिसको भी अपनाया उसकी
याद सँजोई मन में ऐसे
कोई साँझ सुहागिन दीवा
बाले ज्यों तुलसी-पूजन में

प्यार महज़ भावुकता नहीं, बल्कि हृदय की प्रतिश्रुति है, जिसका संबंध चेतना और निष्ठा से है। यों वह मनुष्य की संवेदनशीलता और सचाई का इम्तिहान है। निष्ठुरता और विस्मृति से नहीं, बल्कि ममता और स्मरणशीलता से उसकी गहनता मालूम होती है। गंभीरता, धैर्य और संघर्ष-क्षमता से ही इस कसौटी पर खरा उतरा जा सकता है :

प्यार करना तो बहुत आसान प्रेयसि!
अंत तक उसका निभाना ही कठिन है।

है बहुत आसान ठुकराना किसी को,
है न मुश्किल भूल भी जाना किसी को,
प्राण-दीपक बीच साँसों की हवा में
याद की बाती जलाना ही कठिन है।

नीरज प्रिय से वाबस्ता अपनी भाव-संपदा को ही प्यार का सरमाया मानते हैं। इसलिए दैहिक सौंदर्य का चित्रण उन्होंने अक्सर नहीं किया है। जहाँ कहीं कुछ संकेत किए हैं; वे बहुत नाज़ुक, ख़ूबसूरत और आकर्षक हैं। ऐसे प्रसंगों में वह रूपकों के ज़रिए अपनी बात कहते हैं और प्रकृति एवं मानवीय सौंदर्य का अद्भुत संश्लेषण घटित करते हैं। इससे पता चलता है कि सकल सृष्टि से विच्छिन्न, प्रिय की सुंदरता की कोई स्वायत्त सत्ता उनके ज़ेहन में नहीं है; बल्कि वह उसका अविभाज्य अंग है। दोनों एक-दूसरे से सतत संबोधित और संवादरत रहकर, एक-दूसरे को अपनी-अपनी आभा से प्रकाशित करते और अधिक सुंदर बनाते हैं। यही वजह है कि जब कभी कवि इस संपूर्ण सौंदर्य से स्वयं को बिछुड़ा हुआ या वंचित महसूस करता है, उसके दिल में एक कसक उठती है। ऐसी रचनाशीलता से नीरज की दृष्टि की समग्रता सत्यापित होती है। दूसरे, वह एक अहम स्थापना करते हैं कि ख़ूबसूरती हमें उन्मत्त या बेहोश नहीं करती, बल्कि सहृदय और होशमंद बनाती है। उससे जुड़कर ज़िंदगी टूटती और बिखरती नहीं, सँवरती और निखरती है :

दिन गए अब बीत शरमीली हवाओं के,
दूर तक दिखते नहीं जूड़े घटाओं के। 
*
अब सही जाती नहीं यह निर्दयी बरसात—
खिड़की बंद कर दो!

यह खड़ी बौछार, ये ठंडी हवाओं के झकोरे,
बादलों के हाथ में ये बिजलियों के हाथ गोरे,
कह न दें फिर प्राण से कोई पुरानी बात—
खिड़की बंद कर दो! 
*
वो नज़र जिस तरफ़ उठी होगी
गिरने वाले सँभल गए होंगे।

नीरज बेहद स्वाभाविक गीतकार थे। गीत जैसे उनकी साँस थे। उसके लिए उन्हें कोई श्रम या प्रयत्न नहीं करना पड़ता था। अपनी साधना की बदौलत वाणी पर यह सहज अधिकार उन्होंने अर्जित किया था और जब वह डूबकर गीत गाते, तो महफ़िल चाहे हज़ारों की हो, गूँजता सिर्फ़ उनका गीत था, बाक़ी सबका अस्तित्व उसमें लय हो जाता था, ख़ुद उनका भी। गीत मानो उनके लिए समूची ज़िंदगी थे—एक ऐसा सात्त्विक नशा, जो दूसरों के भी ज़ेहन पर छा जाता और नतीजतन उन्हें ‘दूसरा’ रहने नहीं देता था।

लोकप्रिय गीतकार के साथ एक मुश्किल यह होती है कि उसे अक्सर ‘रोमैंटिसिज़्म’ या शृंगार से जोड़कर देखा और प्रचारित किया जाने लगता है और इस हल्ले में ज़िंदगी के यथार्थ की उसकी समझ और संजीदगी की अवहेलना होती रहती है। नीरज को इसकी शिकायत थी और ज़रा आत्ममुग्ध लहजे में सही, पर उन्होंने अपने रचना-कर्म का मर्मस्पर्शी सिंहावलोकन किया है—कभी यह कहकर :

और गुनाह किया है कुछ तो
इतना सिर्फ़ गुनाह किया है,
लोग चले जब राजभवन को
मुझको याद कुटी की आई,

आज भले कुछ भी कह लो तुम, पर कल विश्व कहेगा सारा
नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था, पर प्यार नहीं था।

और आप इसे निरा रोमैंटिसिज़्म न समझ लें, इसलिए फिर यह कहकर भी :

पदलोभी आलोचक कैसे करता दर्द पुरस्कृत मेरा
मैंने जो कुछ गाया, उसमें करुणा थी, शृंगार नहीं था!

