डब्ल्यू. एस. मर्विन की कविताएँ ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद और प्रस्तुति : रीनू तलवाड़

डब्ल्यू. एस. मर्विन

क़रीब सात दशकों तक कविताएँ लिखकर, 91 बरस इस धरती पर व्यतीत कर अमेरिकी कवि डब्ल्यू. एस. मर्विन (30 सितंबर 1927-15 मार्च 2019) कहीं आगे बढ़ गए। कहाँ? अपनी गूढ़, अस्पष्ट और लगभग रहस्यमय कविताओं में वह एक तरह से इसी बात का अन्वेषण करते रहे। साकार शब्दों से उन्होंने अनुपस्थिति, मौन एवं शून्यता का इंद्रजाल-सा बुना है। विराम-चिह्नों का अभाव उनकी कविताओं के प्रभाव को और घनीभूत कर देता है। वह अपनी पीढ़ी के शायद सबसे सृजनशील कवि रहे हैं और अनेक सम्मानों से नवाज़े गए हैं। अपने पीछे वह अपनी कविताओं और अपने अनुवाद-कार्य का विशाल संग्रह छोड़ गए हैं। उनकी अनुपस्थिति से उबरने में कविता-प्रेमियों को समय लगेगा।

अपनी बरसी के लिए

हर वर्ष अजाने ही जिया है मैंने वह दिन
जब अंतिम अग्नि करेगी संकेत
और चल देगा मौन
अथक यात्री
प्रकाशहीन किसी तारे की किरणों-सा

तब नहीं पाऊँगा स्वयं को जीवन में
जैसे पहना हो अपरिचित-सा चोला
विस्मित इस धरती पर
और एक स्त्री के प्रेम पर
और मनुष्यों की निर्लज्जता पर
जैसे आज तीन दिन लगातार बारिश के बाद
सुनता फुदकी का गीत और बारिश का रुकना
होता नतमस्तक न जाने किसके आगे

‘द सेकंड फोर बुक्स ऑफ़ पोएम्ज़’ से

वर्षा यात्रा

मुँह अँधेरे जागता हूँ और याद आता है
कि यह वही सुबह है जब मुझे
अकेले निकलना होगा यात्रा पर
लेटे-लेटे सुनता हूँ भोर से
पहले के अंधकार को और तुम
बग़ल में अभी सो ही रही हो जब
हमारे चारों ओर रात से परिपूर्ण वृक्ष
निस्तब्ध खोए हैं अपने स्वप्न में जो
सँभालता है नींद में हमें और तब जागकर
सुनता हूँ एक-एक कर बूँदों का
दृष्टिहीन पत्तों पर गिरना
नहीं जानता वे किस पल गिरना शुरू हुईं मगर
एकाएक और कुछ सुनाई नहीं देता सिवा
वर्षा के गिरने का स्वर और नीचे कहीं
घिरते अंधकार को चीरकर
जलधारा की गर्जन का बहते जाना

दी एसेंशियल’ से

अपनी परछाइयों से

कितने ही शब्द हैं दुःख के लिए
और उल्लास के लिए कितने कम
शायद कोई भी नहीं
जो कह पाए
उस गुप्त झरने का स्वर
जो शब्दों से भी पहले उमड़ने लगता है
हालाँकि जब उठता है वह स्वर
हमारे भीतर
हम चाहते हैं उसके बारे में
बताना किसी को
अगर वह सुनने के लिए रुकें
करना चाहे बात उसकी
जो शब्दों के परे है
सुख के मध्य भी
हमारे भीतर जाग सकता है दुःख
और गहन उदासी के बीच
हर्ष अचंभित कर सकता है
हमारे यहाँ होने के पहले ही से
दोनों जानते हैं हमें
मगर जो करने लगें उनसे बात
केवल दुःख ठहर कर
सुनता है
सुख हो जाता है लुप्त
शायद करता है हमारी प्रतीक्षा वहाँ
जहाँ उसके होने की हमें सबसे कम उम्मीद हो

‘गार्डन टाइम’ से

बीतते वसंत में पॉला के लिए

मुझे कल्पना करने दो कि जब चाहेंगे
लौट आएँगे हम और होगा तब वसंत
और जितनी उम्र के हम सदा से रहे उससे अधिक के नहीं होंगे
थके-हारे दुःख छँट चुके होंगे भोर के बादलों की तरह
जिनके पीछे से सुबह धीरे-धीरे अपने ही पास आती है
और मृतकों के विरुद्ध हमारे प्राचीन मोर्चे
ढह चुके होंगे जिन्हें अंततः उन्हीं के पास छोड़ दिया जाएगा
रोशनी ऐसी ही होगी जैसी है अभी
बरसों साथ बिताई लंबी शामों और
विस्मय से बनाए हमारे इस बग़ीचे में

‘द शैडो ऑफ़ सिरियस’ से

सु दोंग-पो के नाम पत्र

लगभग एक हज़ार वर्ष बाद भी
पूछ रहा हूँ मैं वही प्रश्न
जो तुमने पूछे थे जिनके पास
तुमने हमेशा स्वयं को लौटता पाया
मानो कुछ भी न बदला हो केवल
उनकी प्रतिध्वनि का शब्द गहराता
चला गया हो और उम्र के बढ़ने के बारे में
तुम्हें बड़ा होने के पहले ही पता चल गया हो
जो जानना चाहते थे तुम उसके विषय में
जितना तुम तब जानते थे उससे
अधिक मुझे अब भी नहीं पता
जब मैं यूँ बैठा रात में
निःस्तब्ध घाटी को ऊपर से निहारता
सोचता हूँ तुम्हें तुम्हारी ही नदी पर
जो जलपाखी के स्वप्नों में बिछी
चाँदनी की चादर है और
सुनता हूँ तुम्हारे प्रश्नों के बाद के मौन को
आज रात क्या उम्र होगी तुम्हारे प्रश्नों की?

