गद्य ::
जे सुशील

जे सुशील

हाँ से कहीं अधिक ताक़तवर है न कहना

जब मिलिट्री के हेलीकॉप्टर उस बस को उठाकर ले जा रहे थे तो हवा में लटकती बस के साथ दुनिया के कई लोगों का बहुत कुछ उस हवा में रह गया होगा। ये वे लोग होंगे जिनका कुछ उस दिन भी कहीं हवा में रह गया होगा, जब उन्होंने फ़िल्म देखी होगी—Into the Wild.

यह फ़िल्म अमेरिका के इक्कीस साल के एक युवक के बारे में है जो अपनी ख़ुशहाल दुनिया छोड़कर चला गया था—अलास्का के बर्फ़ीले जंगलों में रहने के लिए। उन जंगलों में उसे एक बस मिली—खंडहरनुमा—जिसमें वह रहने लगा। शिकार करता, खाना खाता, अपनी डायरी लिखता हुआ वह युवक सत्तर दिनों के बाद भूख से मर गया और मरने के दिन तक डायरी लिखता रहा।

कुछ महीनों बाद इलाक़े में ट्रेकिंग करने आए एक समूह को इस युवक की लाश मिली जिसके बाद यह बस दुनिया भर में शहर और समाज के कोलाहल से भागने वाले लोगों के लिए एक प्रतीक-सी बन गई। पिछले दिनों वह प्रतीक चला गया। लोग चकित हैं कि कोई लड़का क्यों घर-बार छोड़कर जंगल में रहने चला जाता है? क्यों दुनिया भर के लोगों को उस एक फ़ैसले में अपना फ़ैसला दिखता है? क्यों यह कहानी लोगों को छू गई? उस लड़के की डायरी पर बाद में एक किताब लिखी गई और उस किताब के आधार पर फ़िल्म बनी— Into the Wild.

सब कुछ छोड़कर चला जाना मनुष्य को क्यों इतना सुंदर लगता है? शायद हम सब वह कर नहीं सकते। शायद हम सब करना चाहते हैं। हम कर नहीं पाते। उस लड़के ने किया तो वह हमें आकर्षित करता है। इसे ऐसे देख सकते हैं। वह कोई असफल लड़का नहीं था। वह कॉलेज पूरा कर चुका था। आगे अच्छे कॉलेज में एडमिशन था। वह चाहता तो पढ़ता, नौकरी करता और हमारी-आपकी तरह दुनिया नाम की मशीन का हिस्सा बन जाता। पर उसने तय किया कि वह ऐसा नहीं करेगा। तय करना महत्त्वपूर्ण नहीं था। महत्त्वपूर्ण था—‘न’ कहना, एक ऐसी व्यवस्था को जिसके केंद्र में ऐसी लालसाएँ हैं जो कभी ख़त्म नहीं होंगी। हम सब जीवन में जीवन भर न कहने की हिम्मत ही तो नहीं जुटा पाते हैं।

ख़ुद को खोजना कोई नया कर्म तो है नहीं। उस लड़के ने ख़ुद को खोजने की कोशिश की—प्रकृति के साथ रहकर। अमेरिकी दार्शनिक हेनरी थोरो भी ऐसा कर चुके हैं। दो साल तक वह एक तालाब के पास रहे। सभ्यता यानी शहर या आबादी से कुछ किलोमीटर दूर अकेले निर्जन स्थान पर रहते हुए उन्होंने गुना-बुना और बाद में एक किताब लिखी—‘वाल्डन एंड अदर राइटिंग्स’। भारत में ऋषि-मुनि ऐसा करते ही रहे हैं, लेकिन कहते हैं न  हिंदी में कहो कि सवाल है—’मैं कौन हूँ’ तो लोग मज़ाक़ में लेते हैं। यही सवाल अँग्रेज़ी में आए कि Who am I, तो न केवल सुनने में कमाल का लगता है, बल्कि बहुत दार्शनिक भी महसूस होता है। रमण महर्षि ने यही सवाल रखा था हम सबके सामने। वह किताबों को सीमित मानते थे और कहते थे कि शांत मन से बिना बोले बैठकर अगर यही सवाल पूछा जाए ख़ुद से बार-बार कि ‘मैं कौन हूँ’ तो उसी में मुक्ति निहित है।