इस दर्द की बदौलत नीरज ने यह अभिमान भी किया कि उनका अंतःकरण दूसरों की बनिस्बत अधिक विकसित और समृद्ध है :

‘नीरज’ से बढ़के और धनी कौन है यहाँ
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की।

इसी बिंदु पर लगता है कि वह प्यार की अहमियत और अपरिहार्यता पर बराबर इसरार करते रहे और वास्तविक जीवन में उसे असंभव जानकर उसकी करुणा से भी आप्लावित रहे। कहीं-कहीं तो ऐसी मनःस्थिति की बहुत ‘इंटेंस’ व्यंजना उन्होंने संभव की है :

पीड़ा के संग रास रचाया, आँख भरी तो झूम के गाया
जैसे मैं जी लिया किसी से, क्या इस तरह जिया जाएगा!

यथार्थ का एहसास न होता, तो यह शोक कहाँ से उपजता? अहम बात यह है कि इसका उन्हें मलाल नहीं, गर्व है; क्योंकि यह पीड़ा उनके नज़दीक सच्ची मनुष्यता या जन-पक्षधरता और उससे भी अधिक जन से एकात्म होने की निशानी है :

इसीलिए तो नगर-नगर बदनाम हो गए मेरे आँसू
मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नहीं था!

इस सिलसिले में एक और गीत का हिस्सा ग़ौरतलब है :

आँसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा।
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा।
मान-पत्र मैं नहीं लिख सका, राजभवन के सम्मानों का
मैं तो आशिक़ रहा जन्म से, सुंदरता के दीवानों का।
लेकिन था मालूम नहीं ये, केवल इस ग़लती के कारण
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा।

मुझे लगता है कि ‘शृंगार’ और ‘रोमैंटिसिज़्म’ की ख्याति के कोलाहल या अपनी लोकप्रिय स्टार छवि की चकाचौंध में वास्तविक रचनाकार और उसके भीतर का मनुष्य हमसे बिछुड़ जाता है और हम उसे चाहने के नाम पर उसकी एक सुघड़ क़िस्म की उपेक्षा करते रहते हैं। हम यह जान नहीं पाते कि वह इस अत्याधुनिक सभ्यता में हमारे, यानी सामान्य मनुष्य के अकेलेपन का एक बड़ा रचनाकार है :

सुख के साथी मिले हज़ारों ही, लेकिन
दुख में साथ निभाने वाला नहीं मिला।
मेला साथ दिखाने वाले मिले बहुत,
सूनापन बहलाने वाला नहीं मिला।

एक बर्बर पूँजीवादी निज़ाम में—जिसमें हम साँस लेने को विवश हैं—इंसान जब होश सँभालता है, तो यही पाता है कि लगातार लालच, छीना-झपटी, झूठ, लूट, बेईमानी, छल-कपट और हिंसा से उसका सामना है और इसमें उसे वंचित और लहूलुहान ही होते रहना है। यही वजह है कि प्रेम ऐसे परिदृश्य में एक स्वप्निल या असंभव स्थिति है। इस सचाई का जैसा मार्मिक और प्रभावशाली चित्रण नीरज ने किया, हिंदी कविता में वह बेमिसाल है :

मैं जिस दिन सोकर जागा, मैंने देखा,
मेरे चारों ओर ठगों का जमघट है,
एक इधर से एक उधर से लूट रहा,
छिन-छिन रीत रहा मेरा जीवन-घट है,
सबकी आँख लगी थी गठरी पर मेरी,
और मची थी आपस में मेरी-तेरी,
जितने मिले, सभी बस धन के चोर मिले,
लेकिन हृदय चुराने वाला नहीं मिला।
सुख के साथी मिले हज़ारों ही, लेकिन
दुख में साथ निभाने वाला नहीं मिला।

इस सिलसिले में ग़ौरतलब है कि उर्दू शाइरी के प्रभाव को नीरज ने अपनी काव्य-संवेदना में काफ़ी सार्थक ढंग से विकसित किया है। उनका एक शे’र है :

बुझ जाए सरेशाम ही जैसे कोई चिराग़
कुछ यूँ है शुरुआत मेरी दास्तान की।

इसे पढ़कर बरबस ही मीर के मशहूर शे’र की याद आती है :

“शाम से कुछ बुझा-सा रहता है
दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का।”

