गद्य ::
प्रमोद सिंह

प्रमोद सिंह का आत्म-चित्र

 इतना सच था कि सपना था

 ‘’और सपना था इसलिए उसके सच होने की उम्‍मीद बची हुई थीजैसे तुम्‍हारे हाथों मरकर, ओ ज़िंदगी, फिर ज़िंदगी जी लेने की उम्‍मीद बनी जाती है

ताहिरे बुलकान, सलाये सेले बुरशां1”जलती पगडंडियों पर तुम्हें खोजते हुए।’’ स्थान व काल : अज्ञात। से

संयोग ही रहा होगा कि मनमोहिनी के सुर में डूबा ख़ुद से छूटा निकल भागा था। इतने दिन आवारा इस ठाँव से दूर के उस गाँव, धूल-धक्‍कड़ व फक्‍कड़पने के वीराने, दीवाने सैरों व सुहाने बहकावन लोकों में भटकता फिरा था। सचमुच जिए थे वे दिन, मैंने ही जिए थे? याकि लंबी नींद से जागे के अस्‍फुट, अधूरे चित्र हैं, अपने अभाव भरे जीवन की कीच-काई को भूलने के दबाव में ख़यालों की रंगीनियों से रँगकर, विरलपने की समानांतर रुमानी फ़ंतासी गढ़ रहा हूँ? फिर बहक रहा हूँ?

जो था जीवन का खुरदुरा, तकलीफ़ भरा यथार्थ था, मंदारिन मंगोल समय व इतिहास-सताई, प्रेम-नहाई चीनीकुमारी कोई गाओपिंग नहीं थी। न गोद की उसकी दुलारिन छुटंकी नानान, जिसके नन्‍हे नाख़ूनों के घाव नाक व गाल पर चटख तितलियों-सा लौहवर्णी गौरव-चिह्नों की तरह सजाए मैं चहकता फिरता, हँसते-हँसते रोता था? उस चार बित्‍ते भर की ज़रा-सी बच्‍ची की संगत के मीठे से दिल इतना ख़ुश होता कि आँखें नम हुई जातीं! इतने अर्से बाद अब भी उचककर, बीच नींद चौंककर जागता रहा हूँ, कि उनींदे भरभराए कोमलता के भार, भद् छाती पर गिरने का अभी इस गुज़रे पल जो विरल एहसास हुआ उस अतुलनीय सुख का इस फैले विराट विश्‍व में अन्‍य दूसरा कोई वाहक नहीं, सिर्फ़ व सिर्फ़ मेरी नन्‍ही नानान ही होती। फुसफुसाकर किसी ने पुकारा था नाम, गाओपिंग ही थी, समाज से, स्‍वयं ख़ुद से छुपाकर, मुझे पुकारती आई थी, मगर वास्‍तविक नहीं थी?

मन में दिखता है : तंग सीढ़ि‍यों के पीछे छिपी सलेटी गलियों के धुँधले विस्‍तार; लकड़ी का कोई पुराना चूल्‍हा, जाने कहाँ-कहाँ के साग इकट्ठे काटती हँसती एक बुढ़ि‍या, उसके बग़ल नंगे बदन, पूरी देह पर फ़क़त एक सस्‍ते प्‍लि‍मसोल की चप्‍पल ‘पोशाक’ चढ़ाए, नानी के हाथ का चाक़ू लेने की ज़ि‍द करता बच्‍चा; पीले जंगले से मुँह सटाए, बुरके के ओट बुदबुदाती फ़ातेमा बुजांग कि तुम्हारे उधर भी जीवन ऐसा ही है जैसा हमारे इधर है? ऐसा क्‍यों है अज़ांग? हाथ के सस्‍ते कटोरे में सोयाबीन के फूल के ताज़ा छने पकौड़े लिए मुँह गिराए नन्‍ही वू यान का मासूम सवाल, ‘‘तुम कल चले जाओगे, अज़ांग, सच्‍ची?’’

सब सपना था, वास्‍तविक कुछ भी न था?

