कविताएँ ::
रंजना मिश्र

Ranjana Mishra hindi writer
रंजना मिश्र

नताली ग्रांट

उस जगमगाते अस्पताल के मुख्य द्वार के क़रीब टहलती वह औरत
मंगलेश डबराल की कविता में आई पागल औरत तो बिल्कुल नहीं थी।

अपने प्रतिष्ठित पारसी परिवार की गरिमा को रत्ती भर खरोंच न पहुँचाते,
आस-पास आते-जाते लोगों की नज़रों से नज़रें मिलाए बिना
अपनी घुटनों तक की सूती फ्रॉक, महँगी सैंडिल और क़रीने से कटे बालों के साथ
वह चुपचाप टहलती नज़र आती—
बिना किसी विशेष प्रायोजन के, मानो
लोगों के बीच रहते हुए भी अदृश्य रहना ही उसका ध्येय था
किसी ने बताया कि किसी ज़माने में उसके पूर्वज इस शहर में आकर बसे थे
और इस तरह इस अस्पताल को चार पीढ़ियों ने अपनी मेधा से सँवारा था
हर बीते दिन के साथ उनके नाम का वह अस्पताल अपनी सफलता की चकाचौंध में
दिन-ब-दिन और क़द्दावर होता जाता था
पहले-पहल इन्हीं दिनों देखा था मैंने उसे,
दूसरी बार नज़र आई वह उसी अस्पताल की चमकदार कैंटीन में
जिसका अस्पताल की रोज़मर्रा मायूसी से कोई वास्ता न था,
हालाँकि वहाँ की दीवारें काँच की थीं
संभ्रांत मरीज़ और डॉक्टर ऊँची बार स्टूल पर बैठे
अपनी पीठ अक्सर दरवाज़े की ओर कर लिया करते
अस्पताल का वही एक कोना थोड़ी गर्माहट से भरा है—
ऐसा गुमान होता था
इसी कैंटीन के बीचों-बीच रखी टेबल पर बैठी,
चीज़ सैंडविच और कॉफ़ी अपने सामने रखे वह पता नहीं किस पर बड़बड़ा रही थी
उसकी बड़बड़ाहट का कोई सिरा उसके खाने से जुड़ा हो ऐसा नहीं लगता था
हालाँकि थोड़ी ही देर में सैंडविच उसे बेस्वाद लगने लगी
और गर्म सैंडविच की तलाश उसे काउंटर पर ले गई :
गौतम, कैन यू वॉर्म इट फॉर मी प्लीज़?
टेबल तक वापस जाते ही सहसा उसे याद आया
उसकी कॉफ़ी ठंडी हो चली है और उसे एक गर्म ऑरेंज मफ़िन भी चाहिए :
गौतम आई डोंट वॉंट दिस… कैन यू गेट मी अनदर कॉफ़ी प्लीज़?
उसकी आवाज़ में—
थोड़ी ज़िद, थोड़ा ग़ुस्सा, थोड़ी मनुहार और थोड़ी ठसक भी शामिल थी इस बार
पता नहीं किस गर्माहट की तलाश थी उसे
कैसी नर्मी चाहिए थी उस चमकदार अस्पताल की चमकदार कैंटीन की सैंडविच और मफ़िंस में
जो उसे ढूँढ़े नहीं मिल रही थी
कैसे और कौन-से स्वाद थे जो उसकी ज़िंदगी में शामिल न थे
जिनकी तलाश बार-बार उसे काउंटर के पीछे खड़े उस लड़के की तरफ़ ले जाती थी
जो हर बार मुस्कुराकर उसकी माँगें मान लिया करता था
घुटनों तक की सूती फ्रॉक और महँगी चप्पल पहले
उस प्रतिष्ठित परिवार की वह भोली औरत,
उम्र के इस पड़ाव पर भी
अपने पाँव भर बचपन को बचाए,
इस दुनिया में धँसी खड़ी थी—
अपने परिवार की मेधा और सफलता का बोझ बड़ी ही सरलता से अपने काँधे पर उठाए
वह सफल लोगों के बीच अपने सिर्फ़ इंसान होने पर बिल्कुल शर्मिंदा न थी
हालाँकि लोग कहते हैं :
इस प्रतिष्ठित परिवार में,
बस वही एक पागल है…