ज़ाहिर है कि ग़रीबी ही उदासी, बेज़ारी और विपत्ति का सबब है और अंतिम परिणति में भीतर-बाहर के सूनेपन, समय और समाज की निष्ठुरता का भी :

मेरा मन दिवला सूने घर का।
ना कोई भीतर का साथी, ना कोई बाहर का॥
*
रो न मेरे मन, न गीला आँसुओं से कर बिछौना,
हाथ मत फैला पकड़ने को लड़कपन का खिलौना,
मेह-पानी में निभाता कौन किसका साथ!
*
तुम उदयाचल, मैं अस्ताचल, तुम सुखांतकी, मैं दुखांतकी
जुड़ भी गए अंक अपने तो रस-अवतरण कहाँ पर होगा?

नीरज की कविता की एक विशेषता है, रूपकों के माध्यम से कोई मार्मिक आख्यान रचना। यहाँ भी वह इस बात को भुला नहीं देते कि उनके हिस्से में जो निचाट अकेलापन आया है, उसकी वजह अभावग्रस्त जीवन है :

कल रो-रो एक दिया कहता था संध्या से
‘सारा जीवन तो बीत गया जलते-जलते
पर कोई नहीं मिला जिसके स्नेहाँचल में
कुछ जलन मिटा लेता अपनी चलते-चलते।’

संध्या तो कुछ कह सकी न बस रह गई खड़ी
यह कहकर पर चमकी तारों की एक लड़ी—
‘रोता है क्यों रे! धनियों की इस बस्ती में
निर्धन आँसू की कभी सगाई हुई नहीं।’

अंततः कवि कहता है कि इस विषम सामाजिक संरचना में सबसे ज़्यादा जो चीज़ दाँव पर लगी है, वह प्यार है। उसकी हानि तो होनी ही थी। कहानी यह किसी एक की नहीं, कमोबेश सबकी थी। सबसे अधिक विचलित करने वाली सचाई यह है कि इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम बेक़सूर थे! गुनाह तो ख़ुद प्यार को बना दिया गया था, जिसकी सज़ा के लिए हम अभिशप्त थे और इसे सुनने-समझने वाला, इससे संवेदित हो सकने वाला कोई नहीं; क्योंकि शायद कोई ऐसा नहीं, जिसे ये हालात अस्वाभाविक लगते हों :

वो हम न थे, वो तुम न थे, वो रहगुज़र थी प्यार की,
लुटी जहाँ पे बेवजह कि पालकी बहार की!

यह खेल था नसीब का,
न हँस सके, न रो सके,
न तूर पर पहुँच सके,
न दार पर ही सो सके,
कहानी किससे यह कहें चढ़ाव की, उतार की!

फिर भी प्यार में ऐसा औदात्य है; जो पराजय, बिछोह और अवसाद की घड़ियों में भी रौशनी दिखाता है, राह का संबल बनता है। भले मिलन कभी संभव न हो, संसार-सागर को पार करना दुश्वार हो, पर वह बिछुड़े हुए प्रिय के लिए अपनी आत्मा में एक शाश्वत स्वस्ति-कामना सँजोकर रखता है। यहाँ तक कि उसकी निश्चिंतता और सुख के लिए वह उससे अनुरोध करता है कि हो सके तो मुझे तुम भुला देना :

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना।

साथ देखा था कभी जो एक तारा,
आज भी अपनी डगर का वह सहारा,
आज भी हैं देखते हम तुम उसे पर
है हमारे बीच गहरी अश्रु-धारा,
नाव चिर जर्जर नहीं पतवार कर में,
किस तरह फिर हो तुम्हारे पास आना।
भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना॥

हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य किया है—”चक्कर लगाता प्रेमी, बैठे प्रेमी पर सवाया पड़ता है, क्योंकि वह मेहनत करता है।” इस तरह दुनिया में प्यार के नाम पर बहुत सारा कारोबार चलता रहता है। मगर शायद वह कमतर क़िस्म का प्रेम है, क्योंकि उसमें शारीरिकता का तत्त्व काफ़ी मुखर या प्रधान है। इसके विपरीत बक़ौल ग़ालिब, प्यार तो प्रिय का ख़याल है, जो उसकी अनुपस्थिति या अनुपलब्धि में भी संभव है : “बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए।” बिछोह या अभाव की स्थिति में वह ज़्यादा निश्छल, गहन और इंटेंस होता है, जैसा कि किसी दूसरे संदर्भ में वाल्टर बेन्यामिन ने कहा है : “अनुपस्थिति, उपस्थिति की उच्चतम कोटि है।” तभी ग़ालिब के लिए प्रिय का मिलन या ‘विसाल-ए-यार’ असंभव होते हुए भी एहसास के स्तर पर कोई समस्या नहीं थी; क्योंकि उससे वास्तविक, यानी आत्मिक या मानसिक अलगाव कभी था ही नहीं : “जो दुई की बू भी होती, तो कहीं दुचार होता।”