***

मेरी पुरानी सखी है पिकु, चोट खाए मेरे अंतरंग क्षणों की हमराज़, स्‍नेह की छतरी तले सारे अप्रिय मूसलाधारों से हमेशा बेदाम मेरी रक्षा को प्रस्‍तुत, उससे पूछता हूँ, तुम बताओ, पिकु, मेरी लिखी चिट्ठि‍याँ, नोट, फ़ुटनोट्स, विनोद, वृत्तांत सब पढ़ी हो तुम, मनगढ़ंत बहक है मेरी, वास्‍तव कुछ नहीं? जवाब में पिकु मुस्‍कराकर इतना भर कहती है, ‘‘कोई तुम्‍हें तुम्‍हारे नाम से नहीं बुला रहा, सब अज़ांग  बुला रहे हैं, तुम्‍हें अजीब नहीं लगता?’’

इस पर मैंने सोचा नहीं था। अब सोचता हूँ तो परेशानी होती है, फुसफुसाकर अपने कन्विक्‍शन खोजता हूँ, ‘‘मेरे ब्‍लॉग पर अज़दक का नाम है, हो सकता है उसी के असर में बुलाते हों? बट आई डोंट नो। तुम समझती हो फिर सचमुच कुछ सच नहीं, सब मेरी कल्‍पना है? इवन गाओपिंग?’’

पिकु कहती है, ‘‘तुमने नोटिस किया गाओपिंग से तुम किस ज़बान में बात कर रहे हो? अभद्र, अश्‍लील, गँवार, भदेस, पतित, ये तुम्‍हारी ज़बान है? कमज़ोर पर रोब गाँठ रहे हो, इधर-उधर की फेंक रहे हो, इज़ दैट परसन यू? डिग्रेडिंग सिचुएशंस, पीपुल, डिग्रेडिंग यूअरसेल्‍फ़? ये सब क्‍या लिखा है तुमने, अज़ांग, क्‍यों लिखा है? ऐसा क्‍यों लिखते हो? लिखते क्‍यों हो?’’

