कविताएँ ::
मिथिलेश प्रियदर्शी

मिथिलेश प्रियदर्शी

चमत्कार

मेरा जीवन चमत्कारों से बहुत दूर था
इतने सालों में कभी मुझे मूँगफलियों में सोने के दाने नहीं मिले
कभी किसी कुत्ते ने सूँघकर मुझे गड़े ख़ज़ाने का पता नहीं बताया
मिलियन डॉलर इनाम जीतने वालों के नाम कुछ और थे
पुराने राजाओं की पीली वसीयतों में कभी मेरा नाम नहीं निकला
भूलवश भी किसी लापरवाह ने पैसे जमा करने के लिए मेरे खाते नहीं चुने
कभी किसी लड़की ने प्रेम के लिए मुझे नहीं चुना
ताउम्र पैदल चलने के बाद भी कभी मुझे सड़कों पर गिरे हुए नोट नहीं मिले
किसी प्रतियोगिता परीक्षा के परिणाम में मेरा नाम नहीं था

चमत्कारों की उम्मीद में मैं बूढ़ा हो गया
सौ के पार चला गया
साथ के लोग दुर्घटनाओं, बीमारियों और हत्याओं में मर गए
मैं चमत्कारों के इंतज़ार में ज़िंदा रहा

पेंशन देने वाले बैंक के कर्मचारी ने एक दिन मेरे जर्जर हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा—

अद्भुत सर,
आपने जितने साल नौकरी की, उतने साल पेंशन उठाया।

याददाश्त

हम बित्ते भर की याददाश्त वाले लोग थे
हमने नन्हीं बच्चियों के बलात्कारियों को अपने साथ फ़ुटबॉल खेलने बुलाया
दौड़कर उन्हें गेंदें पास कीं
दो दिन में ख़ुद मर जाने वाले बुज़ुर्गों के शौक़िया हत्यारों को
हमने लतीफ़े सुनाकर हँसाया

हम कुत्ते के पेशाब से भीगी स्मृतियों वाले लोग थे
सब कुछ लूटकर ले जाने वालों को हमने
मोटरसाइकिल पर बिठाकर बीच रात शहर की सीमा के पार पहुँचाया
रास्ते में खाने के लिए रोटियाँ दीं
बचे रह गये उनके बंधु-बांधवों की हिफ़ाज़त का भरोसा दिया

हमारा अमाशय दुनिया के सभी जीव-जंतुओं से शक्तिशाली था
हमने दुनिया भर के झूठ पचाए
हत्याएँ पचाईं
हम अपने क़ातिलों से संभोग करवाने के आदी थे
हमने अपनी कमर उचकाकर उनको लय दी
झूठे सीत्कार से उनका स्खलन करवाया
उनके साथ कोरस गाए
उनके औज़ारों पर लगा ख़ून धोया
उन पर सान चढ़ाई

और एक दिन जब हमें गैस चैम्बरों में बुलाया गया
हम बाक़ियों को सहयोग करने का स्वयंसेवी अनुशासन सिखाते हुए
क़तार से गए।

ईश्वर की दिनचर्या

तीन बजकर तीस मिनट हुए हैं
मनुष्य का ईश्वर जो थककर सो रहा होगा कहीं
आधे घंटे बाद उसे जगाने की क़वायद शुरू होगी

एक चिल्ल-पों के बीच
ज़बरदस्ती खींची जाएगी उसकी चादर
ढीले बँधे पज़ामे में
नींद की दवाई खाए किसी मरीज़ की तरह
काँप रहा होगा वह
अपनी असफल नींद से

इतनी भी मोहलत नहीं बख़्शी जाएगी
कि धो पाए वह स्वप्नदोष से तरबतर हुआ अपना पज़ामा
रोज़ के मीठे चढ़ावे से सड़ रहे अपने दाँत-मुँह
मुक्त हो सके पेशाब-पखाने के चरम दबाव से