अकारण नहीं कि देह-प्रधान प्रेम की बनिस्बत प्रिय के ध्यान या एहसास के पहलू पर एकाग्र कविता हमेशा ज़्यादा श्रेष्ठ, मूल्यवान् और प्रासंगिक मानी गई। विज्ञान ने भी इसी सच को रेखांकित किया कि प्रेम प्रथमतः और अंततः ‘सेरेब्रल एक्टिविटी’, यानी मानसिक गतिविधि है। फिर उसके लिए शारीरिक उद्यम या प्रयास कैसे स्पृहणीय हो सकता है? उसके बल पर हासिल किया गया ‘प्रेम’ भी कैसे सच्चा, गंभीर और उदात्त होगा? निरी चाहत से न कविता पाई जा सकती है, न प्रेम। हाँ, उसके लिए तपस्या करनी पड़ती है, प्रतीक्षा के अपार धीरज के साथ, यह जोखिम उठाते हुए कि उसकी उपलब्धि नहीं भी हो सकती है। होगी, तो उसमें नैसर्गिकता की आभा होगी, उस न्याय की सुंदरता, जो यह समूची सृष्टि आपके अवदान के मद्देनज़र करती है। उस प्यार के लिए प्रयास नहीं करना होता, वह एक दिन अयाचित आशीष की बारिश की मानिंद आपके अस्तित्व को भिगो देता है। त्रिलोचन के शब्द याद आते हैं :

“बिना बुलाए जो आता है प्यार वही है।
प्राणों की धारा उसमें चुपचाप बही है।”

और इस संदर्भ में त्रिलोचन ही क्यों, ‘गीतों के राजकुमार’ नीरज क्यों नहीं :

दीप कहने से नहीं जलता है,
फूल हँसने से नहीं खिलता है,
प्यार रो-रो के माँगने वाले!
प्यार माँगे से नहीं मिलता है।

‘स्वप्न झरे फूल से’ नीरज के पहले रचना-संचयन ‘आसावरी’ में प्रकाशित शायद वह पहला गीत है, जिससे उन्हें अप्रत्याशित और व्यापक यश मिला। इसकी एक पंक्ति तो आम लोगों की ज़बान पर इस क़दर चढ़ी कि हिंदी का मुहावरा ही बन गई : कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे… इसलिए बाद में उन्होंने इसे ‘कारवाँ गुज़र गया’ शीर्षक से भी प्रकाशित करवाया। अंतर्वस्तु के लिहाज़ से देखें, तो असफलता, दुख, निराशा, स्वप्न-भंग, अजनबीपन, बेचैनी, थकान, गतिरोध, अभाव, घुटन, वंचना, पराजय, असहायता, बिखराव, भय, मृत्यु, पछतावे और बेबसी से जुड़ी न जाने कितनी मनःस्थितियों का समवेत चित्रण इसमें घटित होता है। यों भारतीय उप-महाद्वीप के विषम, रूढ़िग्रस्त और अन्यायपूर्ण सामाजिक परिवेश में एक नवयुवक कितनी अकारथ ज़िंदगी जीने को विवश है, उसका यह आख्यान भी है और उसके सपनों की विफलता का शोकगीत भी। शिल्प की ख़ासियत यह कि मार्मिकता के साथ-साथ दिलचस्पी का तत्त्व अंत तक बरक़रार रहता है। कथा और कविता गोया आपस में घुल-मिलकर गीत बन गए हैं! प्यार और रोज़गार, दोनों के मोर्चे पर कवि के-से प्रतिभावान् एवं उदीयमान साहित्यिक के तल्ख़ निजी अनुभवों का सशक्त साधारणीकरण इसकी अपार लोकप्रियता का सबब बना। छोटी-छोटी पंक्तियों या चरणों के संयोग से निर्मित इस गीत का प्रवाह तेज़ गति से चलता है और अपने कथन के संयम या चुस्ती से पाठक अथवा श्रोता को आकर्षण में बाँधे रहता है। जैसे आँसू के बहुत-से झरने उमड़-घुमड़कर एक-दूसरे से मिलते और करुणा की एक नदी में बदल जाते हैं। जैसे ग़ालिब का मशहूर मिसरा है : ‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले’, वैसे ही इस गीत की अहम पंक्ति है : चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई… गीत आँसुओं में ढल गए, छंद दफ़्न हो गए और साथ के सभी दियों ने धुआँ पहन-पहन लिया… सरीखी ख़ूबसूरत ‘इमेजरी’ यहाँ दर्शनीय है। हर किसी की ज़िंदगी में कभी न कभी वह मक़ाम तो आता ही है, जब उसके सपने टूटते और संबंध बिखर जाते हैं और नतीजतन एक उजाड़ से उसका सामना होता है। बहार होती है, मगर उसके लिए नहीं। उसके हिस्से में सिर्फ़ उस रास्ते की धूल आती है; जिससे सुखी, संपन्न, कामयाब, हृदयहीन और ताक़तवर लोगों का क़ाफ़िला गुज़र गया होता है :