***

हिंदी लेखक का बच्‍चा अँग्रेज़ी पढ़ता है। लेखक ख़ुद पत्रिकाओं, प्रशस्तियों में अपने नाम से बाहर, खोजकर, कुछ नहीं पढ़ता। प्रकाशक सरकारी ख़रीद का सूचीपत्र और बिचौलियों का भावांक पढ़ते हैं। समाज के अंतर्लोक का तलघर, व भाषा के तार किसी दूसरे ही प्‍लेन पर बसते हैं, उनींदे, चौंककर कभी-कभी जगते। घर के बच्‍चों के भविष्‍य व बैंकीय काग़ज़ों से इतर किसी भी गंभीर पाठ से रहित। साहित्‍य-संसार गिनकर चार आलोचकों की जेब में बसता है। उनके आशीर्वचनों की जीवन-बीमा पॉलिसी की ख़रीद के रास्‍ते साहित्‍य दीर्घ जीवन, या अभागी असामयिक मृत्‍यु प्राप्‍त करता है। चार हज़ार की बिक्री (और पचहत्‍तर की संख्‍या का समाज) वाले बारह से बयालीस के बीच अलग स्‍थान व कालों में विस्‍तरित चंद लेखक-वृंद कवि-सपूत होते हैं, व आज़ादी के राष्‍ट्रीय आंदोलन के ज़माने से चला आया साहित्‍य का उनका एक प्रगतिशील पंथ होता है, ज़रूरत व सहूलियत के हिसाब से उस पर फूल, ईंट और रोड़ा गिराते रहते हैं। समय का ‘ज़रूरी’ कवि और ‘महत्त्वपूर्ण’ लेखक का सूचीपत्र तैयार करते अपनी हुज़ूरी के यारों को आश्वस्त और उससे ‘बाहरियों’ को ध्‍वस्‍त व पस्‍त करते रहते हैं। गो साहित्यिक ऐयार दारू की चंद दावतें भले जीम लें, ज़रूरी और महत्त्व का यह सारा साहित्‍य चार हज़ार की बिक्री से आगे कभी अपना पाठक नहीं पाता। वैसे अरमान तक नहीं पालता। पुस्‍तक के ब्‍लर्ब पर विदेश की चार यात्राओं को गिना सकने और साहित्‍य–रत्‍न ‘अ’, ‘ब’, ‘स’ की प्राप्ति में ही साहित्यिकता के कोहेनूर जीत लेने का दर्प और गर्व हासिल किए रहता है। इससे बाहर माध्‍यमिक शाला और कन्‍या डिग्री कॉलेज व सहकारी, सरकारी संस्‍थाओं के चंद कातर, शूरवीर मास्‍टर व शब्‍दकोश-धारी भाषाई अधिकारी होते हैं, ऊबे की उपयोगितावादी लालित्‍य में टहल करते हैं। केवल स्‍वयं दुर्गोत्‍सव : तब और अब’, क्‍या हिंदी साहित्‍य को अब भी बचाया जा सकता है?’, वसुधैव कुटुम्‍बकम के मूलार्थों की आज पुनर्परीक्षा की ज़रूरत है’ जैसे ललित निबंध पढ़ जाते हैं, ज़ि‍म्‍मेदारी से बच्‍चों के भी कान उमेंठते पढ़ा लेने को कृतसंकल्‍प दिखते हैं। जबकि टेलीविज़न का परदा और अख़बार का पन्‍ना हिंदी साहित्‍य को कान उमेंठने तक के क़ाबिल नहीं समझता। संस्‍कृति की चर्चा के मौक़े अपने पैनल में वह अँग्रेज़ी मनीषी आमंत्रित कर लेता है, हिंदी मनीषा गाल बजाने या आँसू गिराने की उपयोगिता पूरी करती है। वैसे में पिकु अंतरंग के निहोरे में पूछती है तो क्‍या ग़लत पूछती है कि क्‍यों लिखता हूँ?

***

मालूम नहीं, पी, क्‍यों लिखता हूँ, तुम बताओ क्‍यों लिखता हूँ। इसलिए कि जो अंतरंग जीवन में छिपा रहा उसे साहित्‍य में खोज लाने की उम्‍मीद बुनता हूँ? इसलिए महीनों तुम्‍हारी चिट्ठि‍यों का जवाब नहीं देता कि एक दिन जब वह दीख जाएगा, कि एक दिन जब वे सारे भेद, हमारी अनकहियों का वह समूचा अंतर्लोक जो स्‍वयं हमसे ढका-लुका रहा, मन की पगडंडियों में उस मणि-निधि को टटोलता एक बार सच्‍चे व निर्दोष तरीक़े से तुम तक शब्‍दों के पुल पर पहुँच जाऊँगा? एक दिन एक बार सच्‍चे व निर्दोष तरीक़े से तुम्‍हें तुम्‍हारे उस नाम से पुकारने चला आऊँगा जिस तरह ख़ुद का पुकारना तुम आज तक न सुनी होगी, सपने में भी नहीं? मालूम नहीं, पी, क्‍यों लिखता हूँ, बताओ क्‍यों लिखता हूँ?

ममता की चोट खाई गँवार औरत अपने रोज़-रोज़ के टूट जाने को क़ाबू करती निहोरा करती है इतना, “कितना बखत तेरा मुँह देखे बग़ैर गुज़रा बच्‍चा, एक बार गाँव चला आ?” निर्ममता से जवाब देता हूँ कि नहीं आ सकता, बहुत काम है, मौसी, और चीन लिखने चला जाता हूँ, क्‍यों चला जाता हूँ? चीन में ऐसा क्‍या देख लेने, जी लेने की उम्‍मीद बनती है जिससे गोरखपुर, देवरिया और कटिहार में मन सुन्‍न पड़ा रहता है? जाकर फिर दीख जाता है चीन में वैसा कोई नवजीवन? मौसी, और फुआ, और तुमसे, पी, छुपाकर खड़ा किया अपना लेखन?