पृथ्वी के दूसरे छोर तक पहुँच सकने वाली लगाई जाएगी हाँक
बुलाया जाएगा उसे अपने तयशुदा दरों-दीवारों में
नहलाया जाएगा पूस में भी बर्फ़ीले पानी से
जीर्ण होते कान के उसके पर्दों की फ़िक्र किए बिना
भरपूर ताक़त से चिल्लाएँगे लोग
इस तरह दिन भर ऊँघता हुआ
पूरा होगा उसका एक दिन।

ईश्वर की छुट्टियाँ

कितने अमानवीय हो तुम
हर रोज़ प्रार्थनाओं में सुबह-सकारे पकड़ा देते हो ईश्वर को
अपनी उम्मीदों, दुखों, चाहतों, महत्वाकांक्षाओं का लंबा पुलिंदा
और वह जुत जाता है अरबों ऐसी प्रार्थनाओं के पीछे
उसके कैलेंडर में नहीं होता कोई इतवार
नहीं लिख पाता छुट्टियों के लिए आवेदन
नहीं होती कोई यूनियन
वह नहीं जा पाता किसी हड़ताल पर
होली, दशहरे, ईद जैसी छुट्टियों में भी उसे नहीं मिलती छुट्टियाँ
शहर के व्यस्तम चौक पर तैनात किसी सिपाही की तरह
मुस्तैदी से निभानी पड़ती हैं ज़िम्मेदारियाँ
दीवाली की रात भी सूने हॉस्पिटल में बैठकर किसी डॉक्टर की तरह
जले आदमी का करना पड़ता है इंतज़ार

कितने अमानवीय हो तुम
बॉस से सिर दर्द का बहाना कर झूठी छुट्टियाँ लेते हुए
तुम नहीं सोचते ईश्वर की छुट्टियों के बारे में
कि उसकी वैसाखियों के बिना ही
पूरे कर सको अपने काम, बिना हाथ फैलाए निभा सको अपनी ज़िम्मेदारियाँ
वह भी तुम्हारी ज़रूरत-बेज़रूरत की प्रार्थनाओं से निकलकर
धो सके अपने बदबूदार मोज़े, चिकट होती क़मीज़ें
पत्नी के लिए कर सके थोड़े सुकून से उसकी पसंद की ख़रीददारी
रोज़ के उबाऊ लड्डू से इतर
पका सके अपने मनपसंद कच्चे गोश्त की बिरयानी
वोदका के हिंडोले पर झूमता हुआ कर सके एक लंबा संतोषप्रद संभोग
अतिरिक्त बेस वाले हेडफ़ोन को कानों पर चढ़ाकर देख सके अपने प्यारे नायक की फ़िल्म
घूम सके पलामू के लाल पलाश वाले जंगलों में

तुम्हारी छुट्टियों से कम ज़रूरी नहीं हैं उसकी छुट्टियाँ
ईश्वर है वह, बंधुआ मज़दूर नहीं
वह भी आता है श्रम क़ानूनों के दायरे में
नहीं कर सकता वह आठ घंटे से ज़्यादा काम
नहीं खट सकता बेगारी
ऐसे तो समय से पहले झुक जाएगी उसकी कमर
मोतियाबिंद से भर जाएँगी उसकी आँखें
किसी मज़दूर की तरह पचपन में ही हो जाएगी उसकी असामयिक मौत
उसे छुट्टियों की सख़्त ज़रूरत है
आख़िर वह ईश्वर है उस पर दुनिया चलाने का ज़िम्मा है
इसलिए थोड़ी दया, थोड़ी सहानुभूति दिखाते हुए
तुम्हें बिना ईश्वर के काम करने की आदत डाल लेनी चाहिए।

सलाह

दूर से संबंध-विच्छेद की घोषणा करने वाली प्रेमिका से मैंने कहा
कौन-सा चुंबन आख़िरी होने वाला है उसे यह बताना चाहिए था

