मौजूदा हिंदी कविता से जुड़े कुछ अनुभव ::
अंचित

ANCHIT poet
अंचित

‘‘समय अपने आपे से बाहर है.’’
‘हैम्लैट’ में शेक्सपीयर

‘‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’’ अगर मुक्तिबोध का फेसबुक अकाउंट होता, तब शायद यह सवाल पूछने की हिमाकत वह नहीं कर पाते… क्योंकि सोशल मीडिया और उसके असर के बारे में कोई पक्की राय अभी भी किसी अकादमिक या बौद्धिक विमर्श के रूप में कम से कम अपनी भाषा में तो बनती नहीं दिखती है. यहां इतने सारे लोग हैं, हिंदी भाषा की दुनिया से जुड़े लगभग सभी महत्वपूर्ण मत किसी न किसी तरह यहां जगह बना ही लेते हैं. जाहिर है, मतभिन्नता होगी. कोई किसी दिशा में सोचेगा, कोई किसी और दिशा में. यहां तक समस्या नहीं है, समस्या आगे है.

यह बात ध्यान में रखने वाली है कि बहुत कुछ औसत है जो यहां शरण पाता है. यह माध्यम का लोकतंत्र तो है, लेकिन यह किसी तरह के विमर्श या लिखे के संपादन की प्रासंगिकता को खत्म कर देता है. यहां हर आदमी किसी न किसी तरह से जज बना हुआ है. अमूमन सब एक दूसरे की बुराई करते रहते हैं. आलोचना-समीक्षा नहीं, बुराई. अपनी राय आखिरी, अपने खेमे का सच आखिरी… कमोबेश यही हालत है.

नए वाले कवि का दिमाग कहां फंसता है? संभव है कि ऐसे कवि जिन्हें आपने किताबों में पढ़ा हो, जिनकी कविताएं आपको मुंह-जबानी याद हों और जिनके लेखन से आप भावनात्मक स्तर पर जुड़े हों, वे आपको यहां कुछ तुच्छ कारगुजारियों में लिप्त मिल जाएं.

जब आप शुरू करते हैं, जब आप विमर्शों को नहीं जानते, जब आप भाषा को लेकर उतना तैयार नहीं होते… तब आप भाषा के बगल में होते हैं और उसके और नजदीक ले जाने वाले व्यक्तियों को आप नायक मानकर आगे बढ़ते हैं. लेकिन सोशल मीडिया में यह एक क्षण में घटित होता है कि इस प्रकार के नायकत्व से आप प्रभाव ग्रहण करना बंद कर देते हैं.  सोशल मीडिया इस नायकत्व को लेकर छोटी-मोटी भ्रांतियां भी नहीं रहने देता. एक असर तो यह है कि नया लिखने वाला जो कविताओं की संवेदना लिए आकांक्षाएं पालता है, वह ठगा हुआ महसूस करता है… पर सब नहीं. कुछ यह खेल सीख जाते हैं. कुछ पहले से कविता-आचार-विचार-व्यवहार में प्रवीण होते हैं. अमूमन आप थोड़ी मेहनत करेंगे तो पाएंगे कि ऐसे लोग खासे लोकप्रिय होते हैं— वरिष्ठों के आगे अपना सब कुछ न्योछावर कर देने वाले, यहां तक कह देने वाले कि उनकी जमीन केवल उन्हीं से बनी है. बहरहाल, यह छोटी बात है. बड़ी बात यह है कि संपादन की अनुपलब्धता के कारण ‘स्तर निर्धारण’ अब साहित्य में भी वैसे ही होने लगा है जैसे राजनीति में— लोकप्रियता के आधार पर. जैसे राजनीति केवल सोशल इंजीनियरिंग है (कोई भी पार्टी हो), वैसे ही कविता की भी सोशल इंजीनियरिंग की जा सकती है. पैमाना वही कि लोग पसंद कर रहे हैं.

यह उत्तर आधुनिकता का संभवतः सबसे वीभत्स स्वरूप है, जो साहित्य-समालोचन में उभरकर आया है. अंग्रेजी साहित्य से होते हुए इसने हिंदी में भी अपनी पैठ बनाई है. ‘सत्योत्तर’ का असर जब बाहर स्वत: माना जाने लगा है और यह सोचा जाने लगा है कि आगे क्या, सुविधा आधुनिकोत्तर का लबादा ओढ़े यहां आराम से पड़ी हुई है. मुझे लगता है कि राजनीति में केंद्र को डिसेंटर करना और लिखे हुए साहित्य (साहित्यिकों नहीं) के लिए मानक बनाना दो अलग चीजें हैं. मुझे बार-बार अल्थ्यूसर और ग्राम्शी याद आते हैं और हिंदी की जनता है कि उन पर ध्यान ही नहीं देती. यहीं सोशल मीडिया पर मौजूद सतहीपन जीत जाता है. लाल रंग का चश्मा पहने हुए, बहुत ऊबड़-खाबड़ भूमि भी सपाट दिखाई दे जाती है. बाकी तो खैर आंख के डॉक्टर हैं, आप बात करने जाएं तो आप अंधे गिना दिए जाएंगे.

