विष्णुप्रसाद की कविताएं ::
मलयालम से अनुवाद : बाबू रामचंद्रन

विष्णुप्रसाद

अस्थमा-लता

उपेक्षा की या निंदा की
एक हल्की हवा काफी है
वह अस्थमा की एक लता बन उठेगी

पत्तों को कंपाकर
तनती
कसती
उसकी देह
दया की सारी निगाहें
अपनी ओर खींच लेगी…

मुझे डर और आदर उससे नहीं,
उसके भीतर पनपने वाली
आग की इस लता से है…
इन पत्तों के शोलों से जलकर काले हुए हैं
मैं और मेरा घर…

उसके दृष्टिवलय में जो भी है
सब उस वलय के बाहर से अंदर
अंदर से बाहर होता रहेगा,
विनती करता रहेगा,
उसकी श्वास-नि:श्वास की गति संग,
जब तक वह मूर्च्छित होकर गिर नहीं जाती

जब वह होश में आती है
उसके बवंडर में
बिखर पड़ी छत और दीवारें
फिर से जुड़कर
खड़ा करती हैं मेरा घर

ऐसे हंसने लगेगी वह
जैसे कुछ हुआ ही नहीं…

मैं हमेशा पूछना भूल बैठता हूं उससे
कि क्यों पालती हो तुम
यह लता
अपने भीतर…?

गाय

एक बार भी
कम से कम
अगर खूंटा तोड़कर
न भागे
तब शायद
लोग
यह समझ लें
कि उसमें स्वतंत्रता की कोई इच्छा ही नहीं है
यह सोचकर
कभी-कभी
खूंटा तोड़कर भागती है
मौसी की गाय

गाय आगे…
मौसी पीछे…

जो भी सामने आए
उसे पछाड़ते-उखाड़ते हुए

किसी की यह जुर्रत नहीं
कि सामने आए
उसे रोकने की कोशिश करे…

‘‘रोको… पकड़ो…’’ चिल्लाते हुए
दौड़ते हुए आती है मौसी पीछे

जब तक हम कुछ सुनें
समझें
निकल गए होंगे
गाय, मौसी
दोनों
उस पार…

करीब दो किलोमीटर भागने से
पूरी हो जाती है
गाय की स्वतंत्रता की इच्छा
फिर हांफते-हांफते
कहीं खड़ी मिलेगी वह

‘नालायक जानवर…’ गाली के साथ
पीटने की भी
आवाज सुनाई देगी…

फिर दोनों बेतकल्लुफी से
वापस अपने घर…

‘क्या यही वे दो प्राणी हैं
जो अभी-अभी
सबको हिलाकर
भागते-दौड़ते उस तरफ गुजरे थे’
दांतों तले उंगली दबाए मिलेंगे
चाय की दूकान पर बैठे हुए लोग

वह खूंटा तोड़कर भागे हुए
दो किलोमीटर ही हैं शायद
जिसकी जुगाली करती जा रही है
गाय…

***

विष्णुप्रसाद समकालीन मलयालम कविता का एक अत्यंत उल्लेखनीय नाम हैं. इनके दो कविता-संग्रह प्रकाशित हैं. विष्णुप्रसाद प्राथमिक शिक्षक हैं और केरल के वयनाड जिले में रहते हैं. बाबू रामचंद्रन हिंदी के कई चर्चित कवियों का मलयालम में अनुवाद कर चुके हैं और कर रहे हैं. इन दिनों वह समकालीन मलयालम कविता के हिंदी अनुवाद में भी संलग्न हैं. इस प्रस्तुति से पूर्व गए दिनों ‘सदानीरा’ पर ही प्रकाशित उनके किए कालपेट्टा नारायणन की कविताओं के अनुवाद बेहद सराहे गए हैं. विष्णुप्रसाद से [email protected] पर और बाबू रामचंद्रन से [email protected] पर बात की जा सकती है.

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