रोज़ तुम्‍हें खोजने पहुँचता हूँ, इस भोली बेवक़ूफ़ उम्‍मीद में कि तुम्‍हारे मिलने में मेरा मिल जाना होगा, मगर रोज़ जवाब देती हो बाहर गई हो। क्‍या मा‍लूम, पी, लिखने नहीं, चीन तुम्‍हारी तलाश में ख़ुद को खोजने जाता हूँ, नहीं तो फिर बताओ, क्‍यों लिखता हूँ?

होगा मनगढ़ंत, होता रहे फिर मनगढ़ंत, यथार्थ क्‍या है? तुम यथार्थ हो? यथार्थ है मौसी मेरी माँ नहीं, न नानान मेरे ख़ून की बेटी, न वह समूचा संसार जो रोज़ सुबह और देर रात तक मेरी आत्‍मा में झरता मीठी लोरी की तरह उमगता और चाक़ू की नोक पर बीच नींद मुझे जगाता रहता है, वह भी यथार्थ नहीं, पी, फिर सब यह कल्‍पनालोक है, (जैसा बाबू विनोद कुमार शुक्‍ल कहते हैं) यथार्थ से टकराते-झुलसते जिसमें सुस्‍ताने चला आता हूँ? भाषा का भदेस गिनती हो, मैं कहता हूँ भाषा एक दूरी होती है2”भाषा एक दूरी होती है। अर्थ के पहुँचने तक की यह दूरी पार करनी होती है। हमें दूरी को भी पुल मान लेना चाहिए। कम से कम इसलिए कि पार करना पड़ता है और जो जोड़ता है। रचना एक सोच-समझकर की जाने वाली बौद्धिक कोशिश है। अपनी अभिव्यक्ति को पाने के लिए बहुत कोशिश करनी पड़ती है।’’ विनोद कुमार शुक्ल, सवाल के जवाब में, कथादेश, अक्टूबर-2010 जो चीन पहुँचकर समझ आती है, सो तुम्‍हें समझ नहीं आता? ”यथार्थ के समय में स्‍वप्‍न भी रहता है—पड़ोसी की तरह नहीं, एक घर में। रिश्‍तेदार की तरह।”3विनोद कुमार शुक्ल, वही। मुझे मालूम नहीं फिर हम किस मनगढ़ंत की बात कर रहे हैं, या यही कि मैं क्‍यों लिखता हूँ।

हो सकता है लिखना कल्‍पलोक के रास्‍ते यथार्थ को पहचानने की सुरीली कोशिश हो, चीन के रास्‍ते ख़ुद को जानने की? क्‍योंकि तुम्‍हें तो, पी, मैं कभी कहाँ जान पाऊँगा? जैसे गाल पर उँगली धँसाए अज़ीज़मन निर्दोष सवाल करोगी, क्‍यों लिखता हूँ, और मैं लाजवाब भले जितना हुए जाऊँ, बुद्धि एकदम काम करना बंद कर देगी, हलक़ सूख जाएगा, कोई जवाब आख़ि‍र तक तब भी नहीं ही सूझेगा कि क्‍यों लिखता हूँ?

