कवितावार में रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ::
अनुवाद : सरिता शर्मा

Rabindranath THAKUR
रवींद्रनाथ टैगोर

मेरी निर्भरता

मैं हमेशा निर्भर रहना चाहता हूं, और हमेशा के लिए
मेरी मां के सौहार्द्र और देखभाल पर
मेरे पिताजी के स्नेह, चुंबन और गले लगने पर
जीवन जीना चाहता हूं खुशी से उनके सारे अनुग्रह में.

मुझे निर्भर रहना पसंद है, और हमेशा के लिए
अपने सगे-संबंधियों पर, वे सब बौछार करते हैं
खट्टी-मीठी सलाहों, शिकायतों की
एकदम चकित, सच्चे और जानकार दिग्गज.

मुझे हमेशा निर्भर होना अच्छा लगता है, और हमेशा के लिए
मेरे दोस्तों पर, जो बात करते हैं और मुझे निकट चाहते हैं
घरेलू, पारिवारिक और रोमांटिक सुझाव देते हैं
साथियों पर भी, जो जोखिम में काम करते हैं.

मैं निर्भर रहना चाहता हूं, और हमेशा के लिए
अपने पड़ोसियों पर भी, कभी-कभी जो ईर्ष्या करते हैं
मेरे भाग्य के उदय पर, जानना चाहते हैं
मेरी रोजमर्रा की, छोटी-मोटी और अजीब बातें भी.

***

रवींद्रनाथ टैगोर (7 मई 1861 – 7 अगस्त 1941) प्रसिद्ध भारतीय-बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार हैं. गुरुदेव कहकर पुकारे जाने वाले रवींद्रनाथ विश्व के एकमात्र ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं. भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ गुरुदेव की ही रचनाएं हैं. अपने प्रकृति-प्रेम के लिए विश्वविख्यात गुरुदेव की सबसे लोकप्रिय रचना ‘गीतांजलि’ है, जिसके लिए उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यहां प्रस्तुत कविता अंग्रेजी से अनूदित है और ‘पोएम हंटर’ से ली गई है. सरिता शर्मा सुपरिचित हिंदी लेखिका और अनुवादक हैं. उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है.

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