माँ का स्मार्ट फ़ोन

एक

माँ
उतरती नहीं आवाज़ में,
अक्षरों में
और भाषा के सबसे सार्थक शब्दों में
चुप बैठी रहती है, मन में
हम इस दुनिया में
उसकी चुप्पी
आवाज़
और सपने
साथ लिए फिरते हैं

दो

फ़ोन पर
उसका आख़िरी संदेश था—
‘तुम्हारा फ़ोन नहीं लग रहा’
सोचती हूँ
क्या हुआ होगा मेरे फ़ोन को उस दिन
जानना चाहती हूँ
कौन-सी बातें
कहना चाहती थी वह
ठीक उस घड़ी, उस समय
जब मेरा फ़ोन नहीं लग रहा था
अब,
जब उसका फ़ोन नहीं लगता

तीन

उसकी आवाज़ बज उठती है कानों में
उनींदी रातों के पहले पहर में ही
और देर तक बजती रहती है
जैसे उसका फ़ोन
जिसे वह कभी-कभी जान-बूझकर
उठाना भूल जाती थी
कि हम वापस लौटते ही कहें—
‘फ़ोन क्यों नहीं उठाया’

चार

किन दीवारों के पार बैठी हैं माँ
मेरी आवाज़ बीच से टूटकर लौट आती है
पिता अक्सर फ़ोन थामे
क्या कुछ ढूँढ़ते रहते हैं
किसी नए नेटवर्क की तफ़सीलें तलाशते शायद
क्या पता माँ ने ले लिया हो नंबर नया,
पर कोई और आवाज़ गूँजती है उधर—
‘आप जिस ग्राहक को फ़ोन कर रहे हैं
वह संपर्क क्षेत्र के बाहर है’

पाँच

माँओं के जागने का कौन-सा समय होता है
चिड़ियों के सोने का समय कौन-सा होता है
किस लम्हे में चिड़िया सोचती है उसे जाना है
और पीछे छोड़ जाती है सब कुछ
नन्ही चिड़िया-सी
जाने कहाँ चली गई माँ
पीछे छोड़ गई
सब कुछ
और अपना फ़ोन
जिसे थामे वह
घर बाहर घूमा करती थी
अपनी दुनिया को विस्तार देती

छह

पुरानी तस्वीरों में कमोबेश ख़ुश नज़र आती है वह
छुटकी को अपनी गोद में बिठाए,
मेरा हाथ थामे
बड़ी को दूसरे हाथ से समेटती
पर जाने दो
उसकी दुनिया बस इतनी-सी ही थी उन दिनों
वह स्मार्ट फ़ोन्स के पहले का समय था

सात

जिस भी दुनिया में होगी माँ
क्या बच्चों के यू ट्यूब वीडियो वहाँ भी होते होंगे
क्या वहाँ भी वह तलाशती होगी
हमारा बचपन
या आने वाली पीढ़ियों के बचपन
अब
जब उसके बच्चे
अपने बच्चों में गुम हो चुके हैं

आठ

समय कैसे गुज़रता होगा माँ का
दीवारों के उस पार
कौन-सी रेसिपी, कौन-सी व्यंजन-विधि
उसे उत्साह से भर देती होगी
किन घरेलू नुस्ख़ों को याद रखने को कोशिश करती होगी वह
अगले दिन हमें बताने के लिए

नौ

कौन-से पुराने गीतों को सुनते वह मौन हो जाया करती होगी
कौन-सी धुनें उसे पुराने दिनों में ले जाती होंगी
कौन-सी यादें उन गीतों के साथ लौट-लौट आती होंगी
कौन-सी लोरियाँ उसे फिर से याद आती होंगी
कौन-से दिन उसे बार-बार बुलाते होंगे

दस

अब जब नहीं है माँ
घर में, शहर में, दुनिया में
उसका फ़ोन
अक्सर उदास होता है
कोई नहीं उठाता उसे,
नई दुनिया नहीं तलाशता कोई उसके भीतर
कभी-कभी वह मुझे
माँ-सा नज़र आता है
वह बज उठता है कभी-कभी
माँ की मिस्ड कॉल की तरह ही
जिसका हम समय रहते
जवाब न दे पाए

***

रंजना मिश्र का काम-काज जो प्राय: कविता, अनुवाद और संगीत से संबद्ध है; इधर एक निरंतरता में प्रतिष्ठित प्रकाशन माध्यमों पर नज़र आना शुरू हुआ है। वह वाणिज्य और शास्त्रीय संगीत में शिक्षित और आकाशवाणी, पुणे से संबद्ध हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

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