अमेरिका में किसी का घर छोड़कर जंगलों में चले जाना कोई नई बात नहीं है। छह महीने पहले एक परिवार से मिलना हुआ। अच्छे-ख़ासे-पढ़े-लिखे-बेहतरीन-सफल लोग। उनका बड़ा बेटा कुछ साल पहले अच्छी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई-लिखाई छोड़कर कहीं चला गया। वह  महीने बाद मिला—ख़राब हालत में—भूखा-प्यासा। वह लड़का अब अपनी गर्लफ़्रेंड के साथ रहता है और एरोप्लेन में नहीं चढ़ता। उसका मानना है कि इससे उसके कार्बन फ़ुटप्रिंट कम होते हैं। वह एक ही शहर में रहते हुए अपने माँ-बाप से मिलने के लिए साइकिल से आता है। उसने पिछले पाँच साल में कोई यात्रा नहीं की है। वह पढ़ना नहीं चाहता, जबकि यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अब भी मानते हैं कि कंप्यूटर की पढ़ाई में वह लड़का अभी भी अलग क़िस्म का काम कर सकता है। वह कभी-कभार अपने प्रोफ़ेसरों से मिलता है तो उनका मज़ाक़ उड़ाता है कि वह मशीन का हिस्सा हैं।

उसने तय किया है कि वह दुनिया नाम की मशीन का पुर्ज़ा नहीं बनेगा। न कह देना हिम्मत का काम है। ज़िंदगी को न कहना भी। हम कभी यह नहीं जान पाते हैं कि किसी ने ज़िंदगी को अगर न कहा है तो उसके क्या कारण रहे होंगे। हम जानना भी नहीं चाहते हैं, जैसा कि ऑस्कर वाइल्ड ने लिखा है : Public have an insatiable curiosity to know everything except what is worth knowing.

दुनिया में कई ऐसे लेखक हैं जिन्होंने दो-तीन किताबों के बाद कई साल की चुप्पी ओढ़ ली और फिर कभी कुछ नहीं लिखा। जे. डी. सैलिंगर से लेकर रिमबॉड हों या फिर जुआन रुल्फ़ो से लेकर बॉबी बेज़्लान हों। लोग लिखने को भी न कर सकते हैं, जो ख़ुद को व्यक्त करने और समझने का एक बेहतरीन माध्यम माना जाता है। वह भी असफल होकर नहीं, बल्कि सफलता के चरम शिखर पर होकर। सैलिंगर की प्रसिद्धि से कौन इनकार कर सकता है या फिर रुल्फ़ो की ‘पेड्रो परामो’ की मिथकीय सफलता को कौन नहीं जानता है। बॉबी बेज़्लान जिन्होंने एडल्फ़ी पब्लिकेशन हाउस स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और जिनके लिखे का इंतज़ार कई जाने-माने लोग कर रहे थे। बॉबी के लिखे नोट्स बाद में शायद उनके मरने के पाँच साल बाद छपे—Notes without a Text.

फ़्रांस के लेखक निकोलस चैम्फ़ोर्ट ने ग़लत नही लिखा था : “लगभग हर आदमी ग़ुलाम है क्योंकि उनमें न कहने की क्षमता नहीं है।”

चैम्फ़ोर्ट का सब इंतजार करते रहे कि वह कभी एक उपन्यास लिखेंगे, लेकिन उन्होंने कभी नहीं लिखा वह उपन्यास जिसका दुनिया को इंतज़ार था। उन्होंने अजीब लगने वाली सूक्तियाँ लिखीं और उन्हीं सूक्तियों की किताब। वह सफल रहे और बहुत जबरदस्त रूप से सफल रहे। उनके नाटक देखकर लुई सोलहवें रो पड़ते, लेकिन वह जानते थे कि दुनिया कैसी है। वह कहते थे : ‘‘मनुष्य एक मूर्ख प्राणी है, अगर मेरे आधार पर फ़ैसला सुनाया जाए तो।’’