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से;
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे,
कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

हमारे होने की सार्थकता इस बात में होती है कि जितना सुंदर संसार हमें मिला है, उससे अधिक सुंदर संसार की हम रचना कर सकें और दुख की सार्थकता इसमें है कि वह हमें दूसरों के दुख के प्रति ज़्यादा संवेदनशील और उदार बना सके। मगर समस्त शुभाकांक्षा और सत्प्रयत्नों के बावजूद हम जल्द ही इस उदास हक़ीक़त से रूबरू होते हैं कि कुछ ताक़तें हैं, जिनके चलते हमारे ये उदात्त स्वप्न विफल हो गए और उनका शीराज़ा बिखर गया है। लिहाज़ा हम भयभीत और सजल नेत्रों से गोया जीते-जी अपने ख़ात्मे के गवाह बने रहते हैं। इस व्यंजना से समन्वित, उपर्युक्त गीत का शायद सबसे मार्मिक और मूल्यवान् चरण यह है :

हाथ थे मिले कि ज़ुल्फ़ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि ढह गए क़िले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर क़फ़न पड़े, मज़ार देखते रहे,
कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ का जन्म हमारे देश को आज़ादी मिलने के लगभग बाईस साल पहले 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद के महेवा क़स्बे के नज़दीक पुरावली नामक गाँव में एक बेहद सामान्य निम्नमध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। ज़ाहिर है कि उनकी जीवन-दृष्टि, मूल्य-बोध, संवेदना और सौंदर्य-चेतना का निर्माण स्वाधीनता आंदोलन के आदर्शों के आलोक में हुआ। ऊँची शिक्षा के लिए वह कानपुर आए और डी.ए.वी. कॉलेज में 1953 में हिंदी से एम.ए. में उन्होंने प्रथम श्रेणी ही नहीं, बल्कि प्रथम स्थान भी हासिल किया। बाद में वह मेरठ और अलीगढ़ के कॉलेजों में कई वर्ष प्राध्यापक रहे, मगर शुरुआत में आजीविका के लिए विभिन्न ग़ैर-सरकारी और सरकारी संस्थाओं में लंबे समय तक टाइपिस्ट और क्लर्क की छोटी-छोटी नौकरियाँ करने के लिए विवश हुए। ग़रीबी क्या होती है, इसका उन्हें सीधा और तल्ख़ अनुभव था। इसलिए विपन्नता से उपजा संताप और समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता के प्रति गहन क्षोभ उनकी समूची रचनाशीलता में बद्धमूल है। दंश और छटपटाहट का यह एहसास उनके यहाँ दोहरा है, क्योंकि युवावस्था में अपने प्रेम की असफलता के लिए वह आर्थिक अभाव को ही बुनियादी वजह मानते हैं।

फ़िल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए ऐ भाई! ज़रा देख के चलो… शीर्षक मुक्तछंद गीत लिखने का कमाल नीरज ने उस ज़माने में, यानी वर्ष 1970 में किया था; जब इस क़िस्म का प्रयोग एक अनूठी बात थी और इसका साहस अमूमन कोई नहीं करता था। यहाँ उन्होंने दुनिया को सर्कस के रूपक की मार्फ़त बेहतरीन ढंग से समझा है; जिसका रिंगमास्टर, मालिक या संचालक दरअसल पूँजीपति है और उसके हाथ में एक कोड़ा है। चाहे कोई भी हो, इस कोड़े की मार हर किसी को सहनी पड़ती है और रोज़ी की ख़ातिर सर्कस में अपना करतब दिखाना होता है। गीत के शिल्प में यह पूँजीवादी व्यवस्था की क्रूरता का आख्यान है। ज़ाहिर है कि जो जितना साधनहीन और अरक्षित होगा, उसी अनुपात में वह उत्पीड़न के लिए विवश किया जाएगा। पूँजी के इस दुश्चक्र में इंसान को बहुत ऊँच-नीच देखना और यातना का सामना करना पड़ता है; मगर इससे निष्कृति का भी कोई उपाय नहीं। अंततः कवि ने किंचित् दार्शनिक अंदाज़ में कहा है कि ज़िंदगी के सच को गहनता से वही जान पाता है; जो इस संताप को सहता है :

