डायरी और तस्वीरें ::
पारुल पुखराज

पारुल पुखराज

आवाज़ को आवाज़ न थी

एक

कहीं भी पहुँचो लगता है यहीं तो थे बरसों से।

पीछे की हुई यात्रा नदारद हो जाती है।

स्टेशन, ट्रेन, निरंतर बदलते लैंडस्केप सब अनायास ही कहीं विलुप्त हो जाते हैं या फिर किसी और ही कालखंड का हिस्सा प्रतीत होने लगते हैं।

समय का कुछ भान नहीं रहता, कितना बीत गया। एक गर्मी से दूसरी गर्मी, शरद से शरद का फ़ासला तय होता है, लेकिन थकान महसूस नहीं होती; हालाँकि चलते रहने से पाँव में उभर आई दरारें साफ़ दिखाई देती हैं।

जो मिलता है, अपना लगता है—परिचित-सा। बहुत समय बाद शायद सब अपने हो जाते हैं… चर-अचर… दरो-दीवार। किसी आले में हाथ लगाने पर उँगलियों के पोर पर चूना बचा रह जाता है। किसी अलमारी में बुझी हुई लालटेन मुस्कुराती है। बच्चा पूछता है कि आपने कभी इसे रोशन देखा है?

कहीं लिखा था—नदी पार करने के बाद नाव से उतर जाना चाहिए। नाव चाहे कितनी भी सुंदर क्यों न हो।

ख़ुद से पूछती हूँ—मेरा तट कहाँ है, किस डोंगी में सवार हूँ। नाव के नीचे नदी है या रेत।

बीच दुपहर नींद टूटती है तो कोई चाय पीने की हाँक लगा रहा होता है, करवट लेते ही कोई मुँह में कौर रख देता। माँ की हथेली टटोलती है माथा।

प्रश्न अनुत्तरित रह जाए फिर भी नौका छोड़नी होगी एक दिन।

नीचे नदी हो या रेत।

दो

हम न जाने कितनों के प्रेम में पगे हुए थे वह न जाने कितनों से चिढ़ा हुआ था। हमारे प्रेम में चिड़िया थी, चिड़िया के प्रेम में आकाश, आकाश के प्रेम में पृथ्वी, जंगल, नदियाँ और पहाड़। उसकी चिड़चिड़ाहट में दूर-दूर तक सिर्फ़ मनुष्य थे, उन्हीं के ईजाद किए हुए तीर-कमान, उनकी ही शिकार सभ्यताएँ।

हम अपने उजाले से उसका अँधेरा देख रहे थे : वह अपने अँधेरे में लिथड़ा हमारी रोशनी की हदों में बढ़ता चला आता था। न हमें चैन था, न उसे। अँधेरा, उजाला, प्रेम और चिड़चिड़ापन इस कारण बहुत नज़दीक रहने लगे थे—बिल्कुल पड़ोसियों की तरह।

एक रोज़ अपने प्रेम की रक्षा हेतु नए पड़ोस की चाहना मन में सँजोए हम नि:शब्द उसकी खिन्नता व खिसियाहट से कोसों दूर पौ फटने से पहले ही कहीं चले जाना चाहते थे; लेकिन ठीक उसी बेला सारे परिंदे चहचहा कर उड़ने लगे, नदियाँ कल-कल कर बहने लगीं, देवालय में किसी ने अलस्सुबह ही शंख फूँक दिया। इस कलरव से वह पड़ोस भी जाग गया जो अब तक अँधेरा समेटे कहीं दुबका था।

उस दिन हमने जाना कि इतना प्रेम चुपचाप उठाना-धरना हमारे अकेले के बस का नहीं है।

तीन

जो दूसरों के लिए प्रार्थनारत हैं, उनके लिए प्रार्थना कौन करेगा।

दूसरों के वास्ते अश्क़बार रहने वाली आँखों के वास्ते आँसू बहाएगा कौन।

एक सुबह देखते हैं गंतव्य की ओर रेंगने वाला रास्ता तो वही है, लेकिन उस पर हमारे पैरों की हरकत थम चुकी है।