उनसे लोग लगातार पूछते रहे कि आप लिखते क्यों नहीं? आप छपते क्यों नहीं? उन्होंने एक छोटा-सा लेख लिखा था जिसमें सूक्तियों की तर्ज़ पर इस सवाल के जवाब दिए गए थे। उन कई जवाबों में से मैं अपने पसंदीदा दो जवाब लिख रहा हूँ :

  • क्योंकि मैं पढ़े-लिखे लोगों की नक़ल नहीं करना चाहता जो गधों की तरह एक ख़ाली नाँद के सामने पैर पटकते और एक दूसरे से लड़ते रहते हैं।
  • क्योंकि जनता को सिर्फ़ ऐसी सफलता में रुचि है जिससे वह ख़ुश न हो सके।

लेखन में ही क्यों आर्ट की दुनिया भी ऐसे लोगों से ख़ाली नहीं है, जिन्होंने आर्ट की दुनिया को ही न कह दिया और कालजयी हो गए। मार्शल डुशैंप को कौन नहीं जानता है। छब्बीस साल की उम्र में ही आर्ट की दुनिया में तहलका मचा देने वाले इस कलाकार ने अमेरिका में एक बड़ा शो करने के बाद आर्ट की दुनिया को अलविदा कह दिया। वह वापस पेरिस चले गए और शतरंज खेलने लगे। लंबे समय तक उन्होंने न तो आर्ट बनाया और न ही आर्ट के बारे में बात ही की। आज दुनिया के कम ही कलाकार होंगे जिन्होंने डुशैंप से प्रेरणा नहीं ली है। लेकिन ऐसा करने वाले वह अकेले आर्टिस्ट नहीं हैं।

ताइवान के परफॉर्मेंस कलाकार तेइचिंग हे ने पाँच बड़े टाइम बेस्ट परफ़ॉर्मेंस किए जिसमें एक परफ़ॉर्मेंस में वह साल भर तक हर घंटे अपनी तस्वीर खिंचवाते—एक घड़ी के साथ। इसका नाम रखा गया—Doing Time. सोचकर देखिए कि एक आदमी पूरे एक साल तक एक घंटे से ज़्यादा सो नहीं रहा है, क्योंकि उसे परफ़ॉर्म करना है, और वह डॉक्यूमेंट हो रहा है। तेइचिंग ने ऐसे कई परफ़ॉर्मेंस किए। एक कमरे में साल भर तक बंद रहने से लेकर, एक दूसरे कलाकार के साथ एक साल तक छह फ़ीट की रस्सी में बँधे रहने जैसे परफ़ॉर्मेंस के बाद 1986 में उन्होंने तेरह साल का ब्रेक लिया। जिस दौरान उन्होंने तय किया कि वह न तो किसी आर्ट शो में जाएँगे, न आर्ट देखेंगे और न ही आर्ट की दुनिया के लोगों से मिलेंगे।

तेइचिंग न्यूयार्क में रहते हैं और आर्ट की दुनिया के सबसे बड़े हस्ताक्षरों में से एक होने के बावजूद वह जल्दी किसी आर्ट शो में नहीं दिखते हैं। उन्होंने भी आर्ट की चमकती-दमकती मशीन का पुर्ज़ा होने से इनकार किया है। न कह दिया है। न कहना एक महत्त्वपूर्ण क्रिया है। ऐसा मुझे लगता रहा है।

जब मैं दफ़्तरों में काम करता था तो न कहने को नकारात्मक माना जाता था और कहा जाता था कि हमेशा हाँ कहिए या फिर नई बात सुझाइए। मैं कई सालों तक हाँ और न की रस्साकशी में झूलता रहा हूँ और अब लगता है कि हाँ से कहीं अधिक ताक़तवर है न कहना।

जे सुशील से परिचय के लिए यहाँ देखें : मेरी स्मृतियाँ ख़त्म हो रही हैं

1 Comment

  1. urmila dhaundiyal जुलाई 4, 2020 at 8:01 पूर्वाह्न

    waqayi pyara likha hai

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