दुखी जान पड़ रही लड़की से मैंने कहा
उसे भैंसों की तरह लापरवाह होना चाहिए

सोशल मीडिया से आग लगाने का हुनर सिखने वाले लड़के से कहा
आगे बुझाने के तरीक़े के लिए उसे क़िताबें देखनी चाहिए

मेरी देह का अंत्यपरीक्षण कर रहे चिकित्सक से कहा
मृत्यु का रंग कितना बदरंग है
पोस्टमार्टम घर की दीवारों को रंगीन होना चाहिए

गले में काँटा फँसने पर लोगों ने मछलियों से शिकायत की
उन्हें बिना रीढ़-हड्डियों का होना चाहिए

देश के नेता को लगता है
वह चिड़िया को दसवें माले से फेंक देगा वह मर जाएगी
मछली को समंदर में डूबो देगा वह डूब जाएगी
मेरे पास नेता को सलाह देने के लिए कुछ नहीं है
पेशेवर हत्यारों को सलाह देने से बचना चाहिए।

जीवन

दुनिया में मारक चीज़ें इफ़रात में हैं
पचास रुपए में एक धारदार छुरी ख़रीदी जा सकती है
लुहार से पसंदीदा शैली के हथियार बनवाए जा सकते हैं

हर घर में माचिस की डिबियों में आग है गाड़ियों में ज्वलनशील
धकेलने के लिए छतें हैं सीढ़ियाँ हैं
पहाड़ हैं
सड़कों पर बेतहाशा भागती गाड़ियाँ हैं
डुबोने के लिए कुएँ हैं, नदियाँ हैं
साँस रोकने के लिए मुलायम तकिए हैं, रस्सियाँ हैं
(बंदूक़ों से हत्याएँ अय्याशी है)

हर खोपड़ियों में खौलता लावा है
ईर्ष्याएँ है
कुंठाएँ हैं
दुनिया में ज़हर आम है

इस आलोक में बड़ी बात है
मरने तक नाज़ुक आँखों को बचाना
गले को छुरियों से दूर रखना
अंतड़ियों को भीतर ही सँभाल कर रखना
बड़ी बात है
एक आदमी का सकुशल, अखंडित देह के साथ प्राकृतिक मौत मरना।

दया

हत्या के लिए हमारी तैयारियाँ बेहतर थीं
बंदूक़ों में गोलियाँ थीं और दिमाग़ में योजनाएँ
साथ में लड़के थे और हत्याओं का उनका लंबा अनुभव
हमने हफ़्तों इंतज़ार किया था

अभी एक घंटे बाद जिसे मरना था
वह शहर से दूर बने एक छोटे से घर में मौज़ूद था यह हमें घरेलू सिपाही ने बताया
वह इसी बात के पैसे लेता है

अपनी गाड़ी में सवार हम सोच रहे थे वह क्या कर रहा होगा
मरने वालों की बेख़बरी पर हमें हँसी आती है
कोई आत्मा के क़रीब का कबाब खाकर तिनके से दाँत खोद रहा होता है
कोई पेशाब करता हुआ अपनी किडनियों के सुचारू रूप से काम करने पर ख़ुश हो रहा होता है
कोई बिस्तर पर नंगी पड़ी देह को फिर से बरतने के नए तरीक़े सोच रहा होता है
कोई बच्चों से दुनिया की सबसे क़ातिल पतंग दिलाने का वायदा कर रहा होता है
हम जिसके पास दबे पाँव गए वह कमरे में अकेला पलंग पर पड़ा कराह रहा था

अपनी उम्र से ज़्यादा दिख रहे उसके ज़र्द चेहरे पर दर्द था
उसने हमें अधखुली पलकों से देखा
हम ख़तरे की तरफ़ से आश्वस्त होने के लिए घर के एक-एक कोने में गए
चीज़ों को फेंककर तसल्ली की
वह लेटा हुआ बर्तनों, फूलदानों, ग्लासों का टूटना देखता रहा
तकियों और सोफ़े से उड़ती रुई उसकी हताशा पर गिर रही थी
हम बेफ़िक्र हो गए थे घर की कोई चीज़ उसके रखे मुताबिक़ नहीं थी