क्या टिकेगा? यह सवाल नहीं है. नया कवि क्या पढ़े और अच्छा पाठक कैसे बने… इस बारे में कोई राय नहीं बन पाती. ‘नई हिंदी’ बाजारप्रिय, सोशलमीडियाप्रिय होती जाती है और पाठक उसी को भाषा का चरम मान लेता है… इसमें नुकसान किसका है?

इस स्थिति में एक और सवाल है जिसको आधुनिकोत्तर दौर ने बहुत उलझा दिया है. समता— शायद आधुनिकोत्तर समय की पहली मांग है और यह उचित भी है. लेकिन समता के साथ, पारिभाषिक सवाल उलझ जाते हैं. कुछ नया नहीं है, यह मानकर चला जाता है और ‘प्रभावित’ साहित्य को भी जगह दी जाती है. इसका एक उदाहरण देता हूं. इधर पटना में ‘जन संस्कृति मंच’ के एक कार्यक्रम में एक कवि आए— ब्रजेश यादव. उन्होंने यहां कई कविताएं सुनाईं— कुछ अवधी में और कुछ हिंदी में. उनके सुनाए में अधिकांश जनगीत थे और उन्होंने स्वीकार किया कि वह रमाशंकर ‘विद्रोही’ से प्रभावित हैं. लेकिन उनके सुनाए में एक कविता बिल्कुल रफ़ीक शादानी की कविता ‘जियो बहादुर खद्दरधारी’ से प्रभावित थी. यह ध्यान देने योग्य है कि इस पूरे पाठ के दौरान उन्होंने कहीं रफ़ीक शादानी का नाम तक नहीं लिया. बहरहाल, शादानी की यह कविता बहुत दूर तक जाती है, लेकिन इसके असर में संभव हुई पटना पहुंचे कवि की पहुंच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक जाकर ठहर जाती है. (यह कह देने के बहुत खतरे हैं, लेकिन कहने की जरूरत भी है.) इन दोनों कविताओं के फॉर्म और यहां तक कि वाक्यांश भी एक से हैं. क्या यह स्वतंत्र रूप से कविता है या फिर पैरोडी है? फिर भी अगर यह — जैसा कि आमतौर पर वामपंथ में माना जाता है — क्रांति के रास्ते में एक टूल भर है, तो फिर इस पर कविता/गीत की मुहर लगाने और व्यक्ति को कवि कहने की जरूरत क्यों है?

आखिर नया कवि किसको कविता माने? आत्ममुग्धता के बारे में नया कवि क्या धारणा बनाए? नए कवि का बिलीव-सिस्टम विचारणीय है. विचारधारा से इतर दुनिया भर में एक खास तरह की पॉप्युलिस्ट मीडियाक्रिटी उभार पर है. इसके असंख्य उदाहरण हर जगह मिल जाएंगे.

यहां से एक और दिशा में चला जा सकता है. उसी सभा में विद्रोही-प्रेरित कवि से प्रश्न किया गया कि उनकी कविताओं में जो ‘ब्राह्मण’ शब्द आता है, इससे उसका क्या आशय है. इस पर उनका उत्तर उस वैचारिक शून्यता की तरफ ले जाता है, जो कि सोशल मीडिया पर भी पूरी तरह व्याप्त है. कवि उत्तर देता है कि ‘ब्राह्मण’ शब्द से उसका आशय एक समुदाय-विशेष के लोगों से है. सोचिए! हिटलर का लेखन भी बहुत उत्कृष्ट श्रेणी का था और उसकी आपत्ति भी समुदाय-विशेष को लेकर ही थी. हां, फर्क यह था कि उसके पास सत्ता थी. बहुत संभव है कि कवि ने मजाक किया हो, उसने यह सोचा हो कि वह ‘अपने कामरेड्स’ के बीच ही है. लेकिन न सिर्फ इस जातिवादी टिप्पणी से भारतीय मार्क्सवाद की चूलें हिलाने का एक मौका दिया जा सकता है, बल्कि ब्राह्मणवाद के खिलाफ हर विमर्श स्वत: कमजोर हो जाता है.