***

तोमास पेल्‍लेग्रिनी जानता है क्‍यों लिखता है, शायद इसीलिए इतना कम लिखता है। मेरी तरह भदेस व अश्‍लील तो एकदम नहीं लिखता। कहता है कि जीवन इतनी मात्रा में है, उसे अलग से लिखने की क्‍यों ज़रूरत। हालाँकि उसकी तरह मैं मिलान में नहीं जन्‍मा, न मेरी तरह वह कभी चीन गया, फिर भी तोमासिनो मेरा परम चरम अंतरंग ठहरा। अभागे लोगों के जीवन में जैसे रास्‍ता भूला, भटककर कभी सुख चला आता है (और तत्‍काल अपनी ग़लती जान, घबराकर, हालाँकि चला भी जाता है), तोमासिनो वैसे ही किसी असंभव सुख की तरह मेरे जीवन में आया, (और उससे ज़्यादा ताज़्ज़ुब की बात है, सुख को ठेंगा दिखाते हुए) असंभव तरीक़े से अभी तलक बना हुआ है! कभी-कभी हैरत से मेरा दम फूलने लगता है तो मैं घबराकर सवाल करता हूँ, ‘‘कारो मियो, तोमास्सिनो, सेई वेरो-वेरो के सेई उना फ़ांतासिया?”4“प्रियवर, तोमास्सो, तुम यथार्थ हो या फ़ैटेंसी?” पेल्‍लेग्रिनी गाल बजाता जवाब देता है, ‘‘फ़ांतासिया।’’ मैं तब चैन की साँस लेता हूँ।

तोमास ने अपने पत्र में लिखा है, तुम्‍हारे चीन जाने की ख़बर से सचमुच हैरानी हुई। हालाँकि पिछले महीनों स्‍पेन के दक्खिन और इटली के लोम्‍बार्दी के देहातों में टहलते हुए ग्रामीण जीवन में आए बदलावों के ऐसे और इतने अनुभव मिलते रहे कि सोचता हूँ ‘हैरानी’ शब्‍द का अब मैं सँभल-सँभालकर ही इस्‍तेमाल करूँ। मैंने तुम्‍हें पहले लिखा था कि मेरी मौसेरी बहन की गाँव में कुछ ज़मीन है, उसके कुछ क़ानूनी पचड़े के सिलसिले में गाँव गया था? बचपन में हम बच्‍चों की ढेरों छुट्टि‍याँ उस जगह, उस पुराने दोमंज़िले मकान में बीती हैं, अच्‍छी भरी-पूरी दुनिया हुआ करती थी, अब कुछ नहीं रहा वहाँ, सिर्फ़ दो घर बचे हैं, जहाँ चूल्‍हा जलता है; बाक़ी के सब मकान ढह गए। और ज़मीन, पर्यटन के दलालों या सस्‍ते की ख़रीदी में अंतरराष्‍ट्रीय नवधनिक ख़ुशहालों के हाथ है! पर्यटन के उस सुहाने लैंडस्‍केप में बचपन की स्‍मृतियों की मेरी अपनी जगहें मेरे पकड़ में नहीं आ रही थीं, देर तक यही लगता रहा कि यह पर्यटकीय यथार्थ ही वास्‍तविक यथार्थ है, स्‍मृतियों में बंद मेरे बचपन की जगहें विशुद्ध मेरे दिमाग़ की कल्‍पना हैं, समझ रहे हो? आई डोंट नो व्‍हॉट इज़ रियेलिटी एनी मोर, अज़ांग, रियली!

मगर तुम चीन क्‍यों गए? उन्‍नीसवीं सदी, बीसवीं के शुरुआत में जाते रहे होंगे लोग शांघाई, मांचाऊ, अब कौन जाता है चीन? मैं तो यही समझ रहा था कि अब चीन ही वह चीज़ है जो दुनिया के कोने-कोने पहुँच रही है, उसके कोने क्‍या है उसकी तह तक पहुँच सके वैसी राजनीतिक दृष्टि व समझ वाले ज्ञानी को पैदा करना मानव सभ्‍यता ने बंद कर दिया है, और नहीं किया है तो तुम्‍हारे देश की मुझे ख़बर नहीं, कम से कम हमारे इटली में तो बंद हो ही गया है। बेर्लुस्‍कोनी पैदा होता है, राज करता, कोई पियेर पाओलो पसोलिनी कहाँ दिखता? मगर, रियली, तुम चीन क्‍यों गए? 

प्रमोद सिंह हिंदी लेखक-कलाकार हैं। यहाँ प्रस्तुत गद्य-अंश उनकी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक जिसका शीर्षक अब भी संभावना है, से साभार है। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखें : ओह! मौसी, ये दुनिया…

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