मैंने ज्वर से तपता उसका हाथ सहलाया अफ़ीम का पैसा कहाँ है
वह चिड़ियों-सा फुसफुसाया—
पानी
पानी कहीं नहीं था
रोटी
बर्तन ख़ाली थे
रसोई में बनी आख़िरी चीज़ खिचड़ी थी जो चार दिनों पहले बनी थी और अब कीड़ों की शरणस्थली थी
वह रोने लगा और बोला कि मर जाएगा

साथ के लड़के ने चिढ़कर कहा इसे ख़त्म करते हैं और निकलते हैं
उसके घर सत्यनारायण-कथा है
मैंने दया दिखाई
उसे बिना मारे लौट गया
बीच रास्ते साथ के लड़के ने उसे इस तरह ज़िंदा छोड़ने पर
बॉस की नाराज़गी की याद दिलाई

मैंने गाड़ी मोड़ ली
वापस उसके घर आया
उसके हाथों-पैरों को रस्सियों से बाँधा
मुँह पर डक्ट टेप चिपकाया
और दरवाज़े पर एक मज़बूत ताला मार लौट गया।

हत्या

मैंने अपनी मौत की ज़िम्मेदारियाँ तय करते वक्त सबसे ऊपर अपना नाम लिखा
फिर बहुत सारे लेखकों का नाम
फिर किताबों का नाम
नीचे फिर से अपना नाम लिखा
हस्ताक्षर किया

हत्यारों ने बड़ी सतर्कता से डरते-डरते अपना नाम ढूँढ़ा
और ख़ुश हो गए।

दुःख

उसने बरसों पसीने में डूबकर
देह के एक-एक हिस्से को किसी मूर्तिकार की तरह सलीक़े से गढ़ा
ज़िम्मेदारियों से भी भारी लोहे के डम्बल उठाए
हज़ारों पुशअप्स लगाए
मुर्ग़ों से मांसपेशियाँ उधार लेकर
कट्स बनाए
और इतनी शिद्दत से बनाए शरीर में
एक रोज़ किसी ने गोलियाँ झोंक दीं

हत्यारों के साथ यही दिक़्क़त है,
उन्हें मेहनत की क़द्र नहीं।

मिथिलेश प्रियदर्शी (जन्म : 1985) सुपरिचित हिंदी कहानीकार हैं। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ उनकी प्रतिभा, दृष्टि और विचारशक्ति का नया आयाम हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है।

3 Comments

  1. Harpreet kaur अप्रैल 18, 2020 at 8:01 पूर्वाह्न

    मिथिलेश को बहू बहुत बधाई। बढ़िया कविताओं के लिए।

    Reply
  2. Dr Nawab Gandhi अप्रैल 18, 2020 at 5:11 अपराह्न

    Nice Creativity n imagination Mithilesh… m not agree with many of ur lines in d poetry… n infact dis iz poetry not a real fact, it depends upon ur flying thoughts… But d way u express d things in ur poetry iz ultimate… Keep it up…

    Reply
  3. फ़रीद ख़ान मई 21, 2020 at 11:49 अपराह्न

    कई दिनों से यहाँ आकर एक दो कविताएँ पढ़ रहा था. आज जाकर सभी कविताएँ पढ़ पाया. अभी फिर से किसी दिन एक दो पढूंगा. इनमें बहुत सशक्त अभिव्यक्ति है. इसकी भाषा भले ही सहज और सरल है पर कविता की जटिलता यहाँ मौजूद है. इसलिए एक साथ इतनी सारी कविता पढ़ कर कोई राय नहीं बनाई जा सकती. जटिलता को समझने के लिए कई बार करके एक दो कविता पढना चाहिए. मैंने कई बार पढ़ कर आनंद उठाया है. अभी और आनंद उठाऊँगा. धन्यवाद.

    Reply

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