‘द शैडो ऑफ़ सिरियस’ से

अपूर्ण का अचरज

मैं जो भी करता हूँ पूरा नहीं होता
इसीलिए बार-बार लौटता हूँ उसके पास
इस भ्रम से प्रलोभित कि मैं तरस रहा हूँ
अंततः उसे पूरा देखने के लिए
पूर्ण और मुझसे विमुख

मगर नहीं वह अपूर्ण ही है जिसके पास
मैं लौटता हूँ चूँकि वह मुझे ललचाता है
वही प्रदान करता है मुझे पूर्णता जो
मेरी पकड़ से हमेशा की तरह छूट गया है
मैं अपूर्णता से बना हूँ
शब्दों में जो है वह शब्द नहीं है

आह क्षणभंगुर श्वास
क्षण उजाला जीवन
जो अस्पर्शनीय हैं
किसी नाम से
किसी उद्भव से

क्या लगता है हमें क्या जानते हैं हम

‘द मून बिफ़ोर मॉर्निंग’ से

ब्रेड
वेंडेल बेरी के लिए

सड़क पर चलता हर चेहरा ब्रेड का टुकड़ा है
भटक रहा है
ढूँढ़ता हुआ

उजाले में कहीं सच्ची भूख
उनके पास से निकलती प्रतीत होती है
वे झपटते हैं

क्या वे भूल चुके हैं धुँधली कंदराओं को
स्वप्न देखा था उन्होंने सिर छुपाने का
अपनी गुफाओं में
पसरी थी जिनमें उनके पदचिह्नों की प्रतीक्षा
दीवारों पर टँगे थे जहाँ उनकी टटोल के निशान
जो भरी थीं उनकी नींद और उनके गोपन से

क्या वे भूल चुके हैं ऊबड़-खाबड़ सुरंगें
जिन्हें पार कर उजाले से अंदर-बाहर जाने का स्वप्न देखते थे
वह सुनना हर क़दम पर

ब्रेड के दिल की धड़कन को
होना उसकी अँधेरी साँस से पोषित
और बाहर निकल

पाना स्वयं को अकेला
गेहूँ के खेत के सामने
जो अपनी दमक चाँद की ओर बिखेर रहा है

‘द सेकंड फ़ोर बुक्स ऑफ़ पोएम्ज़’ से

बीता कल

मेरा मित्र कहता है मैं अच्छा बेटा नहीं बन सका
समझते हो
हाँ समझता हूँ मैंने कहा

वह कहता है अपने माता-पिता से मिलने
बार-बार नहीं जाता था जानते हो
और मैंने कहा हाँ जानता हूँ

जब उसी शहर में रहता था
शायद महीने में एक ही बार वहाँ जाता था
वह कहता है शायद उससे भी कम
ओह हाँ मैंने कहा

वह कहता है जब अंतिम बार मैं अपने पिता से मिलने गया
मैंने कहा जब अंतिम बार अपने पिता को मैंने देखा

वह कहता है जब अंतिम बार मैंने अपने पिता को देखा
वह पूछ रहे थे मेरे जीवन के बारे में
कैसा कट रहा है और
वह दूसरे कमरे में गए थे
लाने के लिए कुछ जो वह मुझे देना चाहते थे

ओह मैंने कहा
एक बार फिर अपने पिता के हाथ का
वह ठंडा अंतिम स्पर्श महसूस करते हुए
वह कहता है और मेरे पिता ने दरवाज़े
से मुड़कर मुझे अपनी घडी की ओर
देखता पाया और बोले
जानते हो मैं चाहता हूँ
तुम रुककर बातें करो मुझसे

ओह हाँ मैंने कहा

लेकिन तुम व्यस्त हो अगर वह बोले
तो मैं नहीं चाहता कि तुम्हें लगे कि
रुकने का कोई बंधन है
सिर्फ़ इसलिए कि मैं यहाँ हूँ

मैं चुप रहा

वह कहता है मेरे पिता
बोले शायद हो तुम्हें
कोई ज़रूरी काम
या मिलना हो किसी से
और मैं तुम्हें रोकना नहीं चाहता

मैं खिड़की के बाहर देखता रहा
मेरा मित्र उम्र में मुझसे बड़ा है
वह कहता है और अपने पिता से बोलकर
कि ऐसा ही है
मैं उठा और उन्हें छोड़कर चला आया
जानते हो

हालाँकि मुझे कहीं जाना नहीं था
और न ही कुछ करना था

‘ओपनिंग द हैंड’ से

शोकगीत

किसको सुना पाऊँगा मैं इसे

‘माइग्रेशन : न्यू एंड सिलेक्टेड पोएम्ज़’ से

रीनू तलवाड़ सुपरिचित हिंदी लेखिका, अनुवादक और अध्येता हैं। वह चंडीगढ़ में रहती हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 23वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

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