और रिंगमास्टर के कोड़े पर—कोड़ा जो भूख है
कोड़ा जो पैसा है, कोड़ा जो क़िस्मत है
तरह-तरह नाचकर दिखाना यहाँ पड़ता है
बार-बार रोना और गाना यहाँ पड़ता है
हीरो से जोकर बन जाना पड़ता है
गिरने से डरता है क्यों, मरने से डरता है क्यों
ठोकर तू जब न खाएगा, पास किसी ग़म को न जब तक बुलाएगा
ज़िंदगी है चीज़ क्या नहीं जान पाएगा।

सच्ची और प्रभावशाली कविता के लिए पीड़ा बेशक अपरिहार्य है, पर वह जीवन के लिए वांछनीय भी नहीं। ईश्वर का प्रश्न अपनी जगह जायज़ होगा, मगर ज़िंदगी का सवाल उससे कम जटिल और महत्त्वपूर्ण नहीं। कोई रहस्यमयता या भाग्यवाद नहीं, पारलौकिक या आध्यात्मिक नहीं, बल्कि ठेठ भौतिक कारण है इस दुख का :

मेरे घर कोई ख़ुशी आती तो कैसे आती?
उम्र-भर साथ रहा दर्द महाजन की तरह।
कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो
ज़िंदगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह।

जिसमें इंसान के दिल की न हो धड़कन ‘नीरज’
शाइरी तो है वह अख़बार की कतरन की तरह।

यहाँ ब्रह्म के दर्शन का रूपक सिर्फ़ कविता की ज़रूरत के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया है, बल्कि कवि ने उससे लगे-लिपटे वाग्जाल की दुरूहता और निस्सारता पर व्यंग्य किया है। सच तो यह है कि नीरज ब्रह्म की अवधारणा को ही विज्ञानसम्मत, तर्कसंगत या वास्तविक नहीं मानते। चार्वाकों या नास्तिकों के-से अंदाज़ में वह उसे ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि धर्म का धंधा करने के लिए मठाधीशों और महंतों ने न जाने कब से यह तूमार खड़ा कर रखा है। ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ की कथित दार्शनिक मान्यता के बरअक्स वह आधुनिक समय के मंदिरों में किसी ईश्वर के बजाए मनुष्य की प्रतिष्ठा करना चाहते हैं :

यह सब असत्य है तो फिर बोलो सच क्या है—
वह ब्रह्म कि जिसको कभी नहीं तुमने जाना?
जो काम न आया कभी तुम्हारे जीवन में
जो बुन न सका यह साँसों का ताना-बाना।

भाई! यह दर्शन संत-महंतों का है बस
तुम दुनिया वाले हो, दुनिया से प्यार करो,
जो सत्य तुम्हारे सम्मुख भूखा नंगा है
उसके गाओ तुम गीत, उसे स्वीकार करो !

यह बात कही जिसने उसको मालूम न था
वह समय आ रहा है कि मरेगा जब ईश्वर
होगी मंदिर में मूर्ति प्रतिष्ठित मानव की
औ’ ज्ञान ब्रह्म को नहीं, मनुज को देगा स्वर।

‘ईश्वर की मृत्यु’ या विदाई की घोषणा तो उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नीत्शे ने कर दी थी, मगर उसका आधार स्पष्ट करते हुए नीरज इस क्रांतिकारी सच पर इसरार करते हैं कि जीवन या सृष्टि के निर्माण में ब्रह्म की कोई भूमिका नहीं है। इसलिए वह इसी दुनिया से प्यार और इसकी विडंबनाओं के निराकरण के लिए संघर्ष को प्रस्तावित करते हैं। अचरज नहीं कि उन्होंने उपर्युक्त गीत का शीर्षक ‘जगत् सत्यं ब्रह्म मिथ्या’ रखने का साहस किया है। दरअसल, वह संपूर्ण अर्थ में ‘सेक्युलर’ या लोकधर्मी हैं, जो कि इस शब्द का मूलभूत आशय है। ऐसा कवि ही एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में उस भारत के प्रति निष्ठा और संसक्ति रख सकता है, जिसकी आधारशिला ‘सर्वधर्म समभाव’ की जगह ‘सर्वधर्म विवर्जिते’ के सिद्धांत पर टिकी हो। इसकी अनुगूँज उनकी तमाम रचनाओं में मिलती है :

भारत माँ के नयन दो हिंदू-मुस्लिम जान
नहीं एक के बिना हो दूजे की पहचान।
*
दिलों को तोड़ के मंदिर जो बनाकर लौटे
उन्हें बताओ कि वे क्या गुनाह कर आए।
*
जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा
जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा
उससे मिलना नामुमकिन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा
हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा
जब तक मंदिर और मस्जिद हैं
मुश्किल में इंसान रहेगा।
*
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।
जिसकी ख़ुशबू से महक जाए पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।
आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जाके नहाया जाए।
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।

लाज़िम है कि वह नफ़रत और हिंसा के ख़तरे से अवाम और उसके रहनुमाओं को बहुत आत्मीय और प्रभावशाली लहजे में लगातार आगाह करते रहे :

नफ़रत जब तक राज कर रही
सबका सब सरगम मातम है!
*
आग लेकर हाथ में पगले! जलाता है किसे
जब न ये बस्ती रहेगी, तू कहाँ रह जाएगा?