खैर, यह एक उदाहरण भर है. मुद्दा यह है कि नया कवि अपना बिलीव-सिस्टम कैसे बनाए. कुछ और उदाहरण देखिए. मेरी फेसबुक की मित्र-सूची में एक मित्र हैं, जो ब्राह्मण हैं और खुद को मार्क्सवादी मानते हैं. वह कहते हैं कि कविता का बस लोकपक्ष होता है, यानी समाज-सुधार. जाहिर है कि यह भी बहुत पॉप्युलिस्ट स्टैंड है. इस स्टैंड के साथ उनका खेमा मज़बूत है. लेकिन यह मार्क्सवादी मित्र हर जगह गुलदस्ते भेजते फिरते हैं — घोर संघी साहित्यकार को भी और उसके धुर विरोधी को भी — एक ही मसले पर अलग-अलग विरोधाभासी टिप्पणियों पर भी.

इस प्रकार के कई नमूने हैं, लेकिन एक और उदाहरण देखिए. कठुआ-कांड और दैनिक जागरण में उसकी फेक न्यूज का मुद्दा… यह बहुत संवेदनशील मसला था. दो लेखकों के बीच हुए विवाद में मामला कोर्ट तक पहुंच गया है. एक को मैं फॉलो करता हूं. वह मित्र-सूची में नहीं हैं. दूसरे को मैं फॉलो नहीं करता, पर पता नहीं कैसे वह मित्र-सूची में हैं. यहां सही-गलत की बात नहीं है. एक कवि ने कोर्ट से नोटिस भेजने और दूसरे ने मिलने की बात पर पोस्ट लगाई और अपने पक्ष के समर्थन में तर्क दिए. मजेदार यह है कि दोनों पोस्ट पर कई कवि लाइक करते नजर आए. यहां प्रश्न यह है कि ये कवि आखिर हैं किसके समर्थन में? उनका अपना वैचारिक दृष्टिकोण क्या है? क्या वे साहित्य के मायावती, मुलायम और लालू हैं?

ये सूचियां बेहद लंबी हैं. पटना के भी दूसरे-तीसरे-चौथे शनिवार वाले मार्क्सवादी, समाजवादी दोनों तरफ मिल जाएंगे. हालांकि जिस स्तर की मीडियाक्रिटी से पटना इन दिनों जूझ रहा है, वह भयावह है. यह दुखद है कि इस पर विमर्श लगभग नहीं है. ऐसे में एक नए कवि को सोचना चाहिए कि वह दरअसल निर्दलीय चुनाव लड़ने उतरा है. उसके पास केवल उसका किया हुआ काम है. जब इतना तय कर लिया फिर आगे क्या सोचना.

कविता को लेकर, आलोचना को लेकर, साहित्यिक समाज को लेकर और अपने बिलीव-सिस्टम और उसमें निहित शुचिता को लेकर कई रास्ते होते होंगे. मुझे टी.एस. एलियट का रास्ता कुछ सही लगता है. वह परंपरा को लेकर अपनी समझ की बात भी करते हैं. कवि को क्या काम करने हैं, इसे लेकर भी उनका नजरिया साफ है और यहां तक कि कवि और कवि के आलोचना-कर्म को लेकर भी वह स्थिति स्पष्ट करते हैं. लेकिन मामला इतना सीधा नहीं है. एलियट यहूदियों के खिलाफ एक स्टैंड रखते थे. जनरल डायर के समर्थन में लंदन में उन्होंने पैसे जमा करने चाहे थे. वह बाद में एक बहुत धार्मिक व्यक्ति हो गए. उन्होंने चर्च के लिए और संतों की याद में कुछ लिखा भी. मुझे उनकी कविताएं अच्छी लगती थीं. मैं बी.ए. के पहले साल में था. अरुण कमल कविता का इतिहास पढ़ाया करते थे. मैंने उनसे पूछा कि मुझे एलियट की कविताएं तो अच्छी लगती हैं, लेकिन मुझे वह आदमी ठीक नहीं लगता… मैं क्या करूं? उन्होंने कहा कि जो चीज अच्छी लगे उसकी बड़ाई करनी चाहिए और जो बुरा लगे उसकी आलोचना.

यहां आकर सवाल और जवाब दोनों उलझ जाते हैं कि क्या विचारधाराएं, विमर्श और व्यक्ति इसके लिए प्रस्तुत हैं?

***

अंचित हिंदी कवि-गद्यकार और अनुवादक हैं. अंग्रेजी में भी लिखते हैं. पटना में रहते हैं. उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है. इस प्रस्तुति की फ़ीचर्ड इमेज स्पैनिश फिल्मकार पेद्रो अल्मादोवोर की है और इसे निगेल पैरी ने खींचा है.

1 Comment

  1. Nitesh दिसम्बर 1, 2018 at 9:54 पूर्वाह्न

    नया कवि शायद इन चरणों से होकर गुजरता है
    1. वो कविताएँ पढ़ता है/सुनता है
    2. उनसे प्रभावित होता है
    3. उस कवि के लेखन से प्रभावित होता है
    4. और फिर जब वो कविता लिखता है तो उसमे कहीं उन कविताओं का प्रभाव दिखायी पड़ता है… तो ऐसे में वो कवि है?

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