अनुजा जोशी की कविताएँ ::
मराठी से अनुवाद : सुनीता डागा

अनुजा जोशी

धूप के गुंबद को कंधे पर उठाए

कितना खिंचाव महसूस होता है धूप का
पता है यह जब कि
किस क़दर झुलसाकर रख देती है धूप
यहाँ के कण-कण को
पानी के हर पल को
पता है यह जब कि
किस क़दर झुलसाकर रख देती है धूप
जीते-जागते लहलहाते पेड़ को
उसकी जड़ों के साथ छोड़ने का अंदेसा लगते ही।

जब होता नहीं है कोई भी विकल्प
उजड़े-तप्त रास्ते पर चलने के सिवाय
तब महसूस ही नहीं होता है
धूप का यह अक्खड़पन
महसूस होता है जिस तरह छाँव को।

पेड़ों के तल में सिमटी छाँह पर हँस दे
ऐसे बल का पता नहीं कहाँ से
संचरण होता है शरीर में
और धूप को पैरों में पहने
बेफ़िक्री से गुज़रते हैं जब क़दम अंगारों से
तभी जलती-तपती मेरी आँखों को
किसी हरियाली की ही मानिंद
दिखाई देते हैं चलते हुए इंसान
धूप के गुंबद को कंधे पर उठाए
रास्ते के किनारे पत्थर तोड़ते हुए
खेत-खलिहानों में
धान की क्यारियों को रौंदते हुए
पराली जलाते हुए
और फिर-फिर मोह लेती है धूप मुझे
फिर-फिर ओढ़ना चाहती हूँ उसे माथे पर
विलक्षण खिंचाव महसूस होता है धूप का ही
और बेहद अनचाही अप्रिय लगने लगती है
किसी पेड़ की यकायक दी हुई पुकार
और अपना हरा-भरा पत्ता हिलाकर
दिखाई हुई ठंडी एक सहानुभूति!

परंपरा का गोलक घूम रहा है पैरों के नीचे

नहीं हूँ मैं क़ैद में
सिर्फ़ घूम रही हूँ
यह जो परंपराओं का गोलक घूम रहा है
पैरों के नीचे
इसीलिए!

अपने ही इर्द-गिर्द घूमते-घूमते
आशा के सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती हैं परंपराएँ
और बाँट दी जाती है अपरिहार्यता से
आधे उजाले आधे अँधेरे में
जो आती हैं सूर्य के सामने
झुलसकर काली भी हो जाती हैं
उगता है उन पर हर रोज़ पुण्य का दिन
और साहस के साथ पीठ फिराती हैं जो
सूर्य के सम तपतपाती नियति से
वे चली गई हैं पाप के काले नर्क में
ऐसा कहते हैं लोग!

किसी तो एक ही अर्द्ध-गोल में रहते हैं लोग
और बातें करते रहते हैं हालाँकि संपूर्ण सत्य की
पाप की पुण्य की!
पर मुझे अनुभव करना है
दोनों अर्द्ध-गोलों के ‘इंसान’ नाम के जग का
मैंने रखी है एक हाथ में पुण्य की नाप
और दूजे में पाप
और दृढ़ता से खड़ी हूँ मैं
अपने पैरों को जमाए
परंपराओं का गोलक घूम रहा है पैरों के नीचे
घूमें भले ही
मैं ध्यान रखूँगी न बिगड़े संतुलन
किसी एक भी दिशा में
नहा लूँगी मैं पुण्यमय प्रकाश में
और ओढ़ लूँगी
अँधियारी रात्रि में टिमटिमाते सुख के तारों को
जो दिन में नज़र नहीं आते!

‘इंसान’ नाम के शिलालेख को लिखकर

नहीं चाहती हूँ मैं
बतौर ‘स्त्री’ मिलने वाले
ग्रेस मार्क्स
न ही बतौर ‘पत्नी’ घटने वाले
मायनस मार्क्स।

अब नहीं जुड़े रहना है मुझे कहीं भी
मूल पर्चे में
किसी सप्लीमेंट की तरह
देना है मुझे हर प्रश्न का उत्तर
मेरी भाषा में विचारपूर्वक
धोखेबाज़ विकल्पों की
चांडाल-चौकड़ी में
चुनना है मुझे
सही विकल्प
जाना है अचूक जवाब की दिशा में
आत्मविश्वास के साथ
उत्तीर्ण होना है मुझे
मानवीय मूल्यों की
इस इम्तिहान में
‘इंसान’ नाम के
शिलालेख को लिखकर।

कूड़ा बनती जाती है संस्कृति

कूड़े के ढेर पर ढेर
आस-पास
गंधाती हवा में उठती हुई दुर्गंध
गंदा-बदबूदार परिवेश सारा
बिखरा-बिखरा
जमा हुआ
बेतरतीब-सा सारा किया-धरा

हज़म कर फाड़ दी गई भूख
तृप्त होकर फेंक दी गई प्यास
रस पी दानों को निकाल छिलके डाल दिए गए
डंठल तोड़ गूदा निकाल चबा-चबाकर फेंक दिए गए
मक्खियाँ भिनभिनाती भौंकती
कचरे के ढेर में मुँह मारती सारी पाक संस्कृति

फाड़कर झोंक दिए गए अक्षर
काटकर उछाल दिए गए शब्द
काम में लाकर तोड़-मरोड़ दी गई
जोड़कर लापरवाही से फिर फोड़ दी गई
बाज़ारों की धूल छानते
बेपरवाह बेफ़िक्र घूमते
बर्बाद कर उड़ा दी गई
बिगड़ी हुई तंत्र-यंत्र की क्रांति।

वासनाएँ तृप्त दफ़ा की हुईं
लुकी-छुपी शर्म खुले में पड़ी हुई
भोगे भोग
घुन लगे रोग
आशाएँ भग्न
मस्ती की पीक
उतरा नशा और व्यसन उद्विग्न
यत्र-तत्र-सर्वत्र
पैरों से रौंदी हुई
सड़ी-गली मूढ़ मस्तिष्क की उत्क्रांति!

नालियों में अटा काला ज़हर
पसीने का कामधाम का
दमघोंटू झरोखों से नाशक वायु नर्क गंदगी का
मशक़्क़त कर जी-जान से साफ़-सुथरी की हुई
भीतर-बाहर के दरवाज़े-खिड़कियों को पोंछ-पांछकर स्वच्छ की हुई
सज-धज कर रास्ते से
रास्ते-रास्ते की नस-नस से
हाड़-मांस से
निकासी होती जाती है
कूड़ा बनती जाती है संस्कृति!

अनुजा जोशी (जन्म : 1972) सुप्रसिद्ध मराठी कवयित्री हैं। ‘उत्सव’ और ‘उन्हाचे घुमट खांद्यावर’ उनके प्रमुख कविता-संग्रह हैं। उनसे [email protected] पर बात की जा सकती है। सुनीता डागा मराठी-हिंदी लेखिका-अनुवादक हैं। उन्होंने समकालीन मराठी स्त्री कविता पर एकाग्र ‘सदानीरा’ के 22वें अंक के लिए मराठी की 18 प्रमुख कवयित्रियों की कविताओं को हिंदी में एक जिल्द में संकलित और अनूदित किया है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 22वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

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