कई बार लगता है कि अपने विरुद्ध सतत आंदोलन और व्यापक बहिष्कार के कारण अँग्रेज़ 1947 में हमें आज़ादी देने के लिए आख़िरकार मजबूर हो गए, मगर इसका प्रतिशोध उन्होंने भारत का बँटवारा करके चुकाया। इसके लिए हमारी मानसिकता की ज़मीन में सांप्रदायिकता का विष-वृक्ष रोपना और उसे लगातार हरा-भरा करते रहना उनकी सुनियोजित कूटनीति थी। वे चले गए, पर उनके विभाजनकारी सोच और रवैए से हमारा पीछा नहीं छूटा, क्योंकि देशी हुक्मरान ने उसे अपना लिया। इसके चलते भारत की सामासिक या गंगा-जमुनी संस्कृति के क्षत-विक्षत होने की तकलीफ़ नीरज की रचनाशीलता में समाई हुई है। यों इसकी शुरूआत तो 30 जनवरी 1948 को ही महात्मा गांधी की हत्या के साथ हो गई थी, जबकि बक़ौल नीरज ‘गोली खाकर प्रेम आख़िरी श्वास ले रहा’ था। हालाँकि वह स्वीकार करते हैं कि स्याही से नहीं, आँसुओं से ही उस दुख की कथा कही जा सकती है; मगर नए संदर्भों और परिस्थितियों में जन-जन में गांधी के जज़्बे को जगाने की ज़रूरत पर भी ज़ोर देते हैं :

है तीस जनवरी आज, न स्याही माँग क़लम,
कुछ लिखना है तो आँसू काग़ज़ पर उतार
ओ चित्रकार! तस्वीर देवता की न खींच
जो मनुज मर गया है उसको दे रूप-रंग
यमुना तट पर सो रहा मसीहा जो अपना
उसको जीवित कर, भर उसमें यौवन उमंग।

इसी रचना में युद्ध-जर्जर मनुष्यता और हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराए जाने से हुए भीषण नरसंहार और विनाश की पीड़ा भी व्यक्त हुई है। आकस्मिक नहीं कि नीरज स्वप्नदर्शी, शांतिप्रिय, स्वातंत्र्यचेता, सौंदर्य-द्रष्टा, उदारमना, विचारक और कवि-हृदय, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन से शोकाकुल होकर ‘हम तुम्हें मरने न देंगे’ शीर्षक गीत लिखते हैं, जिसका उप-शीर्षक है—’कालजयी नेहरू के प्रति’ … इस गीत से मालूम होता है कि नेहरू महज़ राजनेता नहीं; आज़ादी, प्यार, अम्नपसंदी, सौंदर्य और करुणा का मूर्तिमान् रूप थे और कवि यह संकल्प करता है कि इन मूल्यों की महिमा को वह कभी ओझल या अप्रासंगिक नहीं होने देगा :

मौत कितने रंग बदले
तर्ज़ बदले, ढंग बदले,
जब तलक ज़िंदा क़लम है—
हम तुम्हें मरने न देंगे!

खो दिया हमने तुम्हें तो
पास अपने क्या रहेगा?
कौन फिर बारूद से
संदेश चंदन का कहेगा?
मृत्यु तो नूतन जनम है—
हम तुम्हें मरने न देंगे!

तुम गए जब से न सोई
एक पल गंगा तुम्हारी,
बाग़ में निकली न फिर
हँसते ग़ुलाबों की सवारी,
हर किसी की आँख नम है—
हम तुम्हें मरने न देंगे !

तुम नहीं थे व्यक्ति, तुम
आज़ादियों के कारवाँ थे,
प्यार के तुम पासबाँ थे,
अम्न के तुम रहनुमा थे,
यह हक़ीक़त है, न भ्रम है—
हम तुम्हें मरने न देंगे!