मज़बूत कलेजे वालों का रोना न तो किसी को दिखाई देता है, न ही सुनाई पड़ता है। इस कलाकार दुनिया में लगभग हर दूसरे चेहरे पर बनावटी और विद्रूप हँसी का गाढ़ा लेप है, हालाँकि ख़याल करें तो दिल सबके धज्जी हुए साफ़ दिखाई देते हैं।

मिस डे कहती थीं, ‘‘पक्के रियाज़ी को अंदर का हाल बाहर न आए इसका पूरा बंदोबस्त करने के बाद ही तानपूरा उठाना चाहिए।’’ उनका निज संसार स्वरों के बाहर काफ़ी कष्टप्रद रहा। हमसे मुख़ातिब होते हुए भी, वे हमसे मुख़ातिब न दिखतीं। अंतर्मन के अनगिनत मोर्चों पर घोषित-अघोषित युद्ध जीतते-हारते उन्होंने अपनी समस्त पीड़ाएँ गा लेने में निपुणता हासिल कर ली थी। उनके अंतस् का दु:ख संगीत के साथ ताउम्र इस ख़ूबसूरती से रवाँ रहा कि बावजूद बेहिसाब अंदरूनी मार-काट के वे हमें सम पर पकड़ने से कभी नहीं चूकीं। उनका कहा मौक़ा–बेमौक़ा, गाहे-बगाहे मेरे मन में ध्वनित होता रहा और शायद इसी कारण से मुझे कहीं बहुत यक़ीन है कि दुनिया के तमाम हिस्सों में रचे-बसे उनके शिष्य आज भी अपनी तमाम टूट-फूट के बावजूद जीवन के रियाज़ में बिल्कुल बेताला, बेसुरे न हुए होंगे।

बारिशों की अँधेरी रात बस्तियों के उस पार गुज़रती ट्रेन भीगती चली जाती है। खुली खिड़कियों के पल्लों पर धमक होती है—बहुत हल्की।

चार

कितना भी निस्संग रहा जाए, कुछ जंजाल मनुष्य की घेराबंदी कर उसे हल्कान करने के लिए सदा आतुर रहते हैं।

देख रही हूँ सामने निपट अकेली मक्खी धूप सेंक रही है, जिसे सिर्फ़ अपने ऊपर फैले मनोहर घाम का पता है, रह-रह कर जिसमें वह मग्न मन अलसा रही है जबकि मेरी पीठ पर धूप के अलावा चिंताओं की एक भरी-पूरी पोटली भी खुली पड़ी है। मुझे उस नन्हे जीव से रश्क है, मैं उसकी तरह अपने एकांत में निरी अकेली होने का सुख भोगने में असमर्थ हूँ।

इन दिनों चारो तरफ़ तीखे व विचित्र भाव-भंगिमा वाले मुखौटाधारी अकारण, अविराम नृत्यरत हैं। वे इतना उत्तेजित होकर ढोल पीटते हैं कि शांत बैठा प्रत्येक व्यक्ति उनकी लय में क़दमताल करने के लिए अंततः बाध्य हो जाता है। उनकी मंशा ज़ोर-शोर से हर उस व्यक्ति को अपने ऊधमी नाच में शामिल करने की है जो उनकी आक्रामकता की तरफ़ पीठ किए इस जटिल समय में भी एक अरसे से अपने अति साधारण कोने में राज़ी–ख़ुशी बसर कर रहा है।

नर्तकों के अतिरेक से हर सिम्त मुखौटे बढ़ रहे हैं, नाच बढ़ रहा है, उपद्रव और उससे उपजा कोहराम भी। अकेला न तो कोई छूट रहा है, न छोड़ा जा रहा है।

कुछ देर बाद धूप में मक्खी बचेगी, मक्खी पर धूप।

पाँच

ग़ौर करें तो बात कोई भी नहीं थी करने लायक़, एक अदद आवाज़ थी जिसे सुना जाना था। आवाज़ में जो कुछ भी था मायूसी या ख़ुशी या उम्र का उतार, उसे पढ़ा जाना था। आवाज़ पढ़ने के लिए आँखें नहीं थीं, जैसे गीत गाने के लिए मधुर कंठ। गीत जैसा भी था टूटा-फूटा, मन उसे गा रहा था जो पढ़ रहा था आवाज़ भी। गीत गाने और आवाज़ पढ़ने के बीच कोई संकोच था जो बार-बार अपने बेपरदा हो जाने के भय से काँप रहा था। मगर मन उस झिझक को अदेखा कर शब्दों के आरोह-अवरोह में बिंधा किसी बीते समय में ख़ुद को रमाए हुए था।

मन हर उस चीज़ को अदेखा करने में कुशल होता है जो सहज ही अनुपलब्ध है।

सत्ताईस साल बाद आप उसी शहर में किसी व्यक्ति का पता ढूँढ़ निकालते हैं, कभी जहाँ वह खो गया था। खोते वक़्त कोई नहीं जानता कि समूची दुनिया में अमुक इंसान उसके जीवन से इतने बरसों के लिए लगभग कभी न मिलने जैसा अदृश्य हो रहा है।

चेतना में सदा जीवंत रहने वालों का हमारी वास्तविक दुनिया से लापता होते जाना कभी-कभी बिसरा रहता है, जबकि वे अपने खोते जाने में निरंतर हमारी परिधि से दूर खिसक रहे होते हैं। किसी पल फिर अनायास ही इस फ़ानी दुनिया में ख़ुद-ब-खुद उनकी याद हमारे मन में उनके कहीं होने को उकसा कर खोजने के लिए व्याकुल कर देती है।

वर्षों बाद कोई कहता है—‘‘कहाँ थीं? मैंने भी तुम्हें बहुत याद किया।’’

छह

जीना और जीते चले जाना, यही शर्त है—जीवन की। अन्य कोई विकल्प इसके अलावा है नहीं। कहाँ देख रहे थे, कहाँ चल रहे थे इसका अंदाज़ होते ही देखना और चलना एकरूप हो जाता है। फिर देखने की दिशा में क़दम बढ़ते हैं, पाँव जिधर ले जाते हैं, उधर ही नज़र उठती है।

सुबह हुई किसी छद्म-सी बारिश ने पूरे शहर को आश्चर्यजनक रूप से धो-पोंछ कर चमका दिया, जिसके बाद रोशनी गली-मुहल्लों के आर-पार यूँ पसर गई कि लाख कोशिशों के बावजूद आँख बमुश्किल ही किसी जानिब खुलती थी। बंद पलकों को यूँ महसूस होने लगा जैसे उनके ठहरे हुए नम अँधेरों के बाहर किसी ने तमाम कायनात पर धूप के फ़व्वारे चला दिए हों। ग़ौर करें तो यूँ भी कौन किसी से आँख मिलाकर बात करता है इन दिनों?

सोचती हूँ कि आवाज़ की गर कोई शक्ल होती, और लोग उसे पढ़ने की सलाहियत रखते तो बिना एक दूसरे का चेहरा देखे; सिर्फ़ आवाज़ की तासीर से एक दूसरे के दुःख पकड़ लेते। ख़ुशी की चहक में संग-संग परवाज़ भरते, एक-दूसरे के कंधे पर आश्वासन भरा हाथ रखकर मुश्किल वक़्तों में सहारा बनते।

आवाज़ के नक़्श दूर से ही चीन्ह कर न्योछावर कर देते अपना आप, जैसे पढ़ लेते हैं बारिश की पीड़ा, उसका उछाह, उसकी कराह, हर कही-अनकही—समय-असमय, उसका चेहरा निहारे बिना।

बारिश की शक्ल कैसे निहारें? बारिश को तो इक घड़ी निहारते ही आँख भर आती है। समूची दुनिया हो जाती है—डब…डब…। बारिश को देख नहीं सकते। बारिश को सुन सकते हैं। बारिश को देखना भरम है।

बारिश के नक़ूश बनते-बिगड़ते रहते हैं, उसका कोई मुकम्मल चेहरा नहीं होता।

पारुल पुखराज हिंदी कवयित्री, गद्यकार और छायाकार हैं। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखें : उड़ जाएगा वसंत भी

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