नज़्में ::
तसनीफ़ हैदर

urdu poet Tasneef Haidar photo
तसनीफ़ हैदर

उर्दू

मैंने उर्दू को आक़ कर दिया
आक़ के मानी होते हैं अपनी जायदाद से बेदख़ल कर देना

मेरी जायदाद है
इज़्ज़त से गुज़ारी जाने वाली ज़िंदगी
किसी के आगे न फैलाया जाने वाला हाथ
समझ कर पढ़ी जाने वाली किताबें
ग़ैर-जानिबदारी से लिखी जाने वाली तारीख़

ग़ैर जानिबदारी का मतलब होता है किसी की तरफ़ न होना
न भूक की जानिब न निवाले की तरफ़
न लेक्चर की ख़्वाहिश न मुशायरे की तरफ़
न अदबी महफ़िलों की बक-बक पर
न सरमायादारी की चादर में लिपटी हुई घटिया फ़ेसबुक पोस्टों की तरफ़
ग़ैर जानिबदारी का मतलब होता है अकेले मरना
अपने कमरे में

मैंने उर्दू में लिखने वालों के मुर्दा सौ लफ़्ज़ों से उठता तअफ्फ़ुन देखा है
तअफ्फ़ुन का मतलब होता है सड़ांध
अख़लाक़ के उसूल गढ़ने वाले बौनों की कुशादा-दिली
अख़बारी तराशों पर बैठ कर सोना हगने वाले गिद्धों की हवस

मैंने उर्दू का वो जनाज़ा देखा है
जिसमें मेरे बाप के हाथ से लिखी हुई
शाइरी की भाँप क़ैद करके ले जाने वाले चोरों की
सुर्ख़ आँखें हैं

मैंने उबले हुए आलुओं,
भुने हुए चनों,
और बिना बघरी हुई दालों में
उर्दू के सालाना जश्नों का जनाज़ा देखा है।

जन्नत से निकाली हुई एक नज़्म

भूक
से बेहाल
मेरे जिस्म से जुड़ी बंजर आँखें
नहीं पहचानती थीं
ख़ुदा के उस ज़ुल्म को
जिसमें फलों को चखना गुनाह था
अनाज तक पहुँचना हराम था

मैं नहीं जानता था
कि मेरी आँखें जन्नत से निकाली जाने वाली
ऐसी नज़्म कह सकती हैं
जिसमें बग़ावत हो
मैं अपने नर्म और मख़मली हाथों पर
सूखी सख़्तियाँ उग जाने की बद-दुआ से चूर
एक मरदूद दहक़ाँ था

मैं नहीं जानता था
कि नज़्में सिर्फ़ सुंदरता के लिए लिखी जाती हैं
ख़ुदा के लिए हों या महबूब के लिए
सभी को हुस्न की तारीफ़ पसंद है
मगर कोई नहीं चाहता
कि हम जैसे अदना लोगों के हाथ
उनकी सजाई हुई हसीन शाख़ों या बालियों तक पहुँचें

मैं नहीं जानता था
कि जब तक मैं तारीफ़ करूँगा
फ़रिश्तों का उस्ताद कहलाऊँगा
और जब होंठों को
लज़्ज़त की महकार तक ले जाने की हिम्मत दिखाऊँगा
तो दुनिया का पहला गुनहगार बना दिया जाऊँगा।

मेरे कमरे में

मेरे कमरे में
एक बिस्तर है
उस सर्द बिस्तर की गर्म ख़्वाहिश में
लिपटे हैं
शह्र के कई अनहोने गुनाह
जिन्हें मैंने
अपनी टाँगों में दबा रक्खा है
मैं दिन भर थकता हूँ
सड़कों पर, मिलों में, ऑफ़िसों की धमकदार कुर्सियों पर
मेरी शादी को तीन बरस बीत चुके हैं
हर छह महीनों में चार बार मैं अपनी पत्नी के साथ
सुहाग रात मनाता हूँ
और अगली एक सौ छयत्तर रातें
आग को कभी ज़बान के नीचे दबाए
बग़ल में रखे
आँखों की पुतलियों के पर्दे तले ढाँपे
चुपचाप शरीफ़ों की तरह सर्दी का मौसम गुज़ार देता हूँ
और जब एक दिन अचानक मेरी ख़्वाहिश की शिरयानें
फट पड़ेंगी
तो अख़बार मुझ पर चढ़ दौड़ेंगे
लोगों के नेक अँगूठे, मेरी काली करतूतों पे पेशाब करते नहीं थकेंगे
वो मुझे पागल, पीड़ित या प्यासे के नाम से नहीं
सिर्फ़ पापी के नाम से पुकारेंगे।

अवाम

अवाम पागल है
जिसके हिस्से में ख़ूनी शामें
तवील और दर्दख़ेज़ रातें
क़बीह कपड़े, ग़लीज़ लम्हे, बुरी ग़िज़ाएँ
अवाम जिसको समझ नहीं है
कि देव ए मज़हब की आस्तीं में
जहान ए नौ को निगलने वाली सब आतिशें हैं
अवाम जिसको ख़बर नहीं है
कि नारा ए नूर की तहों में
हवा की कितनी ही साज़िशें हैं
अवाम कब जानती है आख़िर
कि जज़्बा ए मावराइयत को
गला के हथियार बन रहे हैं
कि झूटी तारीख़ की मिलों में
धुआँ उगलती हुई शररबार मंज़िलों में
ग़ुलाम तैयार हो रहे हैं
तरीक़ ए आज़ार बन रहे हैं
सदा ए जम्हूर की मदद से
ख़ामोशियों के अजीब बाज़ार बन रहे हैं
जहाँ पे ख़ौफ़ ओ ख़तर के परचम
बता रहे हैं
सवाब की सब हक़ीक़तों से गुनाह की सब मईशतों तक
अज़ल की सारी बसीरतों से अबद की सारी शरीअतों तक
अवाम की नेज़ा-दारियों से अवाम की ख़ुद-अज़िय्यतों तक
फ़ना के मीनार बन रहे हैं
अवाम कब जानती है आख़िर
कि लोग अपनी तबाहियों के ख़ुद ही तरफ़दार बन रहे हैं।

***

तसनीफ़ हैदर समकालीन उर्दू अदब के उन नामों से हैं जिनसे आगे की राह सचमुच आगे की राह बनती है। ‘मोहब्बत की नज़्में’ (2018) उनकी शाइरी की सबसे नई किताब है। वह ‘अदबी दुनिया’ से संबद्ध हैं। दिल्ली में रहते हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है। यहाँ प्रस्तुत नज़्में उर्दू से हिंदी में उन्होंने ख़ुद लिप्यंतरित की हैं। पाठ में मुश्किल लग रहे शब्दों के मानी जानने के लिए यहाँ देखें : शब्दकोश

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