कहने की ज़रूरत नहीं कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू अन्य महापुरुषों के साथ-साथ आधुनिक स्वाधीन भारत के—जो कि अपने नज़रिए में अधिकांशतः वैज्ञानिक, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और लोकतांत्रिक गणराज्य बन सका है—बुनियादी वास्तुकार हैं। इनसे लगाव रखने वाला रचनाकार भारत के इसी स्वरूप से प्यार और प्रतिबद्धता से संपन्न है। गांधी के समान ही ग़रीब और वंचित अवाम में नीरज ने भारतमाता के दर्शन किए हैं :

तुम समझ जाओगे क्या चीज़ है भारतमाता
तुमने बेटी किसी निर्धन की अगर देखी है।

इन पंक्तियों से कविवर सुमित्रानंदन पंत की रचना ‘भारतमाता’ के ये मर्मस्पर्शी शब्द सहसा याद आ जाते हैं :

‘‘भारतमाता ग्रामवासिनी।
खेतों में फैला है श्यामल
धूल-भरा मैला-सा आँचल,
गंगा-यमुना में आँसू जल,
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी।”

इस पृष्ठभूमि में नीरज सरीखे संवेदनशील कवि का आहत होना स्वाभाविक है, जब वह देखते हैं कि भारत में आज़ादी के बाद की सत्ताकामी राजनीति ने अपने भ्रष्ट, सांप्रदायिक और आपराधिक चरित्र से किस तरह लोकतंत्र को खोखला बनाया है, सार्वजनिक संपत्ति का अपहरण किया है और निर्दोष जनता को भरसक सताया है। इसके अनेक मार्मिक संकेत उनकी रचनाओं में बिखरे पड़े हैं :

ज्यों लूट लें कहार ही दुलहिन की पालकी
हालत यही है आजकल हिंदोस्तान की।
*
मैंने सोचा कि मेरे देश की हालत क्या है
एक क़ातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई।
*
वो क़त्ल किसने किया है सभी को है मालूम
ये देखना है कि इल्ज़ाम किसके सर आए।

सवाल है कि नीरज समाज में मौजूद आर्थिक विषमता, सांप्रदायिक वैमनस्य और हिंसा, राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण, भ्रष्टाचार, युद्धोन्माद, बेरोज़गारी, अपसंस्कृति और प्रतिक्रियावाद वग़ैरह से विनिर्मित अंधकार से जूझने, उबरने और उस पर विजय प्राप्त करने की क्या रणनीति प्रस्तावित करते हैं? दिवाली के रूपक के सहारे वह कहते हैं कि असंख्य दीपक जलाने से ही नहीं, समस्त नक्षत्र उतर आएँ, तो भी इंसान के हृदय को प्रकाशित नहीं कर सकते। इसका एक ही उपाय है, जैसा कि बुद्ध के अंतिम वचन में निहित है, मनुष्य अपना दीपक स्वयं बने! आत्मा के आलोक से ही दुनिया का सकल अँधेरा मिट सकता है। लोकतंत्र की ही तरह कविता की भी सार्थकता अंतिम नागरिक की आँख के आँसू पोंछने में है। अपार शांति, प्रेम, समता, न्याय, स्वतंत्रता, सदाचार, प्रगतिकामी विचारशीलता, सर्वव्यापक समृद्धि और सत्य की सर्वमंगला प्रतिष्ठा से सृजन और मनुष्यता को सर्वांगसुंदर बनाया जा सकता है :

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज़ आए।

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नीरज को अपने गीतों की सहजता, मार्मिकता और आकर्षण पर भरोसा था। रचनाकार के तौर पर वह इतने मशहूर हो गए थे कि अपनी रचनाओं की सार्थकता, सुंदरता और प्रासंगिकता का ज़रा अभिमान हो आना उनके लिए स्वाभाविक था। उनके शब्दों में रमणीयता और स्मरणीयता का एक ऐसा तत्त्व है कि अपने संगीत से वे हमें मुग्ध ही नहीं करते, हमारे अंतःकरण में स्थायी जगह भी बना लेते हैं। ताज्जुब नहीं कि अपनी अद्वितीयता के साथ-साथ उत्तरजीविता का उन्हें इत्मीनान था :

‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा।

हम जब कभी ख़ामोश, अन्यमनस्क और उदास होते हैं; नीरज के गीतों से हमें वह मधुर आलोक मिलता है, जो ज़िंदगी के मर्म से मुख़ातब होने पर ही मुमकिन है। वह हमसे इतने अभिन्न हैं कि इस बात को ख़ुद भी जानते थे :

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।

पंकज चतुर्वेदी (जन्म : 24 अगस्त 1971) हिंदी के सुपरिचित कवि-आलोचक-अनुवादक हैं। उनके तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। कुँवर नारायण, रघुवीर सहाय और वीरेन डंगवाल पर उनकी पुस्तकें अपनी विवेचनात्मकता, दृष्टि और मार्मिकता के लिए सराही गई हैं। कई पन्नों में समाया उनका बहुत-सा सार्थक काम अभी असंकलित है। वह कानपुर (उत्तर प्रदेश) में रहते हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है। यह आलेख साहित्य अकादेमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ (अंक : 201, जनवरी-फ़रवरी 2019) में पूर्व-प